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== इतिहास == होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका<ref>{{cite book |last=आप्टे |first= वामन शिवराम|title= संस्कृत हिन्दी कोश|year= 1969 |publisher= मोतीलाल बनारसीदास|location= दिल्ली, पटना, वाराणसी भारत|id= |page= 1181|editor: वामन शिवराम आप्टे|access-date=}}</ref> नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे [[वसंतोत्सव]] और काम-महोत्सव भी कहा गया है। [[चित्र:Holi2.jpg|thumb|right|280px| राधा-श्याम गोप और गोपियों की होली]] इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में भी इस पर्व का प्रचलन था लेकिन अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र। [[नारद पुराण]] औऱ [[भविष्य पुराण]] जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। [[विंध्य क्षेत्र]] के [[रामगढ़]] स्थान पर स्थित ईसा से ३०० वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य में वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं। सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक [[अलबरूनी]] ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं [[मुग़ल|मुगल काल]] की और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। [[अकबर]] का [[जोधाबाई]] के साथ तथा [[जहाँगीर]] का [[नूरजहाँ]] के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है।<ref>{{cite web|url=http://www.tribuneindia.com/2002/20020120/ncr1.htm|title=Alwar Museum: A fossilised collection that comes alive|access-date=11 मार्च 2008|format=एचटीएम|publisher=द ट्रिब्यून|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20081007091947/http://www.tribuneindia.com/2002/20020120/ncr1.htm|archive-date=7 अक्तूबर 2008|url-status=live}}</ref> [[शाहजहाँ]] के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ''ईद-ए-गुलाबी'' या ''आब-ए-पाशी'' (रंगों की बौछार) कहा जाता था।<ref name="hindu">{{cite web|url=http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/msid-1448831,prtpage-1.cms|title=Who says Holi is only a Hindu festival?|access-date=5 मार्च 2008|format=सीएमएस|publisher=टाइम्स ऑफ इंडिया|language=en|archiveurl=https://web.archive.org/web/20110316055718/http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/msid-1448831,prtpage-1.cms|archivedate=16 मार्च 2011|url-status=live}}</ref> अंतिम मुगल बादशाह [[बहादुर शाह ज़फ़र]] के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे।<ref name="krishnaradha">{{cite web|url=http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2004/03/040306_holi_history.shtml|title=कृष्ण-राधा से लेकर अकबर-जोधाबाई तक|access-date=3 मार्च 2008|format=एसएचटीएमएल|publisher=बीबीसी|language=|archive-url=https://web.archive.org/web/20060308061250/http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2004/03/040306_holi_history.shtml|archive-date=8 मार्च 2006|url-status=live}}</ref> मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर इस उत्सव के चित्र मिलते हैं। [[विजयनगर]] की राजधानी [[हंपी]] के १६वी शताब्दी के एक चित्रफलक पर होली का आनंददायक चित्र उकेरा गया है। इस चित्र में राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ राज दम्पत्ति को होली के रंग में रंगते हुए दिखाया गया है। १६वी शताब्दी की [[अहमदनगर]] की एक चित्र आकृति का विषय वसंत रागिनी ही है। इस चित्र में राजपरिवार के एक दंपत्ति को बगीचे में झूला झूलते हुए दिखाया गया है। साथ में अनेक सेविकाएँ नृत्य-गीत व रंग खेलने में व्यस्त हैं। वे एक दूसरे पर पिचकारियों से रंग डाल रहे हैं। मध्यकालीन भारतीय मंदिरों के भित्तिचित्रों और आकृतियों में होली के सजीव चित्र देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए इसमें १७वी शताब्दी की [[मेवाड़]] की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ चित्रित किया गया है। शासक कुछ लोगों को उपहार दे रहे हैं, नृत्यांगना नृत्य कर रही हैं और इस सबके मध्य रंग का एक कुंड रखा हुआ है। [[बूंदी जिला|बूंदी]] से प्राप्त एक लघुचित्र में राजा को हाथीदाँत के सिंहासन पर बैठा दिखाया गया है जिसके गालों पर महिलाएँ गुलाल मल रही हैं।<ref name="history">{{cite web|url= http://www.holifestival.org/history-of-holi.html|title= History of Holi|access-date= 3 मार्च 2008|format= एचटीएमएल|publisher= होलीफेस्टिवल.ऑर्ग|language= en|archive-url= https://web.archive.org/web/20080317011228/http://www.holifestival.org/history-of-holi.html|archive-date= 17 मार्च 2008|url-status= dead}}</ref>
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