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== पाश्चात्य वास्तु == भारत की सिंधु घाटी सभ्यता के बाद, प्राचीनता में मिस्र, यूनान और रोम का नाम लिया जाता है। पाश्चात्य वस्तुकला में ये ही तीन देश अग्रणी रहे। सादे और आवर्तक मिस्री वास्तु के बाद यूनान की अति विकसित मंदिर-निर्माण-कला में और फिर उसे बाद रोमन साम्राज्य की विविध सार्वजनिक निर्माण के लिए आवश्यक जटिल पद्धतियों में, वास्तु के क्रमिक विकास का इतिहास मिलता है। मिस्र में घर अस्थायी निवास समझे जाते थे और कब्रें स्थायी। इसी विचारधारा के पोषण सम्राटों के लिए निर्मित अति विशाल, भारी भरकम पिरामिडों और रहस्यपूर्ण मंदिरों में मिलता है। इसे विपरीत यूनानी मंदिर जनता के लिए बने और प्रस्तरकला में सुंदरता आई। साहित्य, संगीत और कला की उन्नति के साथ साथ रंगमंच, क्रीड़ांगण और मल्लशालाएँ भी विकसि हुइ। संगमर्मर के प्रयोग से कृतियों में सफाई और बारीकी आई। सौंदर्यप्रिय यूनानियों ने भारतीय वास्तुकों की भांति ही, किंतु बहुत पहले ही, स्वतंत्र रूप से, स्तंभों की डोरिक, आयोनिक और कोरिंथियन नामक विशिष्ट शैलियाँ विकसित की थीं। किंतु जब 146 ई.पू. में यूनान रामन साम्राज्य का अंग हो गया, तब उसका स्वतंत्र प्रभुत्व भी समाप्त हो गा। हाँ, उसका प्रभाव रोमन कला में अंत तक अवश्य बना रहा। रोमन वास्तु में साम्राज्य की शान शौकत झलकती है। भव्य मंदिरों के अतिरिक्त सड़कों, विजयद्वारों, पुलों आदि अनेक जनोपयोगी निर्माण कार्यों में रोमन शैली का समावेश हुआ। इस प्रकार रोमन वास्तु सारे यूरोप में फैला और यूरोपीय वास्तु का आधार बना। रोमन साम्राज्य के पतन के साथ ही इस महानद्य सभ्यता और उत्कृष्ट वास्तुकला का अध्याय भी समाप्त हो गया। किंतु जिद्दा से जो ईसाई धर्म साम्राज्य भर में फैल चुका था, उसका प्रभुत्व बढ़ता रहा। कुछ काल पश्चात् 8वीं शती ई. में बड़े बड़े गिरजाघर बने, जिनमें "रोमनेस्क" नाम से उत्तरकालीन रोमन वास्तु का पुनरुत्थान हुआ। गिरजों का जनजीवन में महत्वपूर्ण स्थान रहा और इन्हीं के अतंर्गत शिक्षा संस्थाएँ, पुस्तकालय, संग्रहालय और चित्रशालाएँ स्थापित हुईं। गिरजों की य कला गॉथिक शैली कहलाई, जो मध्ययुगीन सभ्यता का दर्पण कहीं जा सकती है। महत्वपूर्ण निर्माणसिद्धांतों के अनुसार उस समय तक की यूरोपीय वास्तुकला की मुख्य तीन शैलियाँ, 1. स्तंभ और धरनोंवाली यूनानी शैली, 2. स्तंभ और अर्धवृत्त डाटवाली रोमन या मिश्रित शैली और 3. नोकदार डाटोंवाली गॉथिक या चापीय शैली, इतिहासप्रसिद्ध हैं। वास्तुशैलियों के विकास में फिर कुछ विराम आया। इसी बीच पुनरुद्धार शैली का पथ प्रश्स्त करनेवाली परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई। बारूद के आविष्कार से समर पद्धतियाँ और फलत: किलों के विन्यास बदल गए। नई दुनिया की खोज हो चुकी थी। सन् 1453 ई. में कुस्तुंतुनिया के पतन के बाद यूरोप में यूनानियों के आप्रवास का भी प्रभाव पड़ा। फलत: इटली के ही समृद्ध और व्यापारिक नगर फ्लोरेंस में एक प्रतिद्वंद्वी शैली का जन्म हुआ। नए गिरजाघरों और राजमहलों में गॉथिक युग की नुकीली डाटें, प्रतिच्छेदी मेहरावें और ऊर्ध्वाधर लक्षण नहीं, बल्कि चिरप्रतिष्ठित रोमन शैली के अर्धवृत्ताकार गुंबद ही परिष्कृत रूपों में अपनाए गए। पुनरुद्धार का यह आंदोलन इटली से फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, नीदरलैंड और इंग्लैंड तक फैला। हाँ, कालक्षेप के साथ इंग्लैंड में यह धीरे धीरे ही फैला, जिससे वहाँ दोनों शैलियों का मिश्रण दिखाई देता है।
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