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== महत्त्व एवं प्रासंगिकता == राजकपूर की फिल्मों की दीर्घकालिक महत्ता एवं लोकप्रियता के संबंध में जयप्रकाश चौकसे ने लिखा है कि : {{quote|"राजकपूर के जीवनकाल में उनके द्वारा निर्मित-निर्देशित फिल्मों ने, उनके लिए जितना लाभ कमाया, उससे हजार गुना अधिक धन, उनकी मृत्यु के बाद विगत इक्कीस वर्षों में कमाया है। प्रति तीन वर्ष सैटेलाइट पर प्रदर्शन के अधिकार अकल्पनीय धन में बिकते रहे हैं और यह सिलसिला आज भी जारी है। उनके समकालीन किसी भी फिल्मकार की रचनाओं को ये दाम नहीं मिले हैं।"<ref>जयप्रकाश चौकसे (2010). राजकपूर : सृजन प्रक्रिया. नयी दिल्ली: राजकमल प्रकाशन। पृ॰-11.</ref>}} उनकी प्रासंगिकता के संबंध में उदाहरणस्वरूप जयप्रकाश चौकसे ने लिखा है कि : {{quote|"[[सूरज बड़जात्या]] की पहली फिल्म 'मैंने प्यार किया' का सफल प्रदर्शन हुआ और फिल्म के लिए श्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार लेते हुए बड़जात्या ने कहा कि राजकपूर की फिल्मों ने उन्हें प्रेरित किया है और पाठ्यक्रम की तरह, वे इन फिल्मों को बार-बार देखते हैं। युवा पीढ़ी के [[करण जौहर]] और [[आदित्य चोपड़ा]] भी राजकपूर की फिल्मों से प्रेरणा लेते हैं।"<ref>जयप्रकाश चौकसे (2010). राजकपूर : सृजन प्रक्रिया. नयी दिल्ली: राजकमल प्रकाशन। पृ॰-12.</ref>}} राजकपूर की बहुआयामिता एवं सार्वकालिक महत्ता के संदर्भ में सिनेमा संबंधी अनेक पुस्तकों के लेखक डॉ॰ सी॰ भास्कर राव ने लिखा है कि : {{quote|"वे भारतीय सिनेमा के एक ऐसे कलाकार थे, जिनकी तुलना अन्य किसी कलाकार से नहीं की जा सकती है। सिनेमा का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसका ज्ञान और अनुभव उन्हें नहीं रहा हो। सिनेमा उनमें बसता था और वे खुद सिनेमा को जीते थे, यही कारण है कि वे एक मिसाल बन गए।... उनकी कामयाबी और ऊँचाई तक कोई भी पहुँच नहीं पाया है। ...उन्हें अपने अभिनय के लिए दस सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में एक माना गया।... उन्हें सदी के सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सदी के सर्वश्रेष्ठ शो मैन का सम्मान भी प्रदान किया गया।... उन्हें सिनेमा का सबसे बड़ा शो मैन माना जाता है, लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वे सिर्फ व्यावसायिक फिल्में ही बनाते थे। उनकी अधिकांश फिल्मों में व्यावसायिकता, कलात्मकता, साहित्यिकता और सामाजिकता का सम्मोहक सम्मिश्रण मिलता है। वास्तव में वे एक हरफनमौला सिने व्यक्तित्व थे। उनकी फिल्मों का हर पक्ष इतना सधा हुआ होता था कि हिन्दी सिनेमा का हर दर्शक उससे मुग्ध हो जाता था। वे हिन्दी और भारतीय सिनेमा के वैसे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने उसे एक विश्वमंच प्रदान किया।... नायक तो सिनेमा के क्षेत्र में बहुतेरे हुए, पर राज जैसे नायक सदियों में कोई एक ही होता है।"<ref>{{cite book |last1=डॉ० सी० भास्कर |first1=राव |title=दादा साहब फाल्के पुरस्कार विजेता, भाग-1 |date=2014 |publisher=शारदा प्रकाशन |location=दरियागंज, नयी दिल्ली |isbn=978-93-82196-00-6 |pages=178,183,189 |edition=प्रथम}}</ref>}}
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