सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
क्रिस्टलकी
" (अनुभाग) सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
== क्रिस्टल के भौतिक गुण == क्रिस्टल की आंतरिक अणुव्यवस्था पर केवल उसका बाह्य रूप ही नहीं वरन् उसके भौतिक गुण भी निर्भर करते हैं। इनमें से कुछ गुण तो क्रिस्टल की प्रतिरोधक शक्ति से ज्ञात होते हैं, जब उसे तोड़ा, खुरचा या झुकाया जाता है। क्रिस्टल के अन्य गुण प्रकाश और ऊष्मा तथा चुंबक और विद्युद्बलों से संबद्ध है। गैलेना, पाइराइट, कैल्साइट तथा अन्य बहुत से खनिजों के क्रिस्टल निश्चित समतल सतहों पर से, जो क्रिस्टल के संभाव्य फलक या फलकों के समांतर होती हैं, टूटते हैं। इस गुण को विदलन (cleavage) कहते हैं। इससे ज्ञात होता है कि ससंजक बल (cochesive force) कुछ दिशाओं में अन्य दिशाओं की अपेक्षा दुर्बल हैं। क्रिस्टलों, जिनमें विदलन सतह नहीं विद्यमान होती, विभंग (fracture) होता है। यह विभंग शंखाभ (conchoidal) होता है, अर्थात् सतह टूटने पर चिकनी तथा नतोदर होती हैं, या असम (uneven) हो सकती है। क्रिस्टल अधिकतर भंगुर होते हैं, अर्थात् ये सरलता से छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़े जा सकते हैं, या सरलता से इनका चूर्ण तैयार किया जा सकता है। क्रिस्टलीय आकृति की धातुओं में से कुछ, जैसे सोना, चाँदी, ताँबा, आघातवध्र्य (malleable) हैं, अर्थात् हथौड़े से पीटकर इनकी चादर तैयार की जा सकती है। कुछ छेद्य (sectile) होते हैं, अर्थात् पतली चादरों में काटे जा सकते हैं, जबकि अन्य कुछ तन्य (ductile) होते हैं, अर्थात् उनके तार खींचे जा सकते हैं। कुछ क्रिस्टल, जैसे क्लोराइट, नम्य (flexible) होते है, जबकि अन्य, जैसे अभ्रक, प्रत्यास्थ होते हैं। खुरचने की क्रिया में क्रिस्टल जो प्रतिरोध शक्ति प्रकट करता है, वह उसकी कठोरता (hardness) कहलाती है। भिन्न भिन्न कठोरता के दस प्रकार के क्रिस्टलों से एक मापक तैयार किया गया है, जिसकी सहायता से क्रिस्टल की कठोरता की संख्या बतलाई जाती है। इस मापक पर क्रिस्टल की कठोरता जानने के लिये यह देखा जाता है कि क्रिस्टल उन दस में से किसको खुरचता है। सबसे कोमलतम (softest) क्रिस्टल टैल्क (talc) का तथा सबसे कठोर हीरे का है। मापक में 9 तक लगभग समान अंतराल (interval) है। हीरा, जिसकी इस पैमाने पर अपेक्षाकृत कठोरता 10 है, निरपेक्ष (absolute) माप के हिसाब से 42.4 है। अत: 9 (जो कोरंडम तथा उसकी रत्न किस्म, लाल और नीलम, द्वारा निरूपित है) और 10 के बीच में अपेक्षाकृत बहुत अधिक अंतराल है। कुछ क्रिस्टलों में दिशाओं के साथ साथ कठोरता बदलती रहती है। यह आंतरिक अणुव्यवस्था के अंतर के कारण है। यह बड़ी रोचक बात है कि ग्रैफाइट की, जिसका रासायनिक संघटन हीरे के समान है, कठोरता दो से भी कम है। क्रिस्टल की विशेष प्रकार की आंतरिक अणुव्यवस्था निक्षारण आकृतियों (etch figures) में प्रकट हो जाती है। निक्षारण आकृतियाँ क्रिस्टल के फलकों पर किसी उचित विलायक की क्रिया के फलस्वरूप निर्मित होती हैं। इन आकृतियों की सममिति नीचे विद्यमान अणु रचना के अनुरूप होती है। ये आकृतियाँ छोटे-छोटे गडढों या अवनमन के रूप में होती हैं तथा निश्चित ज्यामितीय आकृति की होती हैं और ढालवाँ समतलों से घिरी रहती हैं। क्रिस्टलों के कुछ गुण प्रकाश पर निर्भर रहते हैं। क्रिस्टल की चमक उसकी सतह से परावर्तित प्रकाश की मात्रा और गुण पर ही निर्भर है। एक धात्विक यौगिक के अपारदर्शक क्रिस्टल से सबसे उच्चतम क्रम की जो चमक दिखलाई पड़ती हैं, उसे दीप्तिमान (spendent) कहते हैं। यदि यह अपेक्षाकृत कम चमकदार हैं, तो इसे धात्मिक (metallic) कहते हैं। इन्हीं के अनुरूप पारदर्शक तथा अधातु क्रिस्टलों के लिये क्रमश: हीरकसम (adamantine) और काचाभ (vitreous) शब्द प्रयुक्त किए जाते हैं। अन्य सामान्य चमक रेशमी (silky), रेज़िनी (resinous), मोतिया (pearly), चिकनी (greasy), या द्युतिहीन (dull) कहलाती है। क्रिस्टल भिन्न भिनन नमूनों में सर्वदा समान नहीं रहता है। एक धातु क्रिस्टल में, जिसका रंग गहरा होता है, उसके कस (streak) का अध्ययन करना लाभकारी होता है। कस के चूर्ण का रंग एक बिना चमकवाली चीनी मिट्ठी की सतह पर क्रिस्टल को रगड़ने से देखा जा सकता है। प्रकाश की संचार करने की क्षमता के आधार पर क्रिस्टल पारदर्शक, अल्पपारदर्शक तथा अपारदर्शक होता है। कुछ क्रिस्टल बहुवर्णता (pleochroism), अर्थात् भिन्न भिन्न दशाओं में भिन्न भिन्न रंग, दिखलाते हैं। ऐसा भिन्न भिन्न क्रिस्टलीय दिशाओं में संचारित प्रकाश के वरणात्मक अवशोषण (selective absorption) के कारण होता है। प्रकाश वायु माध्यम से किसी अपारदर्शक क्रिस्टल में जाने पर अपवर्तित (refracted) हो जाता है, अर्थात् वेग के मंदन (retardation) के अनुपात में उसकी (प्रकाश की) दिशा बदल जाती है। वायु तथा क्रिस्टल में प्रकाश के वेग की निष्पत्ति को ही क्रिस्टल का अपवर्तनांक (index of refraction) कहते हैं। रत्न खनिजों के क्रिस्टल उच्च अपवर्तनांक के ही कारण, इतने अधिक चमकदार और आकर्षक होते हैं। हीरे की चमक उसके उच्च अपवर्तनांक 2.419, के ही कारण है, जबकि फ्लुओराइट की काचाभ चमक उसके निम्न अपवर्तनांक, 1.434, की द्योतक है। जल का अपवर्तनांक 1.33 तथा क्राउन शीशा (crown glass) का अपवर्तनांक 1.53 है। त्रिसमलंबाक्ष समुदाय के प्रत्येक क्रिस्टल का अपवर्तनांक सभी दिशाओं में समान होता है। अत: ऐसे क्रिस्टल समदैशिक (isotropic) होते हैं। अन्य समुदायों के क्रिस्टल विषमदैशिक (anisotropic) होते हैं। प्रकाश की एक किरण किसी विषमदैशिक क्रिस्टल में प्रवेश करने पर दो किरणों में विभाजित हो जाती है और इस प्रकार द्वि-अपवर्तन (double refraction) होता है। दोनों किरणें भिन्न भिन्न वेग से चलती हैं तथा अपनी यात्रा की भिन्न भिन्न दिशाओं में भी ये बदलती रहती हैं। चतुष्कोणीय और षट्कोणीय समुदायों के क्रिस्टलों में एक दिशा में, अर्थात् उदग्र क्रिस्टलीय अक्ष की दिशा में, अपवर्तन नहीं होता है। प्रकाशकीय दृष्टि से ऐसे क्रिस्टलों को एकाक्षीय (uniaxial) कहा जाता है। विषमलंबाक्ष, एकनताक्ष और त्रिनताक्ष क्रिस्टलों में दो दिशाओं में अपवर्तन नहीं होता। अत: ऐसे क्रिस्टलों को प्रकाशत: द्वि-अक्षीय (biaxial) कहते हैं। ये दो दिशाएँ, जिन्हें प्रकाशिक अक्ष कहा जाता है, क्रिस्टल संरचनात्मक अक्षों से मेल नहीं खाती हैं, वरन् ये अधिकतम और न्यूनतम वेग की दिशाओं वाले समतल में रहती है। अधिकतम और न्यूनतम वेगवाली दिशाओं में से एक प्रकाशीय अक्ष के लघुकोण को तथा दूसरी बृहद्कोण को अर्धित करती है। कुछ क्रिस्टल स्वभावत: संदीप्तिशील (luminescent) कहते हैं। ये पीसने पर, खुरचने पर, या मलने पर, या लाल ताप (red heat) से नीचे तक गरम करने पर अँधेरे में प्रकाश फेकते हैं। ये क्रिस्टल, जो अदृश्य विकिरण में, जैसे पराबैंगनी (ultraviolet) प्रकाश या एक्स किरण, या कैथोड किरणों में, विगोपन पर अँधेरे में चमकने लगते हैं, प्रतिद्ीप्तिशील (fluorescent) कहलाते हैं। यदि विकिरण का स्रोत हटाने के बाद भी क्रिस्टल में चमक बनी रहती है, तो उसे स्फुरदीप्त (phosphorescent) क्रिस्टल कहते हैं। कुछ क्रिस्टल, जिनमें अधिक परमाणु भार वाले तत्व होते हैं, रेडियोऐक्टिव (radio-active) होते हैं। इनका बड़ी तेजी से तथा एक समगति से विघटन होता रहता है। तत्व, जैसे रेडियम, यूरेनियम, थोरियम, विघटित होकर हीलियम और सीसे में अपवर्तित हो जाते हैं तथा इनसे विकिरण के रूप में ऊर्जा निकलती है, जो सुविधापूर्वक गाइगेर काउंटर (Geiger counter) नामक यंत्र से ज्ञात की जा सकती है। वह ताप जिसपर भिन्न भिन्न क्रिस्टल पिघलते हैं, विस्तृत सीमा में विचरता हैं। कुछ क्रिस्टल तो फुँकनी (blow pipe) की लौ में ही गलनीय हैं और कुछ उसमें नहीं गल पाते हैं। आपेक्षिक गलनीयता छह खनिजों की गलनीयता-मापक के आधार पर निश्चित की जा सकती है। इन खनिजों के द्रवणांक 525डिग्री से 1,400डिग्री सेंदल्सिअस तक हैं, जबकि अच्छी फुँकनी की लौ का ताप 1,500 डिग्री सेल्सिअस तक चला जाता है। कुछ क्रिस्टलों में ताप परिवर्तन करने पर उनके विभिन्न भागों में एक ही साथ धन और ऋण विद्युत् उत्पन्न हो जाती है। संपीडन के प्रभाव में भी क्रिस्टल के भिन्न भिन्न फलकों में धन और ऋण विघुत् पैदा हो जाती है। इनमें से प्रथम घटना को तापविद्युत् (pyroelectricity) तथा दूसरी घटना को दाबविद्युत् (piezoelectricity) कहते हैं। यह बड़ी रोचक बात है कि यह घटना केवल उन्हीं क्रिस्टलों में पाई जाती है, जो उन सममिति वर्गों (32 में से 21) में आते हैं जिनमें सममिति केंद्र नहीं है। क्वाट्र्ज और टूरमैलीन इसके सामान्य उदाहरण है। आधुनिक काल में दाबविद्युत् क्रिस्टल रेडियो तथा ध्वानिक ध्वनित्र (sonic sounder) में उपयोग में आते हैं। वे क्रिस्टल, जिनमें लोहा होता है, सामान्यत: चुंबकीय होते हैं, कुछ बिना लोहे वाले क्रिस्टल भी अल्प या मंद चुंबकीय होते हैं। इनमें से केवल मैग्नेटाइट और पिरोटाइट ही एक साधारण नाल या दंड चुंबक द्वारा आकर्षित किए जाते हैं। इनके अतिरिक्त बहुत से ऐसे क्रिस्टल हैं, जो विद्युत् चुंबक द्वारा आकर्षित किए जाते हैं। इनके अतिरिक्त बहुत से ऐसे हैं, जो विद्युत् चुंबक के द्वारा भिन्न भिन्न क्रम में आकर्षित होते हैं, अत: इस प्रकार उनका एक दूसरे से पृथक् करना सरल हो जाता है।
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)