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== भूमि पूजन-स्पर्शन == === शिक्षण और प्रेरणा === बालक को सूतक के दिनों में जमीन पर नहीं बिठाते। नामकरण के बाद उसे भूमि पर बिठाते हैं, इससे पूर्व धरती का पूजन किया जाता है। प्रथम बार उस सम्पूजित भूमि पर बालक को बिठाते हैं। भूमि को लीपकर चौक पूरते हैं और उसका अक्षत, पुष्प, गन्ध, धूप आदि से पूजन करते हैं। भूमि को केवल मिट्टी ही न मानकर उसे देवभूमि, जन्मभूमि, धरती माता, भारतमाता मानकर सदैव उसके प्रति अपनी श्रद्धा-भक्ति का परिचय देना चाहिए। विश्व-माता, प्राणि-माता, भारत-माता, धरती-माता का वही सम्मान होना चाहिए, जो शरीर को जन्म देने वाली माता का होता है। अपनी सगी माता की तरह मातृभूमि की सेवा के लिए भी मनुष्य के मन में भावनाएँ रहनी चाहिए। मातृभूमि, विश्व वसुधा की रक्षा औरर सेवा के लिए जिससे त्याग एवं प्रयतन बन सके, करना चाहिए। देशभक्ति से मतलब समाज सेवा से ही है। देशवासी, साथी और सहयोगियों की सुविधा के लिए कुछ कार्य करना चाहिए। अपना पेट पालने, अपनी ही उन्नति और सुविधा चाहने की प्रवृत्ति ओछे लोगों में पाई जाती है। श्रेष्ठ व्यक्ति अपनी आन्तरिक महानता के अनुरूप घर तक ही अपनी ममता सीमित नहीं रखते, वरन् उसे व्यापक बनाते हैं। सुदूरवर्ती व्यक्ति भी अपने ही बन्धुबान्धव प्रतीत होते हैं और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की निष्ठा जम जाती है। ऐसे देशभक्त व्यक्ति समाज सेवा एवं लोकमंगल के कार्यों को अपने निजी लाभ एवं स्वार्थ से भी बढ़कर मानते हैं, इन्हीं की यशोगाथा इस संसार को सुरक्षित करती रहती है। भूमि स्पर्श करते हुए बालक को मातृभूमि की सेवा देशभक्ति की भावनाएँ जाग्रत् करने की शिक्षा दी जाती है। धरती माता की क्षमाशीलता प्रसिद्ध है। वह सबका भार अपने ऊपर उठाती है, अपनी छाती में अन्न, फल, रस, खनिज आदि विविध-विध पदार्थ उपजाकर प्राणियों का पालन करती है। लोग मल-मूत्र आदि से उसे गन्दा करते हैं, तो भी रुष्ट नहीं होती और वह सब सहन करती है। अपना अधिकांश भाग जल की शीतलता से भरे रहती है। विशाल सम्पदा की स्वामिनी होने पर इतराती नहीं, पुरुषार्थियों को उदारतापूर्वक अपनी सम्पत्ति का उपहार देती है। अपनी सभी सन्तानों को गोदी में लेकर अपनी निश्चित रीति-नीति के अनुसार गतिशील रहती है। भीतरी अग्नि को भीतर ही छिपी रहने देती है और बाहर से ठण्डी ही रहती है। भूमि में से पौधे आहार खींचते और बढ़ते हैं, परन्तु माली उनकी बाढ़ को सही दिशा देने के लिए उनकी साज-सँभाल के साथ-साथ काट-छाँट भी करता है। मातृभूमि के अनुदानों से बालक के विकास में भी माली जैसी सावधानी अभिभावकों को बरतनी चाहिए। === क्रिया और भावना === शिशु के माता-पिता हाथ में रोली, अक्षत, पुष्प आदि लेकर मन्त्र के साथ भूमि का पूजन करें। भावना की जाए कि धरती माता से इस क्षेत्र में बालक के हित के लिए श्रेष्ठ संस्कारों को घनीभूत करने की प्रार्थना की जा रही है। अपने आवाहन-पूजन से उस पुण्य-प्रक्रिया को गति दी जा रही है। मन्त्र पूरा होने पर पूजन सामग्री पर चढ़ाई जाए। <blockquote> '''ॐ मही द्यौः पृथिवी च न ऽ, इमं यज्ञं मिमिक्षताम्। पिपृतां नो भरीमभिः। ॐ पृथिव्यै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि, ध्यायामि।''' </blockquote> === स्पर्श क्रिया और भावना === माता बालक को मन्त्रोच्चार के साथ उस पूजित भूमि पर लिटा दे। सभी लोग हाथ जोड़कर भावना करें कि जैसे माँ अपनी गोद में बालक को अपने स्नेह-पुलकन के साथ जाने-अनजाने में श्रेष्ठ प्रवृत्ति और गहरा सन्तोष देती रहती है, वैसे ही माता वसुन्धरा इस बालक को अपना लाल मानकर गोद में लेकर धन्य बना रही है। <blockquote> '''ॐ स्योना पृथिवी नो, भवानृक्षरा निवेशनी। यच्छा नः शर्म सप्रथाः। अप नः शोशुचदघम्। - ३५.२१''' </blockquote>
सारांश:
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