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==आदर्शवाद का मूल्यांकन== किसी वस्तु, क्रिया अथवा विचार का मूल्यांकन किन्ही पूर्व निश्चित मानदण्डों के आधार पर किया जाता है। ये मानदण्ड व्यक्तिगत भी हो सकते हैं और सामाजिक भी, मनोवैज्ञानिक भी हो सकते हैं और वैज्ञानिक भी, अल्पमान्य भी हो सकते हैं और बहुमान्य भी। जो मानदण्ड जितना अधिक वस्तुनिष्ठ होता है और जितने अधिक व्यक्तियों को मान्य होता है। वह उतना ही अधिक अच्छा मानदण्ड माना जाता है। यहाँ ऐसा ही प्रयास किया गया है और आदर्शवादी शिक्षा का मूल्यांकन भारतीय समाज की वर्तमान परिस्थितियों और भविष्य की संभावनाओं एवं आकांक्षाओं के आधार पर किया गया है। यदि उपर्युक्त वर्णित शिक्षा के विभिन्न अंगों के सम्बन्ध में आदर्शवादियों द्वारा प्रस्तुत विचारों के सन्दर्भ में आदर्शवाद का मूल्यांकन करें तो हमें उसके बहुत से गुण एवं दोषों का पता चलता है। [[शिक्षा]] के सन्दर्भ में आदर्शवाद के प्रभाव, गुण अथवा योगदान निम्नलिखित हैं- (१) आदर्शवादियों ने शिक्षा के जिन उद्देश्यों को प्रस्तावित किया है, उनसे बालकों के उत्तम चरित्र का निर्माण होता है। उन्होने शिक्षा का एक उल्लेखनीय उद्देश्य बालकों में सत्यं, शिवं एवं सुन्दरं ऐसे गुणों का विकास माना है जो अच्छे चरित्र के आधार स्तम्भ हैं। (२) शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण करने में आदर्शवाद ने अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत की है। आदर्शवादी विचारकों के अनुसार बालक एक शास्त्रीय प्राणी के रूप में कुछ मूल प्रवृत्तियों को लेकर जन्म लेता है और उसे समाज का सुसंस्कृत सदस्य बनाने के लिए शिक्षा ही एक मुख्य साधन है। अतः वे शिक्षा के उद्देश्यों पर विस्तृत रूप से विचार करते हैं। (३) आदर्शवाद शिक्षा में शिक्षक को सर्वोपरि स्थान प्रदान करता है। इससे शिक्षा-जगत में शिक्षक को गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त होता है साथ ही बालक और समाज दोनों के हित के लिए अत्यावश्यक है। (४) आदर्शवाद ने ‘आत्मानुशासन’ एवं ‘आत्मनियंत्रण’ के ऐसे सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है जिनका अनुगमन कर आज छात्रों में बढ़ती हुई अनुशासनहीनता एवं तनाव की समस्या का समाधान किया जा सकता है। (५) आदर्शवादी शिक्षा में व्यक्ति और समाज दोनों के हित को ध्यान में रखते हुए व्यक्तिगत एवं सामाजिक मूल्यों को समान महत्व दिया गया है। (६) आदर्शवाद ने अपनी शिक्षा-योजना में बालक के व्यक्तित्व का आदर कर शिक्षा प्रक्रिया के दोनों धु्रवों अर्थात् शिक्षक एवं शिक्षार्थी को महत्व दिया है। आदर्शवाद से ही प्रभावित होकर आज सभी लोग बालकों के ‘आदर्श व्यक्तित्व’ पर बल देते हैं। (७) आदर्शवादी शिक्षा आध्यात्मिक, धार्मिक तथा नैतिक गुणों के विकास पर अधिक बल देती है। ====दोष==== आदर्शवादी शिक्षा में उपर्युक्त गुणों के होते हुए कतिपय दोष भी पाये जाते हैं- (१) आदर्शवाद ने शिक्षा के जो उद्देश्य निर्धारित किये हैं वे इतने अधिक ‘अमूर्त’ तथा सूक्ष्म हैं कि एक सामान्य बुद्धि के व्यक्ति को उनको समझना अति कठिन है। ये अमूर्त एवं सूक्ष्म उद्देश्य वर्तमान से संबंधित न होकर भविष्य से सम्बन्धित होते हैं। (२) यह दर्शन बालक एवं उसकी प्रकृति की अपेक्षा शिक्षक एवं आदर्श को प्रधानता देता है और इस प्रकार ‘बाल केन्द्रित शिक्षा’ ‘बाल केन्द्रित पाठ्यक्रम’ तथा ‘बाल केन्द्रित शिक्षण पद्धति’ से सम्बन्धित आधुनिक विचारों की उपेक्षा हो जाती है। जो आज के युग के लिए बिल्कुल न्याय संगत नहीं है। (ग्ग्ग्) आदर्शवाद पाठ्यक्रम में आध्यात्मिक विषयों पर अधिक महत्व देता है और व्यावहारिक जीवन से सम्बन्धित विषयों पर अधिक ध्यान नहीं दिया है। इस प्रकार का पाठ्यक्रम भले ही प्राचीन आदर्श समाजों के लिए लाभप्रद सिद्ध होता हो किन्तु आज के औद्योगिक युग में इस प्रकार के पाठ्यक्रम का कोई महत्व नहीं है। (३) आदर्शवाद ने शिक्षा के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों का निर्धारण तो किया किन्तु किसी निश्चित शिक्षण विधि का प्रतिपादन नहीं किया। इसमें जो विधियाँ बतलाई भी गयी हैं वे रटने पर अधिक बल देती हैं। ये विधियाँ अवैज्ञानिक हैं। उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हुआ कि किस प्रकार यह दार्शनिक विचारधारा ‘मन’ ‘विचार’ अथवा ‘आदर्श’ को सत्य एवं वास्तविक मानती है और इस भौतिक संसार को एक भ्रम अथवा प्रतिरूप मानती हैं। शिक्षा के सन्दर्भ में आदर्शवाद के विषय में कहा जा सकता है कि अनेक गुणों से परिपूर्ण होते हुए भी आज के भौतिकवादी दृष्टिकोण से पूर्ण दोष रहित नहीं माना जाता है, फिर भी आज के भौतिकवादी युग में व्याप्त संघर्ष, कलह एवं वैमनस्य की समाप्ति के लिए पुनः आदर्शवादी विचारधारा को जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनाना होगा।
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