सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
मीमांसा दर्शन
" (अनुभाग) सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
== प्रभाकर मत : अन्विताभिधानवाद == '''अन्विताभिधान''' शब्द का यह अर्थ है - पद अन्वितार्थ (अन्वय और पदार्थ को शक्त्या वृत्या) बोधन करते हैं। अतएव पद शक्ति से ही पदार्थ और वाक्यार्थ दोनों का बोध हो जाता है। पद शक्ति से अतिरिक्त लक्षणा आदि मानने की कोई आवश्यकता नहीं है। वयोवृद्ध पुरुष किसी वस्तु को लाने ले जाने के लिए शब्द का प्रयोग करता है। उसके पास का बालक उस शब्द को श्रवण कर औ दूसरे पुरुष के ले आने और ले जाने का कार्य करते देखकर शब्द का अर्थ समझ लेता है। यही प्रवृत्ति का कार्यताज्ञान कारण है। लोक में क्रिया को भी कार्य समझा जाता है, उसी प्रकार वेद में भी यागादि क्रिया को प्रथमत: कार्य समझा जाता है। यागादि क्रिया क्षणिक है और स्वर्ग कालांतर भावी है। अतएव उक्त (स्वर्गकाम पद समभिव्यवहार अन्यथानुपपत्ति:) वेद वाक्य विमर्श से यागातिरिक्त "अपूर्व, नामक वस्तु समझी जाती है। यहाँ पर "एक कार्य शब्द" की पूर्वोक्त दो शक्तियाँ दो अर्थों में स्वीकार करनी पड़ती हैं। एक में शक्ति (अभिधा) और दूसरे से लक्षणा माननी होती है। उसमें भी अलौकिक कार्य में विशेष शक्ति है, जैसा विद्वानों में प्रचलित है - : ''अनन्यलभ्य: शब्दार्थ: लोक में क्रिया रूप कार्य में लक्षणा होती है। वेद में पद ही वाक्य होते हैं (पदान्येव वाक्यम्) और पदार्थ ही वाक्यार्थ होता है (वाक्यार्थ: पदार्थ:)। इस मत में वाक्यार्थ, अन्वय और संसर्ग ये सब पर्याय हैं। अर्थात् अन्वित ही अन्वय में निमित्त होता है। प्रभाकर ने ग्राहक ग्रहण को माना है, उससे भी अन्विताभिधानवाद सिद्ध होता है। इस मत में - "यजेत स्वर्गकाम:" इस वाक्य से अन्विताभिधान का शाब्द बोध होता है। इस दर्शन में स्वर्गप्राप्ति के लिए याग का ही विधान है। स्वर्ग से अभिप्राय यह है - जो दु:ख से ग्रस्त न हो तथा दु:ख उत्पन्न की उसमें संभावना न हो और अभिलाषा को पूर्ण करे उसे स्वर्ग कहते हैं। "दशंपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत" इत्यादि वाक्यों द्वारा दर्शपूर्णमास याग से स्वर्ग के साधन का विधान किया गया है। याग को क्षणिक माना गया है, क्योंकि किसी देवता के उद्देश्य से द्रव्य के त्याग का नाम याग है। "इन्द्राय इदं न मम" इस वाक्य से मानस व्यापार का त्याग होता है। उस क्षण में उस व्यापार का नाश हो जाता है। निरतिशय प्रीति विषय को स्वर्ग कहा गया है। वह कालांतर अथवा जन्मांतर में प्राप्त होता है। यह दर्शन शास्त्र का नियम है, कायोंत्पत्ति के अव्यवहित पूर्व क्षण में कारण को रहना चाहिए और क्षणिक याग जन्मांतर भावी स्वर्गोत्पत्ति के अव्यवहित पूर्वक्षण में संभव नहीं है। एतदर्थ उक्त श्रुति के आधार से याग का साध्य, स्वर्ग का साधन अथवा याग की उत्तरावस्था एवं फल की पूर्वावस्था, ये सब एक वस्तु सिद्ध होती हैं, जिसे अतिशय, अपूर्व, या योग्यता कहते हैं। इसका विस्तृत विवेचन कुमारिल भट्ट ने अपूर्वाधिकरण में युक्तिपूर्वक किया है। यागानुष्ठान के पूर्व पुरुष में स्वर्ग के उपभोग करने की योग्यता नहीं होती। अनुष्ठान के पूर्व याग में भी स्वर्गादि फल देने की योग्यता नहीं होती एवं पुरुष की अयोग्यता तथा कर्म की अयोग्यता का निराकरण कर शास्त्रगम्य सामथ्र्य अब वा अतिशययोग्यता को अपूर्व माना गया है। यथा : ''कर्मभ्य: प्रागयोग्यस्य कर्मण: पुरुषस्य वा। : ''योग्यता शास्त्रजन्या या सा पराऽपूर्वमुच्यते।" इसे अधिकारापूर्व अथवा फलापूर्व कहते हैं। जहाँ एक ही प्रधान हो वहाँ प्रधान याग से जो अपूर्व उत्पन्न होता उसे उत्पत्यपूर्व कहते हैं। अंगों से जो अपूर्व उत्पन्न होता है, उसे अंगापूर्व कहते हैं। अंगापूर्व और प्रधानापूर्व दोनों मिलकर परमापूर्व को उत्पन्न करते हैं। उससे स्वर्गादि फल की प्राप्ति होती है। कुछ यागों में अनेक प्रधानों से फल होता है। उदाहरणार्थ - दर्श में तीन याग होते हैं और पौर्णमास में भी तीन याग होते हैं। यहाँ तीनों प्रधानों से उत्पन्न होनेवाले तीन उत्पत्यपूर्वो से एक समुदाया पूर्व उत्पन्न होता है। दोनों समुदायापूर्वों से एक परमापूर्व उत्पन्न होता है। अभिप्राय यह हुआ कि उपर्युक्त प्रथम उदाहरण में तीन अपूर्व (उत्पत्ययपूर्व, अंगापूर्व और परमापूर्व) माने जाते हैं। द्वितीय उदाहरण में उत्पत्यपूर्व, अंगापूर्व, समुदायापूर्व और फलापूर्व, चार अपूर्व माने जाते हैं। ये ही मीमांसकों का सर्वस्व है। इसमें भाट्ट मीमांसक शाबर भाष्य 2। 1। 2 के "यागेन अपूर्व कृत्वा स्वर्ग भावयेत्" अनुसार शब्द से तथा श्रुतार्थापत्ति से अपूर्व की सिद्धि करते हैं। और उसे लिंगादि का वाच्य तथा शब्दबोध में मुख्य विशेष्य मानते हैं। सभी दार्शनिकों के द्वारा अपूर्व का जो खंडन किया गया है वह वाच्यत्वांश और प्राधान्यांश का ही खंडन है।
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)