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== शाब्द बोध के विषय में मीमांसक मत == वाक्यों के द्वारा जो बोध (ज्ञान) होता है उसे '''वाक्यार्थ बोध''' या '''शाब्द बोध''' कहते हैं। वाक्य भी आख्यातांत ही होता है - (1) सुबंतचय: वाक्यम्, (2) तिंगंतचयोवाक्यम्, (3) सुप्तिंगन्तचयो वाक्यम्। उसमें ये तीन पक्ष हैं, जिनमें कारकान्वित क्रिया होनी चाहिए। [[अमरकोश]] के अनुसार - "तिड्.सुबंत चयो वाक्यं क्रिया वा कारकान्विता"। अर्थात् सुबंत और तिंगन्त वाक्यों का कारकान्वित क्रिया पर्यवसान होता है। पूर्वमीमांसा में [[कुमारिल भट्ट]], [[प्रभाकर]] और [[मुरारी]] के तीन मत प्रसिद्ध हैं, किंतु अंतिम में "त्रिपाद नीति नयन" इस नाम से ख्यात ग्रंथ भी विदित हुआ है। मीमांसकों में अभिहितान्वयवाद अैर अन्विताभिधानवाद नाम से दो प्रस्थान प्रसिद्ध हैं। इनमें प्रथम कुमारिल भट्ट और द्वितीय प्रभाकर का मत है। शाब्ध बोध में भावना को मुख्य रूप से भट्ट ने स्वीकार किया है। प्रभाकर ने कार्य को मुख्य स्वीकार किया है। अभिहितान्वय शब्द का यह अर्थ है कि पदों से प्रतिपादित पदार्थ ज्ञान आकांक्षा, योग्यता और आसक्ति समन्वित होकर लक्षणा के द्वारा शाब्दबोध (वाक्यार्थ बोध) कराते हैं न्यायमत में पदों की पदार्थ में शक्ति है और पद ज्ञान लक्षण या बोध करते हैं। पदों से पदार्थ की उपस्थिति होती है। इसी प्रकार मीमांसा में कहा गया है, उदाहरणार्थ ज्योतिष्टोमेन स्वर्ग कामो यजेत"। यहाँ "यजेत" में दो अंश हैं -"यज" धातु और "त" प्रत्यय। प्रत्यय आख्यातांश को लेकर आर्थी भावना का प्रतिपादन करता है। उस भावना की तीन आकांक्षाएँ होती हैं - साध्याकांक्षा साधनाकांक्षा और "इतिकर्तव्यताकांक्षा"। साध्याकांक्षा होने पर (स्वर्गकामाधिकरण से) स्वर्ग का साध्यत्वेन अन्वय होता है। साधनाकांक्षा होने पर धात्वर्थ का कारणत्वेन अन्वय होता है। (भावार्थाधिकरण न्याय से)। इति कर्तव्यताकांक्षा होने पर (दीक्षिणीयादि) इतिकर्तव्यतात्वेन अन्वय होता है। वाक्यार्थाधिकरण में कहा गया है- : ''भावनैव हि वाक्यार्थ: सर्वत्राख्यात वत्तया। : ''अनेक गुण जात्यादि कारकार्थानुराजिता। विशिष्ट अर्थ का बोध करने के लिए वाक्य लोक में प्रयुक्त होता है। पदश्रवण से पदार्थों का पृथक् पृथक् ज्ञान होता है। यह वाच्यार्थ है, किंतु जो पदार्थज्ञान होता है वह श्रोता को अभिप्रेत नहीं और जिसके लिए वाक्य प्रयुक्त हुआ उससे श्रोता का कार्य नहीं होता, ऐसे स्थल में वाक्य तात्पर्य की अनुत्पत्ति होती है। अतएव अनुपपत्ति के निवारणार्थ लक्षणा मानी गई है। सभी दार्शनिकों ने तात्पर्यानुपपत्ति को लक्षणा का बीज स्वीकार किया है। पदों के दो प्रकार के तात्पर्य माने गए हैं, प्रथम तात्पर्य तथा द्वितीय महातात्पर्य। प्रथम अवांतर तात्पर्य पदार्थ विषय का प्रतिपादन करता है और महातात्पर्य वाक्यार्थ विषय का प्रतिपादन करता है। अभिहितान्वयवाद में वाक्य से वाक्यार्थ का बोध लक्षणया होता है। कुमारिल भट्ट ने निम्न श्लोकों से प्रतिपादन किया है - : ''साक्षात् यद्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम्। : ''वर्णास्तथापि नैतस्मिन् पयंवस्यन्ति निष्फले।। : ''वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तो नान्तरीगकम। : ''पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थ-प्रतिपादनम्।। इस वचन से भट्ट पादका अभिहितान्वयवाद का स्वरूप दिग्दर्शित होता है। कुछ विद्वानों का कथन है कि "अनन्वितावस्थ" पदार्थ पदों से अभिहित होते हैं। उनकी अन्वितावस्था केवल लक्षित होती है। अतएव "अन्विताभिधानवाद" कुमारिल भट्ट का है, किंतु भट्ट मत का अनुवादक अन्विताभिधानवाद मानकर जो खंडन करते हैं, यह उचित नहीं है, क्योंकि उनके ग्रंथों में उपर्युक्त लेख की चर्चा कहीं भी नहीं है।
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