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=== शब्द व्युत्पत्ति === कुष्ठरोग के लिये अंग्रेजी भाषा में प्रयुक्त ''लेप्रसी (Leprosy)'' शब्द प्राचीन ग्रीक भाषा के शब्द λέπρα [léprā], "एक बीमारी, जो त्वचा को छिलकेदार बना देती है”, से निर्मित है, जो कि स्वयं λέπω [lépō], "छीलना, निकालना " का एक संज्ञात्मक व्युत्पन्न है। यह शब्द लैटिन और प्राचीन फ्रेंच भाषा से होता हुआ अंग्रेजी भाषा में आया। अंग्रेजी में इसका पहला प्रमाणित प्रयोग ''एन्क्रीन विसे (Ancrene Wisse)'', 13वीं सदी में ननों के लिये बनी एक नियमपुस्तिका में है ("मॉयसेसेस हॉन्ड..बिसेम्डे ओ पे स्पाइटेल ऊएल एंड लेप्रुस” (("Moyseses hond..bisemde o þe spitel uuel & þuhte lepruse"). ''द मिडिल इंग्लिश डिक्शनरी'', एस.वी., “लेप्रस” (''The Middle English Dictionary'', s.v., "leprous"). एक मोटे तौर पर समकालीन प्रयोग ''सेंट ग्रेगरी के वार्तालाप (Dialogues of Saint Gregory)'' एंग्लो-नॉर्मन में साक्ष्यांकित है, "एस्मॉन्डेज़ आई सॉन्ट लि लीप्रस (Esmondez i sont li lieprous)" (''एंग्लो-नॉर्मन शब्दकोश'', एस.वी., “लेप्रस”) (''Anglo-Norman Dictionary'', s.v., "leprus"). ऐतिहासिक रूप से, हैन्सेन के रोग से ग्रस्त लोगों के ''कुष्ठरोगी (lepers)'' कहा जाता रहा है; हालांकि, कुष्ठरोग के मरीजों की घट रही संख्या और इस शब्दावली के निन्दात्मक संकेतार्थ के कारण यह शब्दावली प्रयोग से बाहर होती जा रही है।{{Citation needed|date=May 2010}} मरीजों पर लगने वाले कलंक के कारण, कुछ लोग “कुष्ठरोग (leprosy)” शब्द के प्रयोग को वरीयता नहीं देते, हालांकि यू. एस. सेंटर्स फॉर डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (U.S. Centers for Disease Control and Prevention) तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन) द्वारा इसी शब्द का प्रयोग किया जाता है।{{Citation needed|date=May 2010}} ऐतिहासिक रूप से, हिब्रू बाइबिल से मिली ''ज़ार्थ (Tzaraath)'' शब्दावली का अनुवाद, गलती से, आमतौर पर लेप्रसी (leprosy) के रूप में किया जाता था, हालांकि ज़ार्थ (Tzaraath) के लक्षण कुष्ठरोग के साथ पूरी तरह संगत नहीं थे और इसके बजाय इसका प्रयोग अनेक प्रकार के विकारों का उल्लेख करने के लिये किया जाता था, जो कि हैन्सेन के रोग से अलग थे।<ref>आर्टस्क्रोल तनाख, 6</ref> लेप्रसी (leprosy) शब्द के उल्लेख का पहला रिकॉर्ड लेविटिकस 13:2 (Leviticus 13:2) में मिलता है - "जब किसी पुरुष के मांस की त्वचा में, कोई उभार, कोई पपड़ी, या कोई चमकीला दाग़ होगा और मांस की त्वचा में यह कुष्ठरोग (leprosy) की महामारी के समान होगा; तो उसे पुजारी आरोन (Aaron the priest) के पास या उनके पुजारी पुत्रों में से किसी एक के पास तक लाया जाएगा." बाइबिल में भी सीरियाई नामन (Naaman) की एक प्रसिद्ध कथा है, “सीरिया के राजा का कप्तान (कैप्टन ऑफ़ द होस्ट ऑफ़ द किंग ऑफ़ सीरिया)" (2 किंग्ज़ 5:1) (2 Kings 5:1), जो त्वचा की यह और भीषण बीमारी से ग्रस्त था। विशिष्ट रूप से, डर्मेटोफाइट (dermatophyte) कवक ''ट्राइकोफिटॉन वायोलीसम (Trichophyton violaceum)'' के कारण टीनिया कैपिटिस (tinea capitis) (सिर की त्वचा का [[फफूंद|कवकीय]] संक्रमण) और शरीर के अन्य भागों में होने वाले संबंधित संक्रमण वर्तमान में पूरे मध्य-पूर्व में और उत्तरी अफ्रीका में अत्यधिक हैं और शायद वे बाइबिल के समय भी बहुत आम रहे होंगे. इसी प्रकार, ऐसा प्रतीत होता है कि कुरूप बना देने वाला त्वचा-रोग फेवस (favus), ''ट्राइकोफिटॉन स्कोएन्लेनी (Trichophyton schoenleinii)'', आधुनिक दवाओं के आगम से पूर्व पूरे यूरेशिया और अफ्रीका में आम था। तीव्र फेवस (favus) और इसी प्रकार की अन्य कवकीय बीमारियों से ग्रस्त (और संभवतः वे भी, जो तीव्र सोरियासिस (psoriasis) और अन्य बीमारियों, जो सूक्ष्मजीवों के कारण नहीं होतीं, से ग्रस्त थे) लोगों को यूरोप में 17वीं शताब्दी तक कुष्ठरोग से ग्रस्त के रूप में ही वर्गीकृत किया जाता था।<ref name="Kane_1997">{{cite book | author = Kane J, Summerbell RC, Sigler L, Krajden S, Land G | title = Laboratory Handbook of Dermatophytes: A clinical guide and laboratory manual of dermatophytes and other filamentous fungi from skin, hair and nails | publisher = Star Publishers (Belmont, CA)|year = 1997|isbn = 0898631572|oclc = 37116438}}</ref> यह 1667 में जैन डी ब्रे (Jan de Bray) द्वारा हार्लेम में ''द रेजेंट्स ऑफ द लेपर हॉस्पिटल (The Regents of the Leper Hospital)'' में प्रदर्शित एक चित्र में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है (फ़्रांस हाल्स संग्रहालय, हार्लेम, नीदरलैंड्स) (Frans Hals Museum, Haarlem, the Netherlands), जहां एक स्पष्ट रूप से सिर की त्वचा में हुए संक्रमण, जो कि लगभग निश्चित रूप से कवक के कारण हुआ है, से ग्रस्त एक युवा डच पुरुष का उपचार भी कुष्ठरोग से ग्रस्त लोगों के लिये बने एक धर्मार्थ चिकित्सालय के तीन अधिकारियों द्वारा ही किया जा रहा है।{{Citation needed|date= जनवरी 2009}} 19वीं सदी के मध्य काल, जब चिकित्सीय निदान के लिये त्वचा के सूक्ष्मदर्शीय परीक्षण का पहली बार विकास हुआ, से पूर्व तक, “लेप्रसी (leprosy)" शब्द के प्रयोग को शायद ही हैन्सेन के रोग के साथ उतने विश्वसनीय रूप से जोड़ा जा सकता है, जैसा कि इसे हम आज समझते हैं।{{Citation needed|date= जनवरी 2009}}
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