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==== वेलापवर्ती जीव ==== समुद्रतल के केवल २ प्रतिशत भाग में ही, संलग्न पौधों की वृद्धि के लिए, सूर्य का यथेष्ट प्रकाश पहुंच पाता है और इसका भी अधिकांश पौधों के लिए उपयोगी नहीं होता। विपुल पादप पोषकों के उपयोग के लिए समुद्र की सतह से ५० मीटर की गहराई तक डायटम, डाइनाफ्लैजिलेट् तथा दूसरे सूक्ष्म पादपों ने अपना निष्क्रिय प्लवमान अस्तित्व बना लिया है। इन पादपों के प्लवमान होने का एक प्रमुख कारण इनका छोटा आकार है। शूल परिवर्धन तथा कोशिकाओं द्वारा माला निर्माण इन पौधों के अतिरिक्त अनुकूलन हैं। इन सभी कारणों से इन पौधों की जनसंख्या में यथेष्ट वृद्धि हुई। अन्य कई विशेष कारणों से इन पौधों की जनसंख्या में यथेष्ट वृद्धि हुई। अन्य कई विशेष कारणों से केवल ये ही पौधे अपना एकाधिकार बनाए हुए हैं। सैरागॉसा (Saragossa) समुद्र में मुक्त रूप से पाए जानेवाले सैरागॉसम के अपतृण (Saragossam weed) इसका अपवाद हैं। यह एक वेलांचली शैवाल (littoral algae) है, जो समुद्री धाराओं के साथ इस क्षेत्र में आ गया है। प्रकीर्णित एवं सूक्ष्म पादपों के विपुल संभरण के उपयोग के लिए, विशेष प्रकार के पादपभोजी जीवों की आवश्यकता पड़ी। इस माँग की पूर्ति के लिए शाकाहारी "फिल्टर फीडरों' (Filter feeders) का एक प्लवकीय समूह, जिसमें मुख्यत: कोपिपोडा (Copepode) समूह के छोटे छोटे प्राणी (०.०५ से ८ मिमी.) हैं, उत्पन्न हुआ। इन समूहों की संख्या अत्यधिक है। इनके अतिरिक्त प्रोटोज़ोआ (Protozoans), नितलस्थ अपृष्ठवंशियों की अर्भक अवस्थाएँ तथा कुछ विशेष मछलियाँ भी छोटे छोटे पादपभोजी हैं। इन छोटे छोटे पादपभोजियों के दो मुख्य कार्य हैं : (१) सूक्ष्म प्राथमिक पोषकों का उपयोग तथा (२) प्राथमिक पोषकों का प्राणी पोषक में परिवर्तन। इस परिवर्तित भोजन का उपयोग प्लवक भोजी मछलियाँ, जैसे हेरिंग (Herring), मैक्रल (Mackeral) आदि, करती हैं। ये मछलियाँ कोपिपोड्स तथा अन्य प्लवकों को भी खाती हैं। स्तनपायी समूह का एक प्रमुख प्लवकभोजी ह्वेलबोल ह्वेल (whale-bone Whale) है। यह सबसे बड़ा ज्ञात प्राणी है। वेलापवर्ती परभक्षी प्राणियों में ह्वेल का नाम उल्लेखनीय है। स्पर्म ह्वेल (sperm whale) स्किवड आदि को खाने के लिए गहरे पानी में गोता लगाता है। परभक्षियों में सर्वाधिक बहुभोजी किलर ह्वेल (Killer Whale) है।
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