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=== शिया और सुन्नी वर्गों की नींव === {{seealso|शिया इस्लाम}} {{seealso|सुन्नी इस्लाम}} अली के बाद हालांकि मुआविया खलीफा बन गये लेकिन मुसलमानों का एक वर्ग रह गया जिसका मानना था कि मुसलमानों का खलीफा मुहम्मद साहब के परिवार का ही हो सकता है। उनका मानना था कि यह खलीफा (जिसे वह ईमाम भी कहते थे) स्वयँ भगवान के द्वारा आध्यात्मिक मार्गदर्शन पाता है। इनके अनुसार अली पहले ईमाम थे। यह वर्ग [[शिया इस्लाम|शिया]] वर्ग के नाम से प्रसिद्ध हुआ।<ref>{{cite web|url=http://www.bbc.com/hindi/india/2016/09/160913_lucknow_shia_sunni_dispute_ra|title=शिया-सुन्नी विवाद की जड़ क्या है?|access-date=22 नवंबर 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20171201122518/http://www.bbc.com/hindi/india/2016/09/160913_lucknow_shia_sunni_dispute_ra|archive-date=1 दिसंबर 2017|url-status=live}}</ref> बाकी मुसलमान, जो की यह नहीं मानते हैं कि मुहम्मद साहब का परिवारजन ही खलीफा हो सकता है, [[सुन्नी इस्लाम|सुन्नी]] कहलाये।<ref>{{cite web|url=http://www.bbc.com/hindi/international/2014/06/140622_shia_sunni_conflict_aa|title=दुनियाभर में क्यों भिड़े हैं शिया और सुन्नी?|access-date=22 नवंबर 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20171203011229/http://www.bbc.com/hindi/international/2014/06/140622_shia_sunni_conflict_aa|archive-date=3 दिसंबर 2017|url-status=live}}</ref> सुन्नी पहले चारों खलीफाओं को राशिदून खलीफा कहते हैं जिसका अर्थ है सही मार्ग पे चलने वाले खलीफा। मुआविया के खलीफा बनने के बाद खिलाफत वंशानुगत हो गयी। इससे [[उमय्यद ख़िलाफ़त]] का आरंभ हुआ। शिया इतिहास कारों के अनुसार मुआविया क बेटे यज़ीद ने खिलाफत प्राप्त करते ही इस्लाम की नीतिओ के विरुद्ध कार्य करना शुरू कर दिया, उसके कृत्य से धार्मिक मुसलमान असहज स्थिति में आ गए, अब यज़ीद को आयश्यकता थी की अपनी गलत नीतिओ को ऐसे व्यक्ति से मान्यता दिला दे जिस पर सभी मुस्लमान भरोसा करते हो, इस काम के लिए यज़ीद ने हज़रत मुहम्मद के नवासे, हज़रत अली अलैहिस सलाम और हज़रत मुहम्मद की इकलौती पुत्री फातिमा के पुत्र हज़रत हुसैन से अपनी खिलाफत पर मंजूरी करनी चाही परन्तु हज़रत हुसैन ने उसके इस्लाम की नीतिओ के विरुद्ध कार्य करने के कारण अपनी मंजूरी देने से मना कर दिया, हज़रत हुसैन के मना करने पर यज़ीद की फौजों ने हज़रत हुसैन और उनके ७२ साथियो पर पानी बंद कर दिया और बड़ी ही बेदर्दी के साथ उनका क़त्ल करके उनके घर वालो को बंधक बना लिया,कई सुन्नी इतिहास कारों ने भी अपनी पुस्तकों में यज़ीद को हुसैन के क़त्ल का ज़िम्मेदार माना है परन्तु ये सभी शिया इतिहास कारों से प्रेरित थे या इनके ज्ञान का असल केन्द्र शियाओं की गढी़ गयी बनू उमय्या के विरुद्ध झूठी कहानियां है। सुन्नी मत के बड़े विद्वानों इमाम अहमद बिन हंब्ल, इमाम गंज़ाली वगैरह ने यज़ीद को क़त्ले हुसैन करने का ज़िम्मेदार नहीं माना है। इस जंग में हुसैन को शहादत प्राप्ति हो गयी। शिया लोग १० [[मुहर्रम]] के दिन इसी का शोक मनाते हैं।
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