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== फाँसी के बाद क्रान्तिकारी आन्दोलन में तेज़ी == <!-- [[चित्र:Abhyuday1280.gif|thumb|right|200px|[[इलाहाबाद]] से प्रकाशित '''अभ्युदय''' में ४ मई १९२९ के समाचार की एक कटिंग ]] चित्र साफ नहीं है। जब तक मुक्त व साफ चित्र ना मिले इस टिप्पणी को ना हटायें।--> १९२७ में बिस्मिल के साथ ३ अन्य क्रान्तिकारियों के बलिदान ने पूरे हिन्दुस्तान के हृदय को हिलाकर रख दिया। ९ अगस्त १९२५ के काकोरी काण्ड के फैसले से उत्पन्न परिस्थितियाँ ने [[भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम]] की दशा और दिशा दोनों ही बदल दी। समूचे देश में स्थान-स्थान पर चिनगारियों के रूप में नई-नई समितियाँ गठित हो गयीं। [[बेतिया]] (बिहार) में फणीन्द्रनाथ का '''हिन्दुस्तानी सेवा दल''', [[पंजाब]] में सरदार [[भगत सिंह]] की '''नौजवान सभा''' तथा [[लाहौर]] (अब पाकिस्तान) में [[सुखदेव]] की '''गुप्त समिति''' के नाम से कई क्रान्तिकारी संस्थाएँ जन्म ले चुकी थीं। हिन्दुस्तान के कोने-कोने में क्रान्ति की आग दावानल की तरह फैल चुकी थी। [[कानपुर]] से गणेशशंकर विद्यार्थी का '''प्रताप''' व [[गोरखपुर]] से दशरथ प्रसाद द्विवेदी का '''स्वदेश''' जैसे अखबार इस आग को हवा दे रहे थे। काकोरी काण्ड के एक प्रमुख क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद, जिन्हें राम प्रसाद बिस्मिल उनके [[पारा|पारे]] (mercury) जैसे चंचल स्वभाव के कारण ''क्विक सिल्वर'' कहा करते थे, पूरे हिन्दुस्तान में भेस बदल कर घूमते रहे। उन्होंने भिन्न-भिन्न समितियों के प्रमुख संगठनकर्ताओं से सम्पर्क करके सारी क्रान्तिकारी गतिविधियों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। ८ व ९ सितम्बर १९२८ में फिरोजशाह कोटला दिल्ली में ''[[हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन|एच॰ आर॰ ए॰]]'', नौजवान सभा, हिन्दुस्तानी सेवा दल व गुप्त समिति का विलय करके ''[[हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन|एच॰ एस॰ आर॰ ए॰]]'' नाम से एक नयी क्रान्तिकारी पार्टी का गठन हुआ। इस पार्टी को बिस्मिल के बताये रास्ते पर चलकर ही देश को आजाद कराना था किन्तु [[ब्रिटिश साम्राज्य]] के दमन चक्र ने वैसा भी नहीं होने दिया। [[File:BTStoneNalgadha1760.jpg|thumb|right|200px|नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे के समीप स्थित नलगढ़ा गाँव में रखा ऐतिहासिक पत्थर जिसका प्रयोग भगतसिंह ने बम बनाने के लिये किया]] ३० अक्टूबर १९२८ को [[साइमन कमीशन]] का विरोध करते हुए लाला लाजपत राय डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट जे॰ पी॰ साण्डर्स के बर्बर लाठीचार्ज से बुरी तरह घायल हुए और १७ नवम्बर १९२८ को उनकी मृत्यु हो गयी। इस घटना से आहत एच॰ एस॰ आर॰ ए॰ के चार युवकों ने १७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर जाकर दिन दहाड़े साण्डर्स का वध कर दिया और फरार हो गये। ''साण्डर्स हत्याकाण्ड'' के प्रमुख अभियुक्त सरदार भगत सिंह को पुलिस पंजाब में तलाश रही थी जबकि वह यूरोपियन के भेस में [[कलकत्ता]] जाकर [[बंगाल]] के क्रान्तिकारियों से बम बनाने की तकनीक और सामग्री जुटाने में लगे हुए थे। दिल्ली से २० मील दूर [[ग्रेटर नोएडा]] एक्सप्रेस वे के निकट स्थित नलगढ़ा [[गाँव]] में रहकर भगत सिंह ने दो बम तैयार किये और [[बटुकेश्वर दत्त]] के साथ जाकर ८ अप्रैल १९२९ को दिल्ली की सेण्ट्रल असेम्बली में उस समय विस्फोट कर दिया जब सरकार जन विरोधी कानून पारित करने जा रही थी। इस विस्फोट ने बहरी सरकार पर भले ही असर न किया हो परन्तु समूचे देश में अद्भुत जन-जागरण का काम अवश्य किया। [[चित्र:Bhagat Singh's execution Lahore Tribune Front page.jpg|left|thumb|200px|[[लाहौर]] से प्रकाशित २५ मार्च १९३१ के '''ट्रिब्यून''' का मुखपृष्ठ (भगतसिंह को फाँसी)]] बम विस्फोट के बाद दोनों ने "इंकलाब! जिन्दाबाद!!" व "साम्राज्यवाद! मुर्दाबाद!!" के जोरदार नारे लगाये और एच॰ एस॰ आर॰ ए॰ के पैम्फलेट हवा में उछाल दिये। असेम्बली में मौजूद सुरक्षाकर्मियों - सार्जेण्ट टेरी व इन्स्पेक्टर जॉनसन ने उन्हें वहीं गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। यह सनसनीखेज खबर अगले ही दिन समूचे देश में फैल गयी। ४ मई १९२९ के ''अभ्युदय'' में इलाहाबाद से यह समाचार छपा - ''ऐसेम्बली का बम केस: काकोरी केस से इसका सम्बन्ध है।'' आई॰ पी॰ सी॰ की दफा ३०७ व एक्सप्लोसिव एक्ट की धारा ३ के अन्तर्गत इन दोनों को उम्र-कैद का दण्ड देकर अलग-अलग जेलों में रक्खा गया। जेल में राजनीतिक बन्दियों जैसी सुविधाओं की माँग करते हुए जब दोनों ने [[भूख हड़ताल]] शुरू की तो उन दोनों का सम्बन्ध साण्डर्स-वध से जोड़ते हुए एक और केस कायम किया गया जिसे ''लाहौर कांस्पिरेसी केस'' के नाम से जाना जाता है। इस केस में कुल २४ लोग नामजद हुए, इनमें से ५ फरार हो गये, १ को पहले ही सजा हो चुकी थी, शेष १८ पर केस चला। इनमें से एक - [[यतीन्द्रनाथ दास]] की बोर्स्टल जेल लाहौर में लगातार [[भूख हड़ताल]] करने से मृत्यु हो गयी, शेष बचे १७ में से ३ को फाँसी, ७ को उम्र-कैद, एक को ७ वर्ष व एक को ५ वर्ष की सजा का हुक्म हुआ। तीन को ट्रिब्यूनल ने रिहा कर दिया। बाकी बचे तीन अभियुक्तों को अदालत ने साक्ष्य न मिलने के कारण छोड़ दिया। <!-- Commented out: [[चित्र:Dead Body Of Azad 2620.jpg|thumb|right|[[इलाहाबाद]] के अल्फ्रेड पार्क में चन्द्रशेखर आजाद के मृत शरीर को निहारते लोग व अंग्रेज अधिकारी (पेड़ के पीछे खड़ी उनकी साइकिल)]] --> फाँसी की सजा पाये तीनों अभियुक्तों - भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर दिया। अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ़ ३ ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की। ११ फ़रवरी १९३१ को [[लन्दन]] की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई। अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति माँगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी। चन्द्रशेखर आजाद ने इनकी सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। वे [[हरदोई]] जेल में जाकर गणेशशंकर विद्यार्थी से मिले। विद्यार्थी से परामर्श कर वे [[इलाहाबाद]] गये और [[जवाहरलाल नेहरू]] से उनके निवास-स्थान [[आनन्द भवन]] में भेंट की और उनसे यह आग्रह किया कि वे गान्धी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की [[फाँसी]] को उम्र - कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें। नेहरू जी ने जब आजाद की बात नहीं मानी तो आजाद ने उनसे काफी देर तक बहस की। इस पर नेहरू ने क्रोधित होकर आजाद को तत्काल वहाँ से चले जाने को कहा। आज़ाद अपने तकियाकलाम "स्साला" के साथ भुनभुनाते हुए नेहरू के ड्राइँग रूम से बाहर निकले और अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क की ओर चले गये। अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेवराज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी॰ आई॰ डी॰ का एस॰ एस॰ पी॰ नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद को वीरगति प्राप्त हुई। यह २७ फ़रवरी १९३१ की घटना है। २३ मार्च १९३१ को निर्धारित समय से १३ घण्टे पूर्व भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर की सेण्ट्रल जेल में शाम को ७ बजे फाँसी दे दी गयी। यह जेल मैनुअल के नियमों का खुला उल्लंघन था, पर कौन सुनने वाला था? इन तीनों की फाँसी का समाचार मिलते ही पूरे देश में मारकाट मच गयी। [[कानपुर]] में हिन्दू-मुस्लिम दंगा भड़क उठा जिसे शान्त करवाने की कोशिश में क्रान्तिकारियों के शुभचिन्तक गणेशशंकर विद्यार्थी भी शहीद हो गये। इस प्रकार दिसम्बर १९२७ से मार्च १९३१ तक एक-एक कर देश के ११ नरसिंह आजादी की भेंट चढ़ गये। [[उत्तर भारत]] की क्रान्तिकारी गतिविधियों के अलावा [[बंगाल]] की घटनाओं का लेखा-जोखा भी [[इतिहास]] में दर्ज़ है। [[हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन]] में बंगाल के भी कई क्रान्तिकारी शामिल थे जिनमें से एक [[राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी]] को निर्धारित तिथि से २ दिन पूर्व १७ दिसम्बर १९२७ को फाँसी दिये जाने का कारण केवल यह था कि बंगाल के क्रान्तिकारियों ने फाँसी की निश्चित तिथि से एक दिन पूर्व अर्थात् १८ दिसम्बर १९२७ को ही उन्हें [[गोण्डा]] [[जेल]] से छुड़ा लेने की योजना बना ली थी। इसकी सूचना सी॰ आई॰ डी॰ ने ब्रिटिश सरकार को दे दी थी। १३ जनवरी १९२८ को मणीन्द्रनाथ बनर्जी ने चन्द्रशेखर आजाद के उकसाने पर अपने सगे चाचा को, जिन्हें काकोरी काण्ड में अहम भूमिका निभाने के पुरस्कारस्वरूप डी॰ एस॰ पी॰ के पद पर प्रोन्नत किया गया था, उन्हीं की सर्विस रिवॉल्वर से मौत के घाट उतार दिया। दिसम्बर १९२९ में मछुआ बाजार गली स्थित निरंजन सेनगुप्ता के घर छापा पड़ा, जिसमें २७ क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर केस कायम हुआ और ५ को कालेपानी की सजा दी गयी। १८ अप्रैल १९३० को मास्टर [[सूर्य सेन]] के नेतृत्व में [[चटगाँव]] शस्त्रागार लूटने का प्रयास हुआ जिसमें सूर्य सेन व तारकेश्वर दस्तीगार को [[फाँसी]] एवं १२ अन्य को उम्र-कैद की सजा हुई। ८ अगस्त १९३० को के॰ के॰ शुक्ला ने [[झाँसी]] के कमिश्नर स्मिथ पर गोली चला दी, उसे मृत्यु-दण्ड मिला। २७ अक्टूबर १९३० को युगान्तर पार्टी के सदस्यों ने सुरेशचन्द्र दास के नेतृत्व में [[कलकत्ता]] में तल्ला तहसील की ट्रेजरी लूटने का प्रयास किया, सभी पकड़े गये और कालेपानी की सजा हुई। अप्रैल १९३१ में मेमनसिंह डकैती डाली गई जिसमें गोपाल आचार्य, सतीशचन्द्र होमी व हेमेन्द्र चक्रवर्ती को उम्र-कैद की सजा मिली।<ref>{{cite book |last1=मदनलाल वर्मा |first1='क्रान्त' |authorlink1= |last2= |first2= |editor1-first= |editor1-last= |editor1-link= |others= |title=सरफ़रोशी की तमन्ना (रामप्रसाद बिस्मिल: व्यक्तित्व और कृतित्व) |url=http://www.worldcat.org/title/sarapharosi-ki-tamanna/oclc/222570896&referer=brief_results |format= |accessdate=14 मई 2014 |edition=2 |series= |volume= |date= |year=1998 |month= |origyear= |publisher=[[प्रवीण प्रकाशन]] |location=[[नई दिल्ली]] |isbn= |oclc=222570896 |doi= |id= |page=१५५ से १६१ तक |pages= |chapter= |chapterurl= |quote= |ref= |bibcode= |laysummary= |laydate= |separator= |postscript= |lastauthoramp= |archive-url=https://web.archive.org/web/20160404130547/http://www.worldcat.org/title/sarapharosi-ki-tamanna/oclc/222570896%26referer%3Dbrief_results |archive-date=4 अप्रैल 2016 |url-status=live }}</ref> [[चित्र:Lal Bahadur Shastri (cropped).jpg|thumb|right|200px|'''"मरो नहीं, मारो!"''' का नारा १९४२ में [[लालबहादुर शास्त्री]] ने दिया जिसने क्रान्ति की [[दावानल]] को प्रचण्ड किया।]] इन सब घटनाओं का [[कांग्रेस]] पार्टी पर भी व्यापक असर पड़ा। [[सुभाषचन्द्र बोस]] जैसे नवयुवक गान्धी जी की नीतियों का मुखर विरोध करने लगे थे। जो गान्धी सन् १९२२ से १९२७ तक [[राजनीति]] के पटल से एकदम अदृश्य हो चुके थे अब वही गान्धी जी राम प्रसाद बिस्मिल व उनके साथियों के बलिदान के बाद फिर से तेवर बदलते हुए कांग्रेस में अपनी मनमर्जी का अध्यक्ष चुनवाने और मनचाही नीतियाँ लागू करवाने लगे थे। उनसे तंग आकर सुभाषचन्द्र बोस ने लगातार दो बार - सन् १९३८ के त्रिपुरी व सन् १९३९ के हरिपुरा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष का पद जीत कर गान्धी जी को आइना दिखाने का दुस्साहस किया था। किन्तु गान्धी जी ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी में लॉबीइंग करके सुभाष को तंग करना शुरू कर दिया जिससे दुखी होकर उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और [[फॉरवर्ड ब्लॉक]] के नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली। उसके बाद जब उन्हें लगा कि गान्धी जी सरकार से मिलकर उनके काम में रोड़ा अटकाते ही रहेंगे तो उन्होंने एक दिन हिन्दुस्तान छोड़ दिया और [[जापान]] पहुँचकर आई॰ एन॰ ए॰ अर्थात् [[आजाद हिन्द फौज]] की कमान सम्हाल ली। दूसरे विश्व युद्ध में [[इंग्लैण्ड]] को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी ने आजाद हिन्द फौज को "दिल्ली चलो" का नारा दिया, गान्धी जी ने मौके की नजाकत को भाँपते हुए ८ अगस्त १९४२ की रात में ही [[बम्बई]] से अँग्रेजों को "भारत छोड़ो" व भारतीयों को "करो या मरो" का आदेश जारी किया और सरकारी सुरक्षा में यरवदा ([[पुणे]]) स्थित [[आगा खान पैलेस]] में चले गये। ९ अगस्त १९४२ के दिन इस आन्दोलन को [[लालबहादुर शास्त्री]] सरीखे एक छोटे से व्यक्ति ने प्रचण्ड रूप दे दिया। १९ अगस्त,१९४२ को शास्त्री जी गिरफ्तार हो गये। ९ अगस्त १९२५ को ब्रिटिश सरकार का तख्ता पलटने के उद्देश्य से 'बिस्मिल' के नेतृत्व में ''हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ'' के दस जुझारू कार्यकर्ताओं ने काकोरी काण्ड किया था जिसकी यादगार ताजा रखने के लिये पूरे देश में प्रतिवर्ष ९ अगस्त को "काकोरी काण्ड स्मृति - दिवस" मनाने की परम्परा भगत सिंह ने प्रारम्भ कर दी थी और इस दिन बहुत बड़ी संख्या में नौजवान एकत्र होते थे। गान्धी जी ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत ९ अगस्त १९४२ का दिन चुना था। ९ अगस्त १९४२ को दिन निकलने से पहले ही काँग्रेस वर्किंग कमेटी के सभी सदस्य गिरफ्तार हो चुके थे और काँग्रेस को गैरकानूनी संस्था घोषित कर दिया गया। गान्धी जी के साथ भारत कोकिला [[सरोजिनी नायडू]] को यरवदा (पुणे) के आगा खान पैलेस में सारी सुविधाओं के साथ, [[डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद]] को [[पटना]] जेल में व अन्य सभी सदस्यों को [[अहमदनगर]] के किले में नजरबन्द रखने का नाटक [[ब्रिटिश साम्राज्य]] ने किया था ताकि जनान्दोलन को दबाने में बल-प्रयोग से इनमें से किसी को कोई हानि न हो। सरकारी आँकड़ों के अनुसार इस जनान्दोलन में ९४० लोग मारे गये १६३० घायल हुए,१८००० डी० आई० आर० में नजरबन्द हुए तथा ६०२२९ गिरफ्तार हुए। आन्दोलन को कुचलने के ये आँकड़े [[दिल्ली]] की सेण्ट्रल असेम्बली में ऑनरेबुल होम मेम्बर ने पेश किये थे। सन् १९४३ से १९४५ तक नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने [[आजाद हिन्द फौज]] का नेतृत्व किया। उनके सैनिक "सरफरोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है; देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है?" जैसा ''सम्बोधि - गीत'' और "कदम-कदम बढाये जा, खुशी के गीत गाये जा; ये जिन्दगी है कौम की, तू कौम पे लुटाये जा!" सरीखे ''कौमी-तराने'' फौजी बैण्ड की धुन के साथ गाते हुए [[सिंगापुर]] के रास्ते [[कोहिमा]](नागालैण्ड) तक आ पहुँचे। तभी [[जापान]] पर अमरीकी परमाणु हमले के कारण नेताजी को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी। वे विमान से [[रूस]] जाने की तैयारी में जैसे ही फारमोसा के ताईहोकू एयरबेस से उड़े कि १८ अगस्त १९४५ को उनके ९७-२ मॉडल हैवी बॉम्बर प्लेन में आग लग गयी। उन्हें घायल अवस्था में ताईहोकू ''आर्मी हॉस्पिटल'' ले जाया गया जहाँ रात ९ बजे उनकी मृत्यु हो गयी।<ref>{{cite book |last1=क्रान्त |first1=मदनलाल वर्मा |authorlink1= |last2= |first2= |editor1-first= |editor1-last= |editor1-link= |others= |title=स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास |url=http://www.worldcat.org/title/svadhinata-sangrama-ke-krantikari-sahitya-ka-itihasa/oclc/271682218 |format= |accessdate=14 मई 2014 |edition=1 |series= |volume=3 |date= |year=2006 |month= |origyear= |publisher=[[प्रवीण प्रकाशन]] |location=[[नई दिल्ली]] |isbn=81-7783-121-6 |oclc= |doi= |id= |page=846 |pages= |chapter= |chapterurl= |quote= |bibcode= |laysummary= |laydate= |separator= |postscript= |lastauthoramp= |archive-url=https://web.archive.org/web/20131014175453/http://www.worldcat.org/title/svadhinata-sangrama-ke-krantikari-sahitya-ka-itihasa/oclc/271682218 |archive-date=14 अक्तूबर 2013 |url-status=live }}</ref> नेताजी की मौत और आजाद हिन्द फौज के अधिकारियों पर मुकदमे की खबर ने पूरे हिन्दुस्तान में तूफान मचा दिया। इसके फलस्वरूप [[दूसरे विश्वयुद्ध]] के बाद बम्बई बन्दरगाह पर उतरे नौसैनिकों ने बगावत कर दी। १८ फ़रवरी १९४६ को [[बम्बई]] से शुरू हुआ यह ''नौसैनिक विद्रोह'' देश के सभी बन्दरगाहों व महानगरों में फैल गया। २१ फ़रवरी १९४६ को [[ब्रिटिश]] आर्मी ने बम्बई पहुँच कर हमारे नौसैनिकों पर गोलियाँ चलायीं जिसके परिणामस्वरूप केवल २२ फ़रवरी १९४६ को ही २२८ लोग मारे गये तथा १०४६ घायल हुए। यह उस समय का सबसे भयंकर दमन था जो क्रूर ब्रिटिश सरकार ने हिन्दुस्तान में किया।<ref>{{cite book |last1=क्रान्त |first1= |authorlink1= |last2= |first2= |editor1-first= |editor1-last= |editor1-link= |others= |title=स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास |url=http://www.worldcat.org/title/svadhinata-sangrama-ke-krantikari-sahitya-ka-itihasa/oclc/271682218 |format= |accessdate=10 मई 2014 |edition=1 |series= |volume=1 |date= |year=2006 |month= |origyear= |publisher=प्रवीण प्रकाशन |location=नई दिल्ली |isbn=81-7783-119-4 |oclc= |doi= |id= |page=66 |pages= |chapter= |chapterurl= |quote= |ref= |bibcode= |laysummary= |laydate= |separator= |postscript= |lastauthoramp= |archive-url=https://web.archive.org/web/20131014175453/http://www.worldcat.org/title/svadhinata-sangrama-ke-krantikari-sahitya-ka-itihasa/oclc/271682218 |archive-date=14 अक्तूबर 2013 |url-status=live }}</ref>
सारांश:
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