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==साहित्यिक उल्लेख== [[File:Gangadhara.jpg|thumb|right|230px|गंगा अवतरण एक लोकचित्र]]भारत की राष्ट्र-नदी गंगा जल ही नहीं, अपितु भारत और हिन्दी साहित्य की मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है।<ref>{{cite web |url= http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2009/hindikavyameganganadii.htm|title=हिंदी काव्य में गंगा नदी|access-date=[[३० जून]] [[२००९]]|format=|publisher=अभिव्यक्ति|language=}}</ref> ऋग्वेद, महाभारत, रामायण एवं अनेक पुराणों में गंगा को पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित्श्रेष्ठा एवं महानदी कहा गया है। संस्कृत कवि जगन्नाथ राय ने गंगा की स्तुति में 'श्रीगंगालहरी' नामक काव्य की रचना की है। हिन्दी के आदि [[महाकाव्य]] [[पृथ्वीराज रासो]]{{Ref_label|पृथ्वीराज रासो|क|none}} तथा [[वीसलदेव रास]]{{Ref_label|वीसलदेव रास|ख|none}} ([[नरपति नाल्ह]]) में गंगा का उल्लेख है। आदिकाल का सर्वाधिक लोक विश्रुत ग्रन्थ [[जगनिक]] रचित [[आल्हखण्ड]]{{Ref_label|आल्हखण्ड|ग|none}} में [[गंगा]], [[यमुना]] और [[सरस्वती]] का उल्लेख है। कवि ने प्रयागराज की इस त्रिवेणी को पापनाशक बतलाया है। श्रृंगार-रस के कवि [[विद्यापति]]{{Ref_label|विद्यापति|घ|none}}, [[कबीर]] वाणी और [[जायसी]] के [[पद्मावत]] में भी गंगा का उल्लेख है, किन्तु [[सूरदास]]{{Ref_label|सूरदास|ङ|none}} और [[तुलसीदास]] ने भक्ति भावना से गंगा-महात्म्य का वर्णन विस्तार से किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने [[कवितावली]] के [[उत्तरकाण्ड]] में ‘श्री गंगा महात्म्य’ का वर्णन तीन छंदों में किया है— इन छंदों में कवि ने गंगा दर्शन, गंगा स्नान, गंगा जल सेवन, गंगा तट पर बसने वालों के महत्त्व को वर्णित किया है।{{Ref_label|तुलसीदास|च|none}} [[रीतिकाल]] में [[सेनापति]] और [[पद्माकर]] का गंगा वर्णन श्लाघनीय है। पद्माकर ने गंगा की महिमा और कीर्ति का वर्णन करने के लिए गंगालहरी<ref>{{cite web|url=http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/bund0016.htm|title=बुन्देली काव्य का ऐतिहासिक संदर्भ|access-date=[[२३ जून]] [[२००९]]|format=|publisher=टीडीआईएल|language=|archive-date=31 दिसंबर 2007|archive-url=https://web.archive.org/web/20071231190110/http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/bund0016.htm|url-status=dead}}</ref> नामक ग्रन्थ की रचना की है। सेनापति{{Ref_label|सेनापति|छ|none}} [[कवित्त रत्नाकर]] में गंगा महात्म्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पाप की नाव को नष्ट करने के लिए गंगा की पुण्यधारा तलवार-सी सुशोभित है। [[रसखान]], [[रहीम]]{{Ref_label|रहीम|ज|none}} आदि ने भी गंगा प्रभाव का सुन्दर वर्णन किया है। आधुनिक काल के कवियों में [[जगन्नाथदास रत्नाकर]] के ग्रन्थ [[गंगावतरण]] में कपिल मुनि द्वारा शापित सगर के साठ हजार पुत्रों के उद्धार के लिए [[भगीरथ]] की 'भगीरथ-तपस्या' से गंगा के भूमि पर अवतरित होने की कथा है। सम्पूर्ण ग्रन्थ तेरह सर्गों में विभक्त और रोला छंद में निबद्ध है। अन्य कवियों में [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]], [[सुमित्रानन्दन पन्त]] और [[श्रीधर पाठक]] आदि ने भी यत्र-तत्र गंगा का वर्णन किया है।<ref name="सिंह जुलाई १३-२३"/> छायावादी कवियों का प्रकृति वर्णन हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय है। सुमित्रानन्दन पन्त ने ‘नौका विहार’<ref>{{cite web |url=http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A5%8C%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0_/_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A4|title=नौका-विहार / सुमित्रानंदन पंत|access-date=[[२२ जून]] [[२००९]]|format=|publisher=कविताकोश|language=}}</ref> में ग्रीष्मकालीन तापस बाला गंगा का जो चित्र उकेरा है, वह अति रमणीय है। उन्होंने गंगा<ref>{{cite web |url=http://www.anubhuti-hindi.org/gauravgram/snp/ganga.htm|title=गंगा|access-date=[[२२ जून]] [[२००९]]|format=|publisher=अनुभूति|language=}}</ref> नामक कविता भी लिखी है। गंगा नदी के कई प्रतीकात्मक अर्थों का वर्णन जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ''भारत एक खोज'' (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) में किया है।{{Ref_label|नेहरू|झ|none}} गंगा की पौराणिक कहानियों को [[महेन्द्र मित्तल]] अपनी कृति ''माँ गंगा'' में संजोया है।<ref>{{cite web|url=http://www.pustak.org/bs/home.php?bookid=3944|title=माँ गंगा|access-date=[[३० जून]] [[२००९]]|format=|publisher=भारतीय साहित्य संग्रह|language=|archive-date=13 अगस्त 2010|archive-url=https://web.archive.org/web/20100813133140/http://pustak.org/bs/home.php?bookid=3944|url-status=dead}}</ref>
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