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=== सप्तम भाव मे शनि === [[सातवां]] भाव [[पत्नी]] और [[मन्त्रणा]] करने वाले लोगो से अपना सम्बन्ध रखता है।[[जीवन साथी]] के प्रति अन्धेरा और [[मस्तिष्क|दिमाग]] मे [[नकारात्मक]] विचारो के लगातार बने रहने से व्यक्ति अपने को हमेशा हर बात में [[छुद्र]] ही समझता रहता है,[[जीवन साथी]] थोडे से समय के बाद ही [[नकारा]] समझ कर अपना [[पल्ला]] [[जातक]] से झाड कर दूर होने लगता है, अगर जातक किसी प्रकार से अपने प्रति [[सकारात्मक]] विचार नही बना पाये तो अधिकतर मामलो मे गृह्स्थियों को बरबाद ही होता देखा गया है, और दो शादियों के परिणाम [[सप्तम शनि]] के कारण ही मिलते देखे गये हैं,[[सप्तम शनि]] पुरानी रिवाजों के प्रति और अपने पूर्वजों के प्रति उदासीन ही रहता है, उसे केवल अपने ही प्रति सोचते रहने के कारण और मै कुछ नही कर सकता हूँ, यह विचार बना रहने के कारण वह अपनी पुरानी मर्यादाओं को अक्सर भूल ही जाता है, पिता और पुत्र मे कार्य और अकार्य की स्थिति बनी रहने के कारण अनबन ही बनी रहती है। व्यक्ति अपने रहने वाले स्थान पर अपने कारण बनाकर अशांति उत्पन्न करता रहता है, अपनी माता या माता जैसी महिला के मन मे विरोध भी पैदा करता रहता है, उसे लगता है कि जो भे उसके प्रति किया जा रहा है, वह गलत ही किया जा रहा है और इसी कारण से वह अपने ही लोगों से विरोध पैदा करने मे नही हिचकता है। शरीर के पानी पर इस शनि का प्रभाव पडने से दिमागी विचार गंदे हो जाते हैं, व्यक्ति अपने शरीर में पेट और जनन अंगो मे [[फुल्लन|सूजन]] और महिला जातकों की [[बच्चादानी]] आदि की बीमारियां इसी [[शनि]] के कारण से मिलती है।
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