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== गोरखपुर जेल में फाँसी == <!-- [[चित्र:Bismil's dead body at Clock Tower Gorakhpur (1927).jpg|thumb|right|200px|घंटाघर गोरखपुर में जनता के दर्शनार्थ रखा शहीद बिस्मिल का शव]] [[चित्र:Last rites of Ram Prasad Bismil at Rajghat Gorakhpur in 1927.jpg|thumb|right|200px| गोरखपुर में राप्ती नदी के तट पर स्थित श्मशान घाट पर शहीद बिस्मिल की अंत्येष्टि का चित्र]] चित्र साफ व पत्र में पढने योग्य दृश्यता नहीं है। जब तक मुक्त व साफ चित्र ना मिले इस टिप्पणी को ना हटायें।--> १६ दिसम्बर १९२७ को बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा का आखिरी अध्याय (अन्तिम समय की बातें) पूर्ण करके जेल से बाहर भिजवा दिया। १८ दिसम्बर १९२७ को माता-पिता से अन्तिम मुलाकात की और सोमवार १९ दिसम्बर १९२७ (पौष कृष्ण एकादशी विक्रमी सम्वत् १९८४) को प्रात:काल ६ बजकर ३० मिनट पर गोरखपुर की जिला जेल में उन्हें फाँसी दे दी गयी। बिस्मिल के बलिदान का समाचार सुनकर बहुत बड़ी संख्या में जनता जेल के फाटक पर एकत्र हो गयी। जेल का मुख्य द्वार बन्द ही रक्खा गया और फाँसीघर के सामने वाली दीवार को तोड़कर बिस्मिल का शव उनके परिजनों को सौंप दिया गया। शव को डेढ़ लाख लोगों ने जुलूस निकाल कर पूरे शहर में घुमाते हुए राप्ती नदी के किनारे राजघाट पर उसका अन्तिम संस्कार कर दिया।<ref>{{cite book |last1=Verma |first1='Krant' Madan Lal |authorlink1= |last2= |first2= |editor1-first= |editor1-last= |editor1-link= |others= |title=Krantikari Bismil Aur Unki Shayri |url=http://www.worldcat.org/title/krantikari-bismila-aura-unaki-sayari/oclc/466558602 |format= |accessdate=५ मार्च २०१४ |edition=1 |series= |volume= |date= |year=1998 |month= |origyear= |publisher=Prakhar Prakashan |location=[[दिल्ली]] |isbn= |oclc=466558602 |doi= |id= |page=१३-१४ |pages= |chapter= |chapterurl= |quote=मातृभूमि का यह अनन्य भक्त अपनी भेंट चढ़ाकर मरते-मरते भी यही कहकर गया था - मरते बिस्मिल रोशन लहड़ी अशफ़ाक अत्याचार से, होंगे पैदा सैकड़ों उनके रुधिर की धार से! |ref= |bibcode= |laysummary= |laydate= |separator= |postscript= |lastauthoramp= |archive-url=https://web.archive.org/web/20150402225058/http://www.worldcat.org/title/krantikari-bismila-aura-unaki-sayari/oclc/466558602 |archive-date=2 अप्रैल 2015 |url-status=live }}</ref> इस घटना से आहत होकर भगतसिंह ने जनवरी १९२८ के किरती (पंजाबी मासिक) में 'विद्रोही' छद्मनाम नाम से लिखा: "फाँसी पर ले जाते समय आपने बड़े जोर से कहा - 'वन्दे मातरम! भारतमाता की जय!' और शान्ति से चलते हुए कहा - 'मालिक तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे, बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे; जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे, तेरा ही जिक्र और तेरी जुस्तजू रहे!' फाँसी के तख्ते पर खड़े होकर आपने कहा - ''<nowiki/>'I wish the downfall of British Empire!'' अर्थात मैं ब्रिटिश साम्राज्य का पतन चाहता हूँ!' उसके पश्चात यह शेर कहा - 'अब न अह्ले-वल्वले हैं और न अरमानों की भीड़, एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है!' फिर ईश्वर के आगे प्रार्थना की और एक मन्त्र पढ़ना शुरू किया। रस्सी खींची गयी। रामप्रसाद जी फाँसी पर लटक गये।" अपने लेख के अन्त में भगतसिंह लिखते हैं - "आज वह वीर इस संसार में नहीं है। उसे अंग्रेजी सरकार ने अपना सबसे बड़ा खौफ़नाक दुश्मन समझा। आम ख्याल यही था कि वह गुलाम देश में जन्म लेकर भी सरकार के लिये बड़ा भारी खतरा बन गया था और लड़ाई की विद्या से खूब परिचित था। आपको मैनपुरी षड्यन्त्र के नेता श्री गेंदालाल दीक्षित जैसे शूरवीर ने विशेष तौर पर शिक्षा देकर तैयार किया था। मैनपुरी के मुकदमे के समय आप भागकर [[नेपाल]] चले गये थे। अब वही शिक्षा आपकी मृत्यु का कारण बनी। ७ बजे आपकी लाश मिली और बड़ा भारी जुलूस निकला। 'स्वदेश' में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार आपकी माता ने कहा था - 'मैं अपने पुत्र की इस मृत्यु पर प्रसन्न हूँ, दुःखी नहीं। मैं [[राम|श्री रामचन्द्र]] जैसा ही पुत्र चाहती थी। वैसा ही मेरा 'राम' था। बोलो श्री रामचन्द्र की जय!' इत्र फुलेल और फूलों की वर्षा के बीच उनकी लाश का जुलूस जा रहा था। दुकानदारों ने उनके शव के ऊपर वेशुमार पैसे फेंके। दोपहर ११ बजे आपकी लाश शमशान-भूमि पहुँची और अन्तिम-क्रिया समाप्त हुई। आपके पत्र का आखिरी हिस्सा आपकी सेवा में प्रस्तुत है - 'मैं खूब सुखी हूँ। १९ तारीख को प्रातः जो होना है उसके लिये तैयार हूँ। परमात्मा मुझे काफी शक्ति देंगे। मेरा विश्वास है कि मैं लोगों की सेवा के लिये फिर जल्द ही इस देश में जन्म लूँगा। सभी से मेरा नमस्कार कहें। दया कर इतना काम और करना कि मेरी ओर से पण्डित जगतनारायण (सरकारी वकील, जिन्होंने इन्हें फाँसी लगवाने के लिये बहुत जोर लगाया था) को अन्तिम नमस्कार कह देना। उन्हें हमारे खून से लथपथ रुपयों के बिस्तर पर चैन की नींद आये। बुढ़ापे में ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे।" रामप्रसाद जी की सारी हसरतें दिल-ही-दिल में रह गयीं। आपने एक लम्बा-चौड़ा ऐलान किया है जिसे संक्षेप में हम दूसरी जगह दे रहे हैं। फाँसी से दो दिन पहले सी.आई.डी. के डिप्टी एस.पी. और सेशन जज मि. हैमिल्टन आपसे मिन्नतें करते रहे कि आप मौखिक रूप से सब बातें बता दो। आपको पन्द्रह हजार रुपया नकद दिया जायेगा और सरकारी खर्चे पर विलायत भेजकर बैरिस्टर की पढ़ाई करवाई जायेगी। लेकिन आप कब इन सब बातों की परवाह करते थे। आप तो हुकूमतों को ठुकराने वाले व कभी-कभार जन्म लेने वालों में से थे। मुकदमे के दिनों आपसे जज ने पूछा था - 'आपके पास कौन सी डिग्री है?' तो आपने हँसकर जवाब दिया था - 'सम्राट बनाने वालों को डिग्री की कोई जरूरत नहीं होती, क्लाइव के पास भी तो कोई डिग्री नहीं थी।' आज वह वीर हमारे बीच नहीं है, आह!"<ref>[http://books.google.co.in/books?id=w5LliYQaQgwC&pg=PA86 भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140429195829/http://books.google.co.in/books?id=w5LliYQaQgwC&pg=PA86 |date=29 अप्रैल 2014 }}, जगमोहन सिंह और चमनलाल, [[गूगल बुक]] पृष्ठ ८६-८७</ref>
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