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== जीवनवृत्त == संस्कृत कवियों का जीवनचरित्र लिखना कठिन समस्या है। सौभाग्य की बात है कि आचार्य हेमचंद्र के विषयमें यत्र-तत्र पर्याप्त तथ्य उपलब्ध है। प्रसिद्ध राजा [[जयसिंह सिद्धराज|सिद्धराज]] [[जयसिंह]] एवं [[कुमारपाल]] राजा के धर्मोपदेशक होने के कारण ऐतिहासिक लेखकों ने आचार्य हेमचन्द्र के जीवनचरित पर अपना अभिमत प्रकट किया है। आचार्य हेमचंद्रका जन्म [[गुजरात]] में [[अहमदाबाद]] से १०० किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम स्थित धंधुका नगर में विक्रम संवत ११४५ के कार्तिकी पूर्णिमा की रात्रि में हुआ था। मातापिता शिवपार्वती उपासक मोढ वंशीय [[वैश्य]] थे। पिता का नाम चाचिंग अथवा चाच और माता का नाम पाहिणी देवी था। बालक का नाम चांगदेव रखा। माता पाहिणी और मामा [[नेमिनाथ]] दोनों ही [[जैन धर्म|जैन]] थे। आचार्य हेमचंद्र बहुत बड़े आचार्य थे अतः उनकी माताको उच्चासन मिलता था। सम्भव है, माता ने बाद में जैन धर्म की दीक्षा ले ली हो। बालक चांगदेव जब गर्भ में था तब माता ने आश्चर्यजनक स्वप्न देखे थे। इस पर आचार्य देवचंद्र गुरु ने स्वप्न का विश्लेषण करते कहा सुलक्षण सम्पन्न पुत्र होगा जो दीक्षा लेगा। [[जैन धर्म|जैन]] सिद्धान्त का सर्वत्र प्रचार प्रसार करेगा। बाल्यकाल से चांगदेव दीक्षा के लिये दृढ था। [[खंभात|खम्भात]] में जैन संघ की अनुमति से उदयन मंत्री के सहयोग से नव वर्ष की आयुमें दीक्षा संस्कार विक्रम सवंत ११५४ में माघ शुक्ल चतुर्दशी शनिवार को हुआ। और उनका नाम सोमचंद्र रखा गया। अल्पायु में शास्त्रों में तथा व्यावहारिक ज्ञान में निपुण हो गये। २१ वर्ष की अवस्थामें समस्त शास्त्रोकां मंथन कर ज्ञान वृद्धि की। नागपुर (महाराष्ट्र) के पास धनज ग्राम के एक वणिक ने विक्रम सवंत ११६६में सूरिपद प्रदान महोत्सव सम्पन्न किया। तब एक आश्चर्यजनक घटना घटी। चांगदेव जो अब सोमचन्द्र बन चुके थे एक मिट्टी के ढेर पर बैठे थे। आचार्य देवचन्द्रसूरी जी ने अपने ज्ञान में देखा और उदगार व्यक्त किये, "सोम जहाँ बैठेगा वहाँ हेम ही होगा" और वह मिट्टीका ढेर सोने में बदल चुका था। उस के बाद सोमचन्द्र, हेमचन्द्र नाम से जाने लगे। शरीर सुवर्ण समान तेजस्वी एवं चंद्रमा समान सुन्दर था। आचार्य ने साहित्य और समाज सेवा करना आरम्भ किया। [[प्रभावकचरित]] अनुसार माता पाहिणी देवी ने जैन धर्म की दीक्षा ग्रहण की। अभयदेवसूरि के शिष्य प्रकांड गुरुश्री देवचंद्रसूरि हेमचंद्र के दीक्षागुरु, शिक्षागुरु या विद्यागुरु थे। वृद्वावस्था में हेमचंद्रसूरी को लूता रोग लग गया। अष्टांगयोगाभ्यास द्वारा उन्होंने रोग नष्ट किया। ८४ वर्ष की अवस्था में अनशनपूर्वक अन्त्याराधन क्रिया आरम्भ की। विक्रम सवंत १२२९मे महापंडितों की प्रथम पंक्ति के पंडित ने दैहिक लीला समाप्त की। समाधिस्थल शत्रुञ्जय महातीर्थ पहाड़ स्थित है। प्रभावकचरित के अनुसार राजा कुमारपाल को आचार्य का वियोग असह्य रहा और छः मास पश्चात स्वर्ग सिधार गया। हेमचन्द्र अद्वितीय विद्वान थे। साहित्य के सम्पूर्ण इतिहास में किसी दूसरे ग्रंथकार की इतनी अधिक और विविध विषयों की रचनाएं उपलब्ध नहीं है। व्याकरण शास्त्र के ईतिहास में हेमचंद्र का नाम सुवर्णाक्षरों से लिखा जाता है। संस्कृत शब्दानुशासन के अन्तिम रचयिता हैं। इनके साथ उत्तरभारत में संस्कृत के उत्कृष्ट मौलिक ग्रन्थों का रचनाकाल समाप्त हो जाता है। [[गुजराती भाषा|गुजराती]] कविता है, 'हेम प्रदीप प्रगटावी सरस्वतीनो सार्थक्य कीधुं निज नामनुं सिद्धराजे'। अर्थात सिद्धराज ने सरस्वती का हेम प्रदीप जलाकर (सुवर्ण दीपक अथवा हेमचंद्र) अपना 'सिद्ध'नाम सार्थक कर दिया। हेमचंद्रका कहना था '''स्वतंत्र आत्मा के आश्रित ज्ञान ही प्रत्यक्ष है।'''
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