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== मुगलों से संघर्ष == [[चित्र:Death of Afzal Khan.jpg|right|thumb|300px|शिवाजी द्वारा अफजल खान का वध ; २०वीं शतादी के आरम्भिक काल में [[सावलाराम लक्ष्मण हलदणकर|सालाराम हलदन्कर]] द्वारा चित्रित)]] [[उत्तर भारत]] में बादशाह बनने की होड़ खत्म होने के बाद [[औरंगज़ेब|औरंगजेब]] का ध्यान [[दक्षिण]] की तरफ गया। वो शिवाजी की बढ़ती प्रभुता से परिचित था और उसने शिवाजी पर नियन्त्रण रखने के उद्येश्य से अपने मामा शाइस्ता खाँ को दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया। शाइस्का खाँ अपने 1,50,000 फ़ौज लेकर सूपन और चाकन के दुर्ग पर अधिकार कर पूना पहुँच गया। उसने ३ साल तक मावल में लुटमार कि। एक रात शिवाजी ने अपने 350 मवलो के साथ उनपर हमला कर दिया। शाइस्ता तो खिड़की के रास्ते बच निकलने में कामयाब रहा पर उसे इसी क्रम में अपनी चार अंगुलियों से हाथ धोना पड़ा। शाइस्ता खाँ के पुत्र [[अबुल फतह]] तथा चालीस रक्षकों और अनगिनत सैनिकों का कत्ल कर दिया गया।यहॉ पर मराठों ने अन्धेरे मे स्त्री पुरूष के बीच भेद न कर पाने के कारण खान के जनान खाने की बहुत सी औरतों को मार डालाथा। इस घटना के बाद [[औरंगज़ेब|औरंगजेब]] ने शाइस्ता को दक्कन के बदले [[बंगाल]] का सूबेदार बना दिया और शाहजादा मुअज्जम शाइस्ता की जगह लेने भेजा गया। === [[सूरत]] में लूट === इस जीत से शिवाजी की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। 6 साल शाईस्ता खान ने अपनी 1,50,000 फ़ौज लेकर राजा शिवाजी का पुरा मुलुख जलाकर तबाह कर दिया था। इस लिए उस् का हर्जाना वसूल करने के लिये शिवाजी ने [[मुग़ल साम्राज्य|मुगल]] क्षेत्रों में लूटपाट मचाना आरम्भ किया। [[सूरत]] उस समय पश्चिमी व्यापारियों का गढ़ था और [[हिन्दुस्तानी भाषा|हिन्दुस्तानी]] मुसलमानों के लिए [[हज]] पर जाने का द्वार। यह एक समृद्ध नगर था और इसका बंदरगाह बहुत महत्वपूर्ण था। शिवाजी ने चार हजार की सेना के साथ 1664 में छः दिनों तक सूरत के धनाड्य व्यापारियों को लूटा। आम आदमी को उन्होनें नहीं लूटा और फिर लौट गए। इस घटना का ज़िक्र [[डच]] तथा [[अंग्रेजों]] ने अपने लेखों में किया है। उस समय तक यूरोपीय व्यापारियों ने [[भारत]] तथा अन्य एशियाई देशों में बस गये थे। [[नादिर शाह]] के भारत पर आक्रमण करने तक (1739) किसी भी य़ूरोपीय शक्ति ने [[भारतीय]] [[मुग़ल साम्राज्य|मुगल साम्राज्य]] पर आक्रमण करने की नहीं सोची थी। [[सूरत]] में शिवाजी की लूट से खिन्न होकर [[औरंगज़ेब|औरंगजेब]] ने [[इनायत खाँ]] के स्थान पर गयासुद्दीन खां को [[सूरत]] का फौजदार नियुक्त किया। और शहजादा मुअज्जम तथा उपसेनापति राजा जसवंत सिंह की जगह दिलेर खाँ और राजा जयसिंह की नियुक्ति की गई। राजा जयसिंह ने बीजापुर के सुल्तान, यूरोपीय शक्तियाँ तथा छोटे सामन्तों का सहयोग लेकर शिवाजी पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में शिवाजी को हानि होने लगी और हार की सम्भावना को देखते हुए शिवाजी ने सन्धि का प्रस्ताव भेजा। जून 1665 में हुई इस सन्धि के मुताबिक शिवाजी 23 दुर्ग मुग़लों को दे देंगे और इस तरह उनके पास केवल 12 दुर्ग बच जाएँगे। इन 23 दुर्गों से होने वाली आमदनी 4 लाख हूण सालाना थी। बालाघाट और कोंकण के क्षेत्र शिवाजी को मिलेंगे पर उन्हें इसके बदले में 13 किस्तों में 40 लाख हूण अदा करने होंगे। इसके अलावा प्रतिवर्ष 5 लाख हूण का राजस्व भी वे देंगे। शिवाजी स्वयं [[औरंगज़ेब|औरंगजेब]] के दरबार में होने से मुक्त रहेंगे पर उनके पुत्र शम्भाजी को मुगल दरबार में खिदमत करनी होगी। बीजापुर के ख़िलाफ़ शिवाजी मुगलों का साथ देंगे। === आगरा में आमंत्रण और पलायन === शिवाजी को [[आगरा]] बुलाया गया जहाँ उन्हें लगा कि उन्हें उचित सम्मान नहीं मिल रहा है। इसके विरोध में उन्होंने अपना रोश भरे दरबार में दिखाया और [[औरंगज़ेब|औरंगजेब]] पर विश्वासघात का आरोप लगाया। [[औरंगज़ेब|औरंगजेब]] इससे क्षुब्ध हुआ और उसने शिवाजी को नजरबन्द कर दिया और उनपर 5000 सैनिकों के पहरे लगा दिये। कुछ ही दिनों बाद (18 अगस्त 1666 को) राजा शिवाजी को मार डालने का इरादा औरंगजेब का था। लेकिन अपने अदम्य साहस ओर युक्ति के साथ शिवाजी और सम्भाजी दोनों इससे भागने में सफल रहे[17 अगस्त 1666। सम्भाजी को [[मथुरा]] में एक विश्वासी ब्राह्मण के यहाँ छोड़ शिवाजी महाराज [[वाराणसी|बनारस]], [[गये]], [[पुरी]] होते हुए सकुशल राजगढ़ पहुँच गए [2 सितम्बर 1666]। इससे मराठों को नवजीवन सा मिल गया। [[औरंगज़ेब|औरंगजेब]] ने जयसिंह पर शक करके उसकी हत्या विष देकर करवा डाली। जसवंत सिंह के द्वारा पहल करने के बाद सन् 1668 में शिवाजी ने मुगलों के साथ दूसरी बार सन्धि की। [[औरंगज़ेब|औरंगजेब]] ने शिवाजी को राजा की मान्यता दी। शिवाजी के पुत्र शम्भाजी को 5000 की मनसबदारी मिली और शिवाजी को [[पुणे|पूना]], चाकन और सूपा का जिला लौटा दिया गया। पर, सिंहगढ़ और पुरन्दर पर मुग़लों का अधिपत्य बना रहा। सन् 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लूटा। नगर से 132 लाख की सम्पत्ति शिवाजी के हाथ लगी और लौटते वक्त उन्होंने [[मुग़ल साम्राज्य|मुगल]] सेना को [[सूरत]] के पास फिर से हराया।
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