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====दोष==== आदर्शवादी शिक्षा में उपर्युक्त गुणों के होते हुए कतिपय दोष भी पाये जाते हैं- (१) आदर्शवाद ने शिक्षा के जो उद्देश्य निर्धारित किये हैं वे इतने अधिक ‘अमूर्त’ तथा सूक्ष्म हैं कि एक सामान्य बुद्धि के व्यक्ति को उनको समझना अति कठिन है। ये अमूर्त एवं सूक्ष्म उद्देश्य वर्तमान से संबंधित न होकर भविष्य से सम्बन्धित होते हैं। (२) यह दर्शन बालक एवं उसकी प्रकृति की अपेक्षा शिक्षक एवं आदर्श को प्रधानता देता है और इस प्रकार ‘बाल केन्द्रित शिक्षा’ ‘बाल केन्द्रित पाठ्यक्रम’ तथा ‘बाल केन्द्रित शिक्षण पद्धति’ से सम्बन्धित आधुनिक विचारों की उपेक्षा हो जाती है। जो आज के युग के लिए बिल्कुल न्याय संगत नहीं है। (ग्ग्ग्) आदर्शवाद पाठ्यक्रम में आध्यात्मिक विषयों पर अधिक महत्व देता है और व्यावहारिक जीवन से सम्बन्धित विषयों पर अधिक ध्यान नहीं दिया है। इस प्रकार का पाठ्यक्रम भले ही प्राचीन आदर्श समाजों के लिए लाभप्रद सिद्ध होता हो किन्तु आज के औद्योगिक युग में इस प्रकार के पाठ्यक्रम का कोई महत्व नहीं है। (३) आदर्शवाद ने शिक्षा के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों का निर्धारण तो किया किन्तु किसी निश्चित शिक्षण विधि का प्रतिपादन नहीं किया। इसमें जो विधियाँ बतलाई भी गयी हैं वे रटने पर अधिक बल देती हैं। ये विधियाँ अवैज्ञानिक हैं। उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हुआ कि किस प्रकार यह दार्शनिक विचारधारा ‘मन’ ‘विचार’ अथवा ‘आदर्श’ को सत्य एवं वास्तविक मानती है और इस भौतिक संसार को एक भ्रम अथवा प्रतिरूप मानती हैं। शिक्षा के सन्दर्भ में आदर्शवाद के विषय में कहा जा सकता है कि अनेक गुणों से परिपूर्ण होते हुए भी आज के भौतिकवादी दृष्टिकोण से पूर्ण दोष रहित नहीं माना जाता है, फिर भी आज के भौतिकवादी युग में व्याप्त संघर्ष, कलह एवं वैमनस्य की समाप्ति के लिए पुनः आदर्शवादी विचारधारा को जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनाना होगा।
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