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== स्टोइक तर्क == स्टोइक दार्शनिकों को अफलातून और अरस्तू का प्रत्ययवाद स्वीकार्य न लगा। उनके विचार से, चेतना से बाह्य प्रत्ययों की कोई सत्ता नहीं। वे मात्र विचार हैं, जिन्हें मन वस्तुओं से अलग करके देखता है। ज्ञान को मन की कृति मानकर वे उसे निराश्रित कल्पना नहीं बनाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने कहा, ज्ञान इंद्रियद्वारों से होकर मन तक पहुँचता है। स्टोइक दार्शनिकों ने ही, पहले पहल मन को कोरी पट्टी (टेबुला राजा) ठहराया था। किंतु, आधुनिक अंग्रेज विचारक [[जॉन लॉक]] (1632-1714) की भाँति, स्टोइक मन को निष्क्रिय ग्राहक नहीं मानते थे। वे उसे क्रियाशील समझते थे। पर मन की क्रियाशीलता के लिए ऐंद्रिक प्रदत्तों की वे आवश्यकता समझते थे। जर्मन दार्शनिक [[इमानुएल काण्ट|इमैनुएल कांट]] (1724-1804) की ज्ञानमीमांसा पढ़ते हुए हमें स्टोइक दार्शनिकों की इसीलिए याद आ जाती है। किंतु ज्ञान की उत्पत्ति में मन की मौलिकता नष्ट कर देने पर ज्ञान की सत्यता के प्रसंग में स्टोइकों को उसी प्रकार की कठिनाइयो का अनुभव हुआ जैसी कठिनाइयाँ लॉक और कांट के सामने आगे चलकर उपस्थित हुईं। ज्ञान को उन्होंने वस्तुतंत्र माना था। वस्तुएँ इंद्रियों पर अपने प्रभाव छोड़ती हैं। इन्हीं के माध्यम से मन वस्तुओं को जानता है। अब प्रश्न उठता है कि ऐंद्रिक प्रभावों की माध्यमिकता से मन जिस वस्तुजगत् को जानता है, वह उससे बाह्य है, तो ज्ञान की सत्यता की परीक्षा कैसी हो सकती है? सभी यथार्थवादियों के लिए यह एक कड़ी गुत्थी है। या फिर हेनरी बर्ग्साँ (1859-1941) की भाँति, अपरोक्षानुभूति स्वीकार की जाए। स्टोइकों ने ऐसा कुछ तो माना न था। इसलिए उन्हें यह मानना पड़ा कि सत्य वस्तुओं के प्रभावों अथवा प्रतिबिंब, स्वप्नों और मात्र कल्पनाओं के प्रतिबिंबों से कहीं अधिक स्पष्ट होते हैं। वे अपनी जीवंतता से हमारे भीतर सत्यता की भावना या विश्वास उत्पन्न करते हैं। यह आत्मगत भावना या विश्वास ही सत्य की कसौटी है। इस प्रकार स्टोइक दार्शनिकों ने ज्ञानात्मक व्यक्तिवाद का बीजवपन किया।
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