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== राजकपूर और दिलीप कुमार == [[दिलीप कुमार]] और राज कपूर हिन्दी सिनेमा के दो महान स्तम्भ हैं। अपने अपने ढंग के महारथी। दोनों ने हिन्दी सिनेमा के चार दशकों को प्रभावित किया है। इतनी लम्बी और जबरदस्त लोकप्रियता इनके अतिरिक्त किसी और के हिस्से में नहीं आयी। [[देव आनन्द]] भी इनके समानान्तर उतने ही लम्बे समय तक छाये रहे, किन्तु उन ऊँचाइयों तक वे नहीं पहुँच सके, जिन्हें राजकपूर और दिलीप कुमार ने स्पर्श किया।<ref name="अग्रवाल">{{cite book |last1=प्रहलाद |first1=अग्रवाल |title=राजकपूर : आधी हकीकत आधा फसाना |date=2007 |publisher=राजकमल प्रकाशन |location=नयी दिल्ली |page=125}}</ref> हिन्दी सिनेमा में यह हमेशा विवाद का विषय रहा है कि राज कपूर बड़े हैं या दिलीप कुमार? हालाँकि इन दोनों व्यक्तित्वों की तुलना की ही नहीं जा सकती। तुलनाएँ अक्सर गलत मन्तव्यों तक ले जाती हैं और किसी हद तक वे बेमतलब भी होती हैं। सुप्रसिद्ध फिल्म समालोचक प्रहलाद अग्रवाल के शब्दों में :{{quote|"हिन्दी सिनेमा में इन दोनों की स्थिति ठीक उसी प्रकार की है जैसी हिन्दी साहित्य में [[तुलसीदास|तुलसी]] और [[सूरदास|सूर]] की है। आज तक यह निर्णय नहीं हो सका कि इन दोनों में श्रेष्ठ कौन है। यह निर्णय हो भी नहीं सकता, क्योंकि वे दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में अनुपम हैं। तुलसी का व्यक्तित्व बहुआयामी है। उन्होंने अपने काव्य में लोकमंगल को प्रधानता दी। उनकी दृष्टि की परिधि में सम्पूर्ण मानव-जीवन समाहित हो जाता है। सूर के व्यक्तित्व में सघनता है। उनकी दृष्टि जीवन के अनिर्वचनीय सौंदर्य का सन्धान करती है। वे प्रेम और सौन्दर्य के महासागर में डूब जाते हैं। जीवन के एक ही भाव की अनन्त गहराइयों में उतरते हैं। ठीक उसी तरह राजकपूर और दिलीप कुमार हैं। जहाँ राजकपूर का सपना एक सम्पूर्ण फिल्म होती है, वहीं दिलीप कुमार अपने अभिनेता व्यक्तित्व के प्रति इतने सतर्क हैं कि वे पूरी फिल्म की उत्तमता का पर्याय बन जाते हैं। राजकपूर अपनी निजता को फिल्म से सम्बन्धित प्रत्येक व्यक्ति में प्रसारित करते हैं। वह प्रत्येक सहयोगी कलाकार और तकनीशियन के भीतर की क्षमता का अधिक-से-अधिक उपयोग कर लेते हैं। वह अपने व्यक्तित्व को प्रत्येक पक्ष में बाँट देते हैं और फिल्म निर्माण के साथ जुड़े हुए हर व्यक्ति की क्षमता को अधिक से अधिक विकसित करने में सहयोगी बनते हैं।"<ref name="अग्रवाल" />}} दिलीप कुमार के भीतर भी निर्देशक बनने का सपना आजीवन पलता रहा लेकिन वे अंततः खुलकर सामने कभी नहीं आये।<ref>हिंदी सिनेमा : बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक, पूर्ववत्, पृष्ठ-333.</ref><ref>{{cite book |last1=प्रहलाद अग्रवाल |first1=(सं॰) |title=हिंदी सिनेमा : आदि से अनंत..., भाग-3 |date=2014 |publisher=साहित्य भंडार |location=50, चाहचंद (जीरो रोड), इलाहाबाद |isbn=978-81-7779-356-7 |page=43 |edition=प्रथम}}</ref>
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