सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
मीमांसा दर्शन
" (अनुभाग) सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
=== विधि का भेद === वेद वाक्यार्थ निर्णय के लिए प्रवृत्त मीमांसा दर्शन में चार प्रकार की विधि का प्रतिपादन किया गया है - (1) '''उत्त्पत्तिविधि''' : जिस वाक्य से कर्म स्वरूप की कत्र्तव्यता प्रथमत: विदित होती हो उसे उत्पत्तिविधि कहते हैं। उदाहरणार्थ "अग्निहोत्रं जुहोति" इस वाक्य से अग्निहोत्र नामक होम से इष्ट को प्राप्त करना अर्थ होता है। (2) '''विनियोगविधि''' : अंगप्रधान का संबंध जिस विधिवाक्य से ज्ञात होता है, उसे विनियोगविधि कहते हैं। उदाहरणार्थ "दध्ना जुहोति" इस वाक्य से दही से हवन करने का अर्थ बोधित होता है। इसमें दधि साधन है और होम साध्य है। यहाँ विनियोग विधि में विनियोग शब्द से संबंध को समझना चाहिए। वह संबंध साध्य-साधन-भाव, अंगांगि भाव अथवा शेषशेषी भाव में समाप्त होता है। (3) '''प्रयोगविधि''' : जो प्रधान और अंग के अनुष्ठान में क्रम का बोध कराता है उसे प्रयोगविधि कहते हैं। उदाहरणार्थ प्रयाजादि अंग से उपकृत प्रधान दर्शपूर्णमास याग से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इसी अभिप्राय से लक्षण किया गया है "अंगानां क्रमबोधको विधि; प्रयोगविधि:" (4) '''अधिकारविधि''' : जिस विधि से कर्मजन्य फल का भोक्ता कर्ता को माना जाता हो उसे अधिकारविधि कहते हैं। उदाहरणार्थ "यजेत स्वर्ग काम:" यहाँ जो यागकर्ता है वही स्वर्गफल का भोक्ता है। इसी प्रकार से अपूर्व विधि, नियम विधि और परिसंख्या विधि के भेद से तीन प्रकार की विधियाँ प्रसिद्ध हैं - * (क) जो अत्यंत अप्राप्य विषय का विधान करता हो उसे '''अपूर्व विधि''' कहते हैं। उदाहरणार्थ "ब्रीहीन् प्रोक्षति, दर्शपूर्ण मासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत" यहाँ ब्रीही में प्रोक्षण क्रिया का विधान है और दर्शपूर्णमास में स्वर्ग के साधन का विधान है। यह बात उपर्युक्त वाक्यों के अतिरिक्त अन्य प्रमाणों से सर्वदा और सर्वथा अप्राप्त है। अत: यह अपूर्वविधि है। * (ख) जो पक्ष प्राप्त अर्थ को नियमित (अप्राप्तांश पूरक) करता है उसे '''नियमविधि''' कहते हैं। उदाहरणार्थ "ब्रीहीन् अवहंति"। यहाँ वैतुष्य के प्रति अवधात साधन है। ऐसे ही अश्म कुट्टनादि साधन है। जो पुरुष शास्त्रीय उपाय अवधात को त्यागकर अश्म कुट्टनादि या नखविदलनादि से वैतुष्य करता हो उसे शास्त्रीय विधि के अनुसार अवधात से ही वैतुष्य करना चाहिए - "ब्रीहीनवहन्यादेव" यहाँ अवधात के प्रत्यक्ष होने पर भी अवधात नियम अप्रत्यक्ष है। * (ग) जहाँ एक काल में दो समुच्चय से प्राप्त हों और उनमें एक की व्यावृत्ति (निवृत्ति) करना ही जिसका फल हो उसे '''परिसंख्या विधि''' कहते हैं। उदाहरणार्थ - 'पंच पंचनखा भक्ष्या:' यह पंचनख भक्षण राग प्राप्त होने के कारण इसका विधान नहीं करता। पंचनखेतर पंचनख भक्षण भी प्राप्त है अर्थात् राग से पंचनखवाले पाँच का भक्षण जैसे प्राप्त होता है वैसे ही पंचनख से भिन्न पंचनखवालों का भी भक्षण रागत: प्राप्त है। इसलिए यहाँ अपूर्व विधि या नियम विधि नहीं। पंचेतर पंचनख भक्षण निवृत्ति है। इसलिए यह परिसंख्याविधि का उदाहरण है। नियम विधि में इतर निवृत्ति का वाचक शब्द नहीं किंतु अर्थात् होती है। परिसंख्या विधि में इतर निवृत्ति का बोधक शब्द रहता है। एवकार का दोनों में प्रयोग होता है। लेकिन नियमविधि में एवकार अयोग व्यावृत्ति का बोधक है और परिसंख्याविधि में एवकार अन्य योग व्यावृत्ति का बोधक है। ऊपर विधियों के दो प्रकार बताए गए हैं, उसे इस प्रकार समझना चाहिए कि अपूर्वविधि में उत्पत्ति, विनियोग प्रयोग और अधिकार विधि चारों अंतर्गत होते हैं। नियम तथा परिसंख्या विधि, विनियोग विधि में ही अंतर्गत है। इस विषय का विशेष ज्ञान भाट्ट चिंतामणि में द्रष्टव्य है।
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)