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===पाठ्यक्रम तथा आदर्शवाद=== आदर्शवादीें विचारों ने शिक्षा के उद्देश्यों का ही निर्धारण नहीं किया है अपितु उसके लिए उपयुक्त पाठ्यक्रम के स्वरूप को भी निर्धारित किया है। क्योंकि शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति तभी संभव है जबकि पाठ्यक्रम भी उसी के अनुसार हो। आदर्शवाद व्यक्ति के व्यक्तित्व का उत्कर्ष अथवा आत्मानुभूति के शाश्वत आदर्शों की प्राप्ति तथा सांस्कृतिक भौतिक जगत को अन्तिम सत्य नहीं मानता किन्तु सत्य का आभास तो मानता ही है इसी भौतिक जगत में रहकर एवं भौतिक वातावरण के सहयोग से ही आदर्शवाद चरम सत्य को प्राप्त करने का परामर्श देता है। मनुष्य का आध्यात्मिक वातावरण अधिक महत्वपूर्ण होता है किन्तु प्राकृतिक वातावरण की उपेक्षा नहीं की जा सकती। व्यक्ति शरीर और मन का संयोग होता है और इसमें मन अधिक महत्वपूर्ण होता है। किन्तु आदर्शवादी मानते हैं कि यदि शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति न की गयी तो मानसिक क्रिया भी दुःसाध्य हो जायेगी। व्यक्ति आत्मानुभूति की ओर तभी बढ़ सकता है जब उसका शारीरिक विकास हो चुका होता है। अतः भौतिक जगत का ज्ञान आवश्यक है। यूनानी दार्शनिक प्लेटो के अनुसार शिक्षा का चरम लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है। अतः पाठ्यक्रम में उन्हीं विषयों को सम्मिलित करने पर बल देना चाहिए जिसके माध्यम से उक्त लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम सत्यं, शिवं तथा सुन्दरं इन तीनों तत्वों को प्राप्त करना आवश्यक है। ये तीनों आध्यात्मिक मूल्य मनुष्य की क्रमशः बौद्धिक, नैतिक एवं कलात्मक क्रियाओं के द्वारा प्राप्त होते हैं। अतः प्लेटो पाठ्यचर्या में उन्हीं विषयों एवं क्रियाओं के समावेश पर बल देते हैं जो मानव को उपर्युक्त क्रियाओं में दक्षता प्रदान करे। उन्होंने बौद्धिक क्रियाओं के लिए भाषा, साहित्य, इतिहास, भूगोल, गणित तथा शारीरिक विज्ञान को महत्वपूर्ण बताया है। नैतिक क्रियाओं के लिए धर्म, नीतिशास्त्र, तथा अध्यात्मशास्त्र का और कलात्मक क्रियाओं के लिए विभिन्न कलाओं तथा संगीत का समावेश किया था। आदर्शवादी विचारक हार्न महोदय पाठ्यक्रम के निर्धारण में ठोस आधारों को आदर्श समाज के अन्तर्गत व्यक्ति के चरित्र में खोजते हैं। अतः उनके अनुसार वे सभी अनुभव, क्रियायें तथा जीवन की परिस्थितियाँ आदि जो आदर्श की पूर्णता की ओर हमें ले जाती हैं। उन्हीं को पाठ्यक्रम में महत्वपूर्ण स्थान देना चाहिये। उनका विचार है- :''कुछ विज्ञान, कुछ कला तथा कुछ व्यावसायिक शिक्षा प्रत्येक विद्यार्थी के पाठ्यक्रम में सम्मिलित कर देना चाहिये।'' दूसरे शब्दों में उन्होंने ज्ञानोपार्जन एवं जीविकोपार्जन से संबंधित विषयों को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने की सिफारिश की है। जर्मन शिक्षाशास्त्री हरबार्ट मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति के लिए चरित्र एवं नैतिक विकास पर बल देते हैं और उसके लिए पाठ्यचर्या में भाषा, साहित्य, इतिहास, कला तथा संगीत को मुख्य स्थान देते हैं। उनके अनुसार पाठ्यक्रम में भूगोल, गणित तथा विज्ञान को गौण स्थान देना चाहिये। यद्यपि टी०पी० नन महोदय ने शिक्षा के व्यक्तिवादी उद्देश्य का प्रबल समर्थन किया है किन्तु पाठ्यक्रम-निर्माण के सम्बन्ध में वे आदर्शवादी विचारधारा के समर्थक हैं। उनका विचार है कि विद्यालय का कर्तव्य एक निश्चित प्रकार की औपचारिक शिक्षा देना मात्र नहीं है अपितु उसका कर्तव्य है कि वह अपने समाज एवं राष्ट्र की आध्यात्मिक शक्ति की उन्नति में सहयोग प्रदान करें। उसके ऐतिहासिक क्रम एवं संस्कृतियों को सुरक्षित रखे और उसके भविष्य को निरन्तर उज्जवल बनाने का सफल प्रयत्न करें। अतः विद्यालय में बालक को दो प्रमुख क्रियाओं के लिए प्रशिक्षित किया जान चाहिए-एक वे क्रियायें जो बालक के वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन की उन्नति करें तथा दूसरी वे क्रियायें जो मानवीय सभ्यता के प्रारम्भिक स्वरूप का निर्धारण करें। सारांशतः यह कहा जाता है कि आदर्शवादी विचारधारा के अनुसार शिक्षा के पाठ्यक्रम में स्थिरता न होकर गतिशीलता होनी चाहिए, जिससे बालकों की आवश्यकतानुसार उनमें परिवर्तन किया जा सके। इस दृष्टि से आदर्शवादी अपने पाठ्यक्रम में जहाँ एक तरफ शारीरिक शिक्षा को महत्व देते हैं, वहीं दूसरी तरफ प्राकृतिक वातावरण की जानकारी के लिए भौतिकी, रसायनिकी, भूमिति भूगोल, खगोल, भूगर्भ विज्ञान, वनस्पतिशास्त्र, जीव विज्ञान इत्यादि विषयों को भी महत्व देते हैं। बालक के आत्मिक विकास के लिए कला, साहित्य नीतिशास्त्र, धर्म-दर्शन, संगीत इत्यादि विषयों को आदर्शवादी अधिक महत्वपूर्ण मानते है।
सारांश:
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