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== विरक्त दीक्षा और तदनन्तर जीवन == १९७६ में गिरिधर मिश्र ने [[स्वामी करपात्री|करपात्री महाराज]] को रामचरितमानस पर कथा सुनाई। स्वामी करपात्री ने उन्हें विवाह न करने, वीरव्रत धारण करके आजीवन [[ब्रह्मचारी]] रहने और किसी [[वैष्णव]] सम्प्रदाय में दीक्षा लेने का उपदेश दिया।<ref name="dinkarlaterlife">दिनकर २००८, पृष्ठ २८–३१।</ref> गिरिधर मिश्र ने नवम्बर १९, १९८३ के [[कार्तिक]] पूर्णिमा के दिन रामानन्द सम्प्रदाय में श्री श्री १००८ श्री रामचरणदास महाराज फलाहारी से विरक्त दीक्षा ली। अब गिरिधर मिश्र '''रामभद्रदास''' नाम से आख्यात हुए।<ref name="dinkarlaterlife"/> [[चित्र:JagadguruRamabhadracharya010.jpg|thumb|left|चित्रकूट में मन्दाकिनी नदी के तट पर षाण्मासिक पयोव्रत के दौरान सुखासन और ध्यानमुद्रा में ध्यानस्थ जगद्गुरु रामभद्राचार्य]] === पयोव्रत === गिरिधर मिश्र ने गोस्वामी तुलसीदास विरचित ''दोहावली'' के निम्नलिखित पाँचवे दोहे के अनुसार १९७९ ई में चित्रकूट में छः महीनों तक मात्र दुग्ध और फलों का आहार लेते हुए अपना प्रथम षाण्मासिक पयोव्रत अनुष्ठान सम्पन्न किया।<ref name="dinkarlaterlife"/><ref>{{cite book | title=दोहावली | last=पोद्दार | first=हनुमान प्रसाद | publisher=गीता प्रेस | year=१९९६ | location=गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत | pages=१०}}</ref><ref>{{cite web | last=दूबे | first=डॉ हरिप्रसाद | publisher=जागरण याहू | title=पवित्र स्थान: ६ महीने रहें चित्रकूट | url=http://in.jagran.yahoo.com/news/features/general/8_14_5390035.html | date=अप्रैल १३, २०११ | accessdate=जुलाई ३, २०११ | quote=तुलसीदास ने माना है कि यदि कोई व्यक्ति छह मास तक पयस्विनी के किनारे रहता है और केवल फल खाकर राम नाम जपता रहता है, तो उसे सभी तरह की सिद्धियां मिल जाती हैं। | archive-url=https://web.archive.org/web/20110922160213/http://in.jagran.yahoo.com/news/features/general/8_14_5390035.html | archive-date=22 सितंबर 2011 | url-status=dead }}</ref> <blockquote> <center> पय अहार फल खाइ जपु राम नाम षट मास। <br/> सकल सुमंगल सिद्धि सब करतल तुलसीदास ॥ <br/> </center> {{Cquote|केवल दूध और फलों का आहार लेते हुए छः महीने तक राम नाम जपो। तुलसीदास कहते हैं कि ऐसा करने से सारे सुन्दर मंगल और सिद्धियाँ करतलगत हो जाएँगी।}} </blockquote> १९८३ ई में उन्होंने चित्रकूट की [[:en:Chitrakuta#Sphatic Shila|स्फटिक शिला]] के निकट अपना द्वितीय षाण्मासिक पयोव्रत अनुष्ठान सम्पन्न किया।<ref name="dinkarlaterlife"/> यह पयोव्रत स्वामी रामभद्राचार्य के जीवन का एक नियमित व्रत बन गया है। २००२ ई में अपने षष्ठ षाण्मासिक पयोव्रत अनुष्ठान में उन्होंने श्रीभार्गवराघवीयम् नामक संस्कृत महाकाव्य की रचना की।<ref>{{cite book | year=२००२ | language=संस्कृत | date=अक्टूबर ३०, २००२ | title = श्रीभार्गवराघवीयम् (संस्कृतमहाकाव्यम्) | first=स्वामी | last=रामभद्राचार्य | place=चित्रकूट, उत्तर प्रदेश, भारत | publisher=जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय | pages=५११}}</ref><ref>दिनकर २००८, पृष्ठ १२७।</ref> वे अब भी तक नियमित रूप से षाण्मासिक पयोव्रत का अनुष्ठान करते रहते हैं, २०१०-२०११ में उन्होंने अपने नवम पयोव्रत का अनुष्ठान किया।<ref>{{cite web | last=संवाददाता | first=चित्रकूट | publisher=जागरण याहू | title=भारतीय शिक्षा सिखाती है संस्कार | url=http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_7135505.html | date=जनवरी ५, २००७ | accessdate=जुलाई २, २०११ | archive-url=https://web.archive.org/web/20110922161314/http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_7135505.html | archive-date=22 सितंबर 2011 | url-status=dead }}</ref><ref>{{cite web | last=संवाददाता | first=चित्रकूट | publisher=जागरण याहू | title=तीर्थ में गूंजते रहे गुरु वंदना के स्वर | url=http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_6598239.html | date=जुलाई २५, २०१० | accessdate=जुलाई २, २०११ | archive-url=https://web.archive.org/web/20110922161406/http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_6598239.html | archive-date=22 सितंबर 2011 | url-status=dead }}</ref><ref>{{cite web | last=संवाददाता | first=चित्रकूट | publisher=अमर उजाला | title=जिले में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का शोध संस्थान बनेगा | url=http://www.amarujala.com/city/Chitakut/Chitakut-16337-42.html | date=जनवरी ५, २०११ | accessdate=जुलाई २, २०११ | archive-url=https://web.archive.org/web/20110911142000/http://www.amarujala.com/city/Chitakut/Chitakut-16337-42.html | archive-date=11 सितंबर 2011 | url-status=dead }}</ref> [[चित्र:JagadguruRamabhadracharya002.jpg|thumb|right| अक्टूबर २५, २००९ के दिन जगद्गुरु रामभद्राचार्य चित्रकूट स्थित तुलसी पीठ में संत तुलसीदास की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हुए]] === तुलसी पीठ === १९८७ में उन्होंने चित्रकूट में एक धार्मिक और समाजसेवा संस्थान [[तुलसी|तुलसी पीठ]] की स्थापना की, जहाँ रामायण के अनुसार श्रीराम ने वनवास के चौदह में से बारह वर्ष बिताए थे।<ref name="jagaran">{{cite web | last=संवाददाता | first=चित्रकूट | publisher=जागरण याहू | title=प्रज्ञाचक्षु की आंख बन गई बुआ जी | url=http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_7135652.html | date=जनवरी ५, २०११ | accessdate=जून २४, २०११ | archive-url=https://web.archive.org/web/20110922155920/http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_7135652.html | archive-date=22 सितंबर 2011 | url-status=dead }}</ref> इस पीठ की स्थापना हेतु [[:en:Sadhu|साधुओं]] और विद्वज्जनों ने उन्हें '''श्रीचित्रकूटतुलसीपीठाधीश्वर''' की उपाधि से अलंकृत किया। इस तुलसी पीठ में उन्होंने एक सीताराम मन्दिर का निर्माण करवाया, जिसे काँच मन्दिर के नाम से जाना जाता है।<ref name="jagaran"/> === जगद्गुरुत्व === [[:en:Jagadguru|जगद्गुरु]] [[सनातन धर्म]] में प्रयुक्त एक उपाधि है जो पारम्परिक रूप से वेदान्त दर्शन के उन [[आचार्य|आचार्यों]] को दी जाती है जिन्होंने प्रस्थानत्रयी (ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता और मुख उपनिषद्) पर संस्कृत में भाष्य रचा है। मध्यकाल में भारत में कई प्रस्थानत्रयीभाष्यकार हुए थे यथा [[शंकराचार्य]], [[निम्बार्काचार्य]], [[रामानुजाचार्य]], [[मध्वाचार्य]], रामानन्दाचार्य और अंतिम थे [[वल्लभाचार्य]] (१४७९ से १५३१ ई)। वल्लभाचार्य के भाष्य के पश्चात् पाँच सौ वर्षों तक संस्कृत में प्रस्थानत्रयी पर कोई भाष्य नहीं लिखा गया।<ref name="subedi">{{cite web | last=संवाददाता | first=चित्रकूट | publisher=जागरण याहू | title=श्री सीता राम विवाह के आनंदित क्षणों मे झूमे भक्त | url=http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_7168843.html | date=जनवरी १२, २०११ | accessdate=जुलाई १२, २०११ | quote=हरिद्वार से आये आचार्य चंद्र दत्त सुवेदी ने कहा कि प्रस्थानत्रयी पर सबसे पहले भाष्य आचार्य शंकर ने लिखा और अब वल्लभाचार्य के छह सौ [sic] साल बाद जगद्गुरु स्वामी राम भद्राचार्य जी ने लिखा। | archive-url=https://web.archive.org/web/20110922160437/http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_7168843.html | archive-date=22 सितंबर 2011 | url-status=dead }}</ref> जून २४, १९८८ ई के दिन काशी विद्वत् परिषद् वाराणसी ने रामभद्रदास का तुलसीपीठस्थ जगद्गुरु रामानन्दाचार्य के रूप में चयन किया।<ref name="dinkarjagadguru"/> ३ फ़रवरी १९८९ को [[प्रयाग]] में [[कुंभ मेला|महाकुंभ]] में रामानन्द सम्प्रदाय के तीन अखाड़ों के महन्तों, सभी सम्प्रदायों, खालसों और संतों द्वारा सर्वसम्मति से काशी विद्वत् परिषद् के निर्णय का समर्थन किया गया।<ref>अग्रवाल २०१०, पृष्ठ ७८१।</ref> इसके बाद १ अगस्त १९९५ को अयोध्या में दिगंबर अखाड़े ने रामभद्रदास का जगद्गुरु रामानन्दाचार्य के रूप में विधिवत अभिषेक किया।<ref name="kbs-bio"/> अब रामभद्रदास का नाम हुआ '''जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य'''। इसके बाद उन्होंने ब्रह्म सूत्र, भगवद्गीता और ११ उपनिषदों (कठ, केन, माण्डूक्य, ईशावास्य, प्रश्न, तैत्तिरीय, ऐतरेय, श्वेताश्वतर, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और मुण्डक) पर संस्कृत में श्रीराघवकृपाभाष्य की रचना की। इन भाष्यों का प्रकाशन १९९८ में हुआ।<ref name="dinkarbiblio"/> वे पहले ही नारद भक्ति सूत्र और रामस्तवराजस्तोत्र पर संस्कृत में राघवकृपाभाष्य की रचना कर चुके थे। इस प्रकार स्वामी रामभद्राचार्य ने ५०० वर्षों में पहली बार संस्कृत में प्रस्थानत्रयीभाष्यकार बनकर लुप्त हुई जगद्गुरु परम्परा को पुनर्जीवित किया और रामानन्द सम्प्रदाय को स्वयं रामानन्दाचार्य द्वारा रचित ''आनन्दभाष्य'' के बाद प्रस्थानत्रयी पर दूसरा संस्कृत भाष्य दिया।<ref name="subedi"/><ref>{{cite book | title = हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली ४ | last=द्विवेदी | first=मुकुन्द | publisher=राजकमल प्रकाशन | year=२००७ | origyear=प्रथम संस्करण १९८१ | edition=संशोधित, परिवर्धित | location=नई दिल्ली, भारत | id=ISBN 972812671358-5 | pages=पृष्ठ २७३}}</ref> ; संयुक्त राष्ट्र को सम्बोधन अगस्त २८ से ३१, २००० ई के बीच [[न्यूयॉर्क शहर|न्यू यॉर्क]] में [[संयुक्त राष्ट्र]] द्वारा आयोजित सहस्राब्दी विश्व शान्ति शिखर सम्मलेन में भारत के आध्यात्मिक और धार्मिक गुरुओं में जगद्गुरु रामभद्राचार्य सम्मिलित थे। संयुक्त राष्ट्र को उद्बोधित करते हुए अपने में उन्होंने भारत और हिन्दू शब्दों की संस्कृत व्याख्या और ईश्वर के सगुण और निर्गुण स्वरूपों का उल्लेख करते हुए शान्ति पर वक्तव्य दिया। इस वक्तव्य द्वारा उन्होंने विश्व के सभी विकसित और विकासशील देशों से एकजुट होकर दरिद्रता उन्मूलन, आतंकवाद दलन और निःशस्त्रीकरण के लिए प्रयासरत होने का आह्वान किया। वक्तव्य के अन्त में उन्होंने शान्ति मन्त्र का पाठ किया।<ref>{{cite web | language=अंग्रेज़ी | last=संवाददाता | first=कार्यालय | publisher=दि हिन्दू | title=100 from India for World Peace Summit | url=http://www.hindu.com/2000/05/26/stories/14262185.htm | date=मई २६, २००० | accessdate=जून २४, २०११ }}{{Dead link|date=अगस्त 2021 |bot=InternetArchiveBot }}</ref><ref>{{cite web | publisher=विश्व धर्म संसद | title=Delegates | url=http://www.millenniumpeacesummit.com/news000905.html | language=अंग्रेज़ी | accessdate=जून २४, २०११ | archive-url=https://web.archive.org/web/20110714094809/http://www.millenniumpeacesummit.com/news000905.html | archive-date=14 जुलाई 2011 | url-status=dead }}</ref> === अयोध्या मसले में साक्ष्य === जुलाई २००३ में जगद्गुरु रामभद्राचार्य [[इलाहाबाद उच्च न्यायालय]] के सम्मुख [[अयोध्या विवाद]] के अपर मूल अभियोग संख्या ५ के अन्तर्गत धार्मिक मामलों के विशेषज्ञ के रूप में साक्षी बनकर प्रस्तुत हुए (साक्षी संख्या ओ पी डब्लु १६)।<ref>{{cite web | language=अंग्रेज़ी | last=शर्मा | first=अमित | publisher=इण्डियन एक्सप्रेस | title = No winners in VHP’s Ayodhya blame game | url = http://www.indianexpress.com/oldStory/23063/ | date = मई १, २००३ | accessdate=जून २५, २०११}}</ref><ref>{{cite web | language = अंग्रेज़ी | title = Babar destroyed Ram temple at Ayodhya | publisher = मिड डे | url = http://www.mid-day.com/news/2003/jul/58790.htm | date = जुलाई १७, २००३ | accessdate = जून २५, २०११ | archive-url = https://web.archive.org/web/20110810072515/http://www.mid-day.com/news/2003/jul/58790.htm | archive-date = 10 अगस्त 2011 | url-status = live }}</ref><ref>{{cite web | language = अंग्रेज़ी | publisher = मिड डे | title = Ram Koop was constructed by Lord Ram | url = http://www.mid-day.com/news/2003/jul/59146.htm | date = जुलाई २१, २००३ | accessdate = जून २५, २०११ | archive-url = https://web.archive.org/web/20110810072509/http://www.mid-day.com/news/2003/jul/59146.htm | archive-date = 10 अगस्त 2011 | url-status = live }}</ref> उनके शपथ पत्र और जिरह के कुछ अंश अन्तिम निर्णय में उद्धृत हैं।<ref name="rjbm-sa-verdict">अग्रवाल २०१०, पृष्ठ. ३०४, ३०९, ७८०-७८८, ११०३-१११०, २००४-२००५, ४४४७, ४४४५-४४५९, ४५३७, ४८९१-४८९४, ४९९६।</ref><ref>शर्मा २०१०, पृष्ठ २१, ३१.</ref><ref>शर्मा २०१०, पृष्ठ २७३.</ref> अपने शपथ पत्र में उन्होंने सनातन धर्म के प्राचीन शास्त्रों (वाल्मीकि रामायण, रामतापनीय उपनिषद्, [[स्कन्द पुराण]], [[यजुर्वेद]], [[अथर्ववेद]], इत्यादि) से उन छन्दों को उद्धृत किया जो उनके मतानुसार अयोध्या को एक पवित्र तीर्थ और श्रीराम का जन्मस्थान सिद्ध करते हैं। उन्होंने तुलसीदास की दो कृतियों से नौ छन्दों (तुलसी दोहा शतक से आठ दोहे और कवितावली से एक कवित्त) को उद्धृत किया जिनमें उनके कथनानुसार अयोध्या में मन्दिर के तोड़े जाने और विवादित स्थान पर मस्जिद के निर्माण का वर्णन है।<ref name="rjbm-sa-verdict"/> प्रश्नोत्तर के दौरान उन्होंने रामानन्द सम्प्रदाय के इतिहास, उसके [[:en:Matha|मठों]], [[:en:Mahant|महन्तों]] के विषय में नियमों, [[:en:Akhara|अखाड़ों]] की स्थापना और संचालन और तुलसीदास की कृतियों का विस्तृत वर्णन किया।<ref name="rjbm-sa-verdict"/> मूल मन्दिर के विवादित स्थान के उत्तर में होने के प्रतिपक्ष द्वारा रखे गए तर्क का निरसन करते हुए उन्होंने स्कन्द पुराण के अयोध्या महात्म्य में वर्णित राम जन्मभूमि की सीमाओं का वर्णन किया, जोकि न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल द्वारा विवादित स्थल के वर्तमान स्थान से मिलती हुई पायी गयीं।<ref name="rjbm-sa-verdict"/>
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