सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
आदर्शवाद
" (अनुभाग) सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
===अनुशासन तथा आदर्शवाद=== आदर्शवाद में अनुशासन को उपयुक्त शिक्षा के लिए आवश्यक समझा जाता है। आदर्शवादी विचारक शिक्षा में अनुशासन के कठोर पक्षपाती हैं। इस विचारधारा के अनुसार बालक को पूर्ण स्वतंत्रता नहीं देनी चाहिए। इस सम्बन्ध में आदर्शवाद एवं प्रकृतिवाद में भिन्न मत हैं। प्रकृतिवादी शिक्षा-स्वतंत्रता में अधिक विश्वास रखते हैं। जबकि आदर्शवादी शिक्षा- अनुशासन में। इस संबंध में थामस एवं लैंग ने लिखा है-‘‘प्रकृतिवादियों का नारा’’ स्वतंत्रता है। जबकि आदर्शवातियों का नारा अनुशासन है।’’ आदर्शवादी विचारक मानते हैं कि बालक को पूर्ण स्वतन्त्रता देने से तो हानि की ही संभावना अधिक है, लाभ की कम। अतः बालक को सीमित स्वतंत्रता ही प्रदान की जाय। आदर्शवाद अनुशासन पर बल अवश्य देता है किन्तु वह दमनात्मक अनुशासन के पक्ष में नहीं है क्योंकि कठोर नियन्त्रण में रखकर और दमनकारी साधनों द्वारा स्थापित अनुशासन का परिणाम प्रायः भयंकर होता है। इसलिए अनुशासन का स्वरूप प्रभावात्मक होता है। इसके लिए आदर्शवाद नैतिक गुणों के विकास को महत्व देता है। नैतिक गुणों के विकास के लिए नम्रता, ईमानदारी, समय की पाबन्दी, आज्ञाकारिता, सत्यवादिता इत्यादि गुणों का विकास आवश्यक है जो अनुशासनपूर्ण वातावरण में ही संभव है। आदर्शवादी धारणा में बालक में अनुशासन की स्थापना ‘आत्म-प्रेरित रुचि’ के विकास से ही संभव है क्योंकि बालक की जिसमें स्वयं की रूचि होती है, उसी को ग्रहण करता है रूचि एक प्रकार की निश्चयात्मक प्रवृत्ति होने के कारण व्यक्ति के भीतर से उत्पन्न होती है। चूँकि अनुशासन रूचि पर आधारित होता है। अतः इसकी प्रेरणा भी भीतर से मिलती है। व्यक्ति, जिस कार्य को आत्म विभोर होकर करेगा वहाँ उच्छृखंलता, उदण्डता अथवा अनुशासनहीनताका कोई स्थान नहीं है। वहाँ स्वाभाविक रूप से अनुशासन स्थापित हो जायोगा। अनुशासन के सम्बन्ध में आदर्शवाद की एक अन्य मान्यता यह है कि यह पुरस्कार अथवा दण्ड से स्थापित नहीं किया जा सकता। बालक कोई अच्छा कार्य पुरस्कार के लोभ में आकर नहीं करता। सद्गुणों के लिए पुरस्कार की व्यवस्था भी विद्यालय में नहीं होनी चाहिये। सत्य बोलने के लिए किसी प्रस्कार की जरुरत नहीं है। यह तो मानव कर्तव्य ही है। इसे तो करना ही चाहिये। बालक कोई कार्य इसलिए करता है कि उसकी उस कार्य में वास्तविक रूचि होती है तथा उससे उसे वास्तविक आनन्द की प्राप्ति भी होती है। इस प्रकार बालक में ‘आत्मानुशासन’ की नींव पड़ती है और कालान्तर में वह अनुशासित रहता है। आदर्शवादी [[पेस्टालॉजी]] के अनुसार बालक के प्रति सहानुभूति बरती जाये। फ्रोबेल के अनुसार बालक के ऊपर नियन्त्रण उसकी रूचि के ज्ञान के आधार पर तथा सहानुभूति एवं प्रेम के प्रकाशन द्वारा करना चाहिये, क्योंकि अनुशासन की प्रेरणा तो भीतर से मिलती है। इस मत की पुष्टि में हार्न महोदय का यह कथन उचित प्रतीत होता है कि ‘अनुशासन का प्रारम्भ वाह्य रूप से होता है किन्तु अन्त आत्म-नियंत्रण द्वारा आन्तरिक रूप में हो।’
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)