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=== महाराणा प्रताप - जयंती के बहाने स्मरण === * '''महाराणा प्रताप का युग - डाॅ. श्रीकृष्ण 'जुगनू', आर्यावर्त संस्कृति संस्थान, बी 216 चंदूनगर, करावल नगर रोड, दिल्ली, 2010 की भूमिका।''' ... रक्ततलाई जहां 1576 ई. के जून की 18वीं तारीख को अपने मुल्क की स्वाधीनता के लिए उन ताकतों और उनके चहेतों के दरम्यां रण रचा गया जिनमें से एक हिंदुस्तान को अपनी मुट्ठी में बांध लेने को आतुर थी और दूसरी ताकत उस हथेली की लकीरों को बदलने के लिए कफन बांधकर निकली थी। गजब के हौंसले और अजब सी दीवानगी थी। जिन पहाड़ों पर आज भी चढ़ पाना दुश्वार है और जिन घाटियों को देखकर होश फाख्ता हो जाते हैं, उनमें से योद्धाओं ने निकल-निकलकर नाग जैसा व्यूह रच दिया था। घमासान भटों और सुभटों के बीच ही नहीं था, हाथियों के बीच भी हुआ। घोड़ों ने हाथियों के सिर पर लोहे की नाल जड़े खुर चस्पा कर दिए थे।..। ... आखिर महाराणा प्रताप का युग कैसा था ? उस काल का समाज और संस्कृति कैसी थी ? बाबर के आक्रमण के दौरान देश की सबसे बड़ी ताकत मेवाड़ क्या हमेशा के लिए शांत हो गया ? शेरशाह के बाद, बाबर के पौत्र अकबर ने मेवाड़ के मान-मर्दन के लिए सारी मर्यादाएं लांघ दी मगर क्या वजह थी कि मेवाड़ के जख्मी हाथों में बलंदी के झंडे बने रहे। अकबर के कोई आधा दर्जन हमले और अभियान तथा युद्ध के बावजूद सारी मर्यादाएं महाराणा प्रताप के पस्त नहीं थे। अबुल फज़ल और फैजी जैसे कलमनिगार दिन-रात बादशाहत को जमीं पर रूहानी पेशवा साबित करने में अपना कर्तव्य समझ बैठे थे और बादशाहत के मायने बयां करने के लिए हर छोटी-छोटी बात तक लिखकर इनाम और तवज्जो अख्तियार कर रहे थे, अपना पानी बेच रहे थे, वहीं मेवाड़ अपना पानी बचाने के लिए तैयारी में लगा था। आत्म प्रशंसा में लिखने के नाम पर प्रताप ने अपने पास कुछ नहीं माना अन्यथा उसके दरबार में भी काेई अबुल फज़ल और फैजी होता। याद नहीं कि प्रताप ने अपनी प्रशंसा में काेई ग्रंथ लिखवाया हो। प्रताप के जीवनकाल में प्रशंसा की कोई पुष्पिका तक नहीं मिलती, हां चक्रपाणि मिश्र ने जरूर एकाध श्लोक प्रताप की प्रशंसा में लिखा। अधिकांश इतिहासकारों ने प्रताप को अखबर की मुखालफत करने वाले योद्धा के रूप में ही चित्रित किया है। मुगलों द्वारा देश को एकता के सूत्र में बांधने के इरादे की राह में रोड़ा बनने वाले व्यक्तित्व के रूप में वर्णित किया है। हद तो यह भी हुई कि यह काम ऐसे इतिहासकारों ने कुछ ज्यादा ही किया है, जिन्होंने मेवाड़ को देखा ही नहीं। क्षेत्रीय स्रोतों को महत्व ही नहीं दिया। फारसी स्रोतों के आधार पर उन्होंने प्रताप के व्यक्तित्व को आंकने से ही गुरेज किया। ... महाराणा प्रताप का युग कृति की रचना करते समय मैंने अपना कठोरपन बरकरार रखने का प्रयास किया है। कहीं-कहीं निष्ठुरता भी दिखाई दे सकती है, मैंने भावुकता या आतुरता से परहेज ही किया है।..। उनकी लिखवाई तीन कृतियां 1. विश्व वल्लभ, 2. राज्याभिषेक पद्धति और 3. महुर्तमाला का संपादन करके और चौथी कृति व्यवहारादर्श का संपादन करते हुए मैंने पाया कि प्रताप असामान्य व्यक्तित्व लिए थे। उनके बाद, मेवाड़ में जलाशयों की शृंखला खड़ी हुई, युद्ध पीडि़तों को पुनर्वास देकर मानवाधिकार की नींव डाली गई, उनके बाद कभी जौहर जैसी त्रासदी पेश नहं आई... कई योगदान है प्रताप के। आज के शासन संचालन के मूल में एक बड़ी रूपरेखा प्रताप के चिंतन की मानी जानी चाहिए। ----
सारांश:
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