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== यात्राएँ == [[चित्र:Swami Vivekananda at Parliament of Religions.jpg|thumb|right |250px| स्वामी विवेकानन्द शिकागो के विश्व धर्म परिषद् में बैठे हुए]] 25 वर्ष की अवस्था में नरेन्द्र ने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिए थे। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। विवेकानंद ने 31 मई 1893 को अपनी यात्रा शुरू की और जापान के कई शहरों (नागासाकी, कोबे, योकोहामा, ओसाका, क्योटो और टोक्यो समेत) का दौरा किया,चीन और कनाडा होते हुए अमेरिका के शिकागो पहुँचे सन् 1893 में शिकागो (अमरीका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानन्द उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुँचे। योरोप-अमरीका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहाँ लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानन्द को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। परंतु (परन्तु) एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला। उस परिषद् में उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गये। फिर तो अमरीका में उनका अत्यधिक स्वागत हुआ। वहाँ उनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय बन गया। तीन वर्ष वे अमरीका में रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान की। उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें '''साइक्लॉनिक हिन्दू''' का नाम दिया।<ref>{{Cite web |url=https://hindiyatra.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/#Swami-Vivekananda-Cyclonic-Hindu |title=The Cyclonic Swami - Vivekananda in the West |access-date=27 अप्रैल 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180612141545/https://hindiyatra.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/#Swami-Vivekananda-Cyclonic-Hindu |archive-date=12 जून 2018 |url-status=live }}</ref> "अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा" यह स्वामी विवेकानन्द का दृढ़ विश्वास था। अमरीका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएँ स्थापित कीं। अनेक अमरीकी विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। वे सदा अपने को 'गरीबों का सेवक' कहते थे। भारत के गौरव को देश-देशांतरों (देश-देशान्तर) में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया।
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