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=== विद्यावारिधि (पी एच डी) एवं वाचस्पति (डी लिट्) === आचार्य की उपाधि पाने के पश्चात् गिरिधर मिश्र विद्यावारिधि ([[:en:PhD|पी एच डी]]) की उपाधि के लिए इसी विश्वविद्यालय में पण्डित रामप्रसाद त्रिपाठी के निर्देशन में शोधकार्य के लिए पंजीकृत हुए। उन्हें [[:en:University Grants Commission (India)|विश्वविद्यालय अनुदान आयोग]] से शोध कार्य के लिए अध्येतावृत्ति भी मिली, परन्तु आगामी वर्षों में अनेक आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।<ref name="aicb-bio"/> संकटों के बीच उन्होंने अक्टूबर १४, १९८१ को संस्कृत व्याकरण में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से विद्यावारिधि (पी एच डी) की उपाधि अर्जित की। उनके शोधकार्य का शीर्षक था '''अध्यात्मरामायणे अपाणिनीयप्रयोगानां विमर्शः''' और इस शोध में उन्होंने [[अध्यात्म रामायण]] में पाणिनीय व्याकरण से असम्मत प्रयोगों पर विमर्श किया। विद्यावारिधि उपाधि प्रदान करने के बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उन्हें सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के व्याकरण विभाग के अध्यक्ष के पद पर भी नियुक्त किया। लेकिन गिरिधर मिश्र ने इस नियुक्ति को अस्वीकार कर दिया और अपना जीवन धर्म, समाज और विकलांगों की सेवा में लगाने का निर्णय लिया।<ref name="aicb-bio"/> १९९७ में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय ने उन्हें उनके शोधकार्य '''अष्टाध्याय्याः प्रतिसूत्रं शाब्दबोधसमीक्षणम्''' पर वाचस्पति ([[:en:DLitt|डी लिट्]]) की उपाधि प्रदान की। इस शोधकार्य में गिरिधर मिश्र नें अष्टाध्यायी के प्रत्येक [[सूत्र]] पर संस्कृत के श्लोकों में टीका रची है।<ref name="dinkaredu"/>
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