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===शिक्षक तथा आदर्शवाद=== प्रकृतिवादी शिक्षक को शिक्षण-प्रक्रिया में नगण्य समझते हैं और उन्हें पर्दे के पीछे ही रहने का परामर्श देते हैं। आदर्शवादी विचारक ठीक इसके विपरीत कहते हैं। आदर्शवाद के अनुसार शिक्षक का स्थान शिक्षण प्रक्रिया में सर्वोपरि है। शिक्षण-प्रक्रिया यान्त्रिक नहीं होती। इसमें एक व्यक्तित्व का दूसरे पर प्रभाव पड़ता है। बालक जो अन्ततः व्यक्ति है – न कि शरीर, उसका विकास प्रभावशाली व्यक्तित्व द्वारा ही सम्भव है। इसलिए शिक्षक का व्यक्तित्व प्रभावशाली होना चाहिये। जन्म के समय बालक में अनेक शक्तियाँ सुषुप्त होती हैं। शिक्षक का कार्य इन सुषुप्त शक्तियों को जाग्रत करना है। भारतीय आदर्शवाद में शिक्षक को सर्वोत्तम स्थान देते हुए उन्हें ‘त्रिदेव’ की संज्ञा देते हुए कहा गया है कि – ‘गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णुः, गुरुर्देवो महेश्वरः’ अर्थात् गुरु (शिक्षक) ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर है। इसी प्रकार अथर्ववेद के ‘ब्रह्मचर्य सूक्त’ में आचार्य (शिक्षक) के सम्बन्ध में कहा गया है कि ‘आचार्यों मृत्युर्वरुणः, सोम ओषधयः-प्रायः।’ अर्थात् गुरू पुराने संस्कारों को नष्ट करके नवीन संस्कार डालता है और बालक को नवीन जीवन प्रदान करता है, इसलिए वह मृत्युर्वरुण (नया जन्म देने वाला) कहा गया है। गुरु मन के कुसंस्कारों को धो देता है इसलिए उसे वरुण कहा गया है। वह शान्ति के मार्ग पर ले जाता है। इसलिए सोम (चन्द्रमा) के समान तथा कठिनाई रूपी रोगों से दूर करने के कारण उसे औषधि की संज्ञा दी गयी। इसलिए आदर्शवादी विचारक बालक के आन्तरिक अथवा आध्यात्मिक विकास के लिए शिक्षक की आवश्यकता पर बल देते हैं। शिक्षा-व्यवस्था में शिक्षक छात्र के जीवन का मार्ग-दर्शक होता है। वह उन्हें उचित मार्ग-दर्शन करके उसकी स्वाभाविक शक्तियों को उचित दिशा में विकसित करने का अवसर प्रदान करता है। शिक्षक शिक्षण-प्रक्रिया की धुरी है। उसके बिना शिक्षण-प्रक्रिया अधूरी रहेगी। आदर्श एवं लक्ष्य तथा जीवन के मूल्य पहले से ही विद्यमान हैं। प्लेटो के अनुसार इनका पहले से ही अस्तित्व है। शिक्षक का यह दायित्व है कि वह बालकों के सर्वोन्मुखी व्यक्तित्व के विकास का प्रयास करे ताकि वे अपने लक्ष्यों को सरलता से प्राप्त कर सकें। इस प्रकार आदर्शवादी विचारक बालक को प्राकृतिक प्राणी से सामाजिक एवं आध्यात्मिक प्राणी में परिवर्तित करने के लिए शिक्षक की आवश्यकता पर अधिक बल देते हैं। सुप्रसिद्ध आदर्शवादी फ्रोबेल ने विद्यालय रूपी उपवन में बालक रूपी सुकोमल पौधा के सर्वोत्तम विकास के लिए शिक्षक ह्वपी माली की अति आवश्यकता बताया है। रॉस ने आदर्शवाद के अनुसार ‘शिक्षार्थी’ के समुचित विकास के लिए ‘शिक्षक’ के स्थान का निरुपण करते हुए लिखा है- : ''प्रकृतिवादी किसी भी गुलाब से सन्तुष्ट हो जाते हैं। परन्तु आदर्शवादी सुन्दर गुलाब चाहता है। इस प्रकार शिक्षक अपने प्रयत्नों से शिक्षार्थी को जो अपनी प्रकृति के नियमों के अनुसार परिवर्तन हो रहा है, उस स्तर पर पहुँचने में सहयोग देता है जिस पर वह स्वयं नहीं पहुंच पाता।'' शिक्षक के अत्यधिक महत्व के कारण ही अधिकांश विद्वान आदर्शवादी शिक्षा को ‘शिक्षक केन्द्रित शिक्षा’ की संज्ञा देते हैं।
सारांश:
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