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=== वेदान्त दर्शन === {{मुख्य|वेदान्त दर्शन}} [[चित्र:Raja Ravi Varma - Sankaracharya.jpg|right|thumb|300px|[[आदि शंकराचार्य]] ने अद्वैत वेदान्त दर्शन को ठोस आधार प्रदान किया।]] वेदान्त का अर्थ है वेदों का अन्तिम सिद्धान्त। महर्षि [[व्यास]] द्वारा रचित '''[[ब्रह्मसूत्र]]''' इस दर्शन का मूल ग्रन्थ है। इस दर्शन को '''उत्तर मीमांसा''' भी कहते हैं। इस दर्शन के अनुसार [[ब्रह्म]] जगत का कर्ता-धर्ता व संहारकर्ता होने से जगत का निमित्त कारण है। उपादान अथवा अभिन्न कारण नहीं। ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, आनंदमय, नित्य, अनादि, अनंतादि गुण विशिष्ट शाश्वत सत्ता है। साथ ही जन्म मरण आदि क्लेशों से रहित और निराकार भी है। इस दर्शन के प्रथम सूत्र `अथातो ब्रह्म जिज्ञासा´ से ही स्पष्ट होता है कि जिसे जानने की इच्छा है, वह ब्रह्म से भिन्न है, अन्यथा स्वयं को ही जानने की इच्छा कैसे हो सकती है। और यह सर्वविदित है कि जीवात्मा हमेशा से ही अपने दुखों से मुक्ति का उपाय करती रही है। परंतु ब्रह्म का गुण इससे भिन्न है। आगे चलकर वेदान्त के अनेकानेक सम्प्रदाय (अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि) बने।
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