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==छन्दशास्त्र और गणित== [[Image:PascalTriangleAnimated2.gif|right|thumb|250px|पास्कल त्रिकोण की प्रथम पाँच पंक्तियाँ। पास्कल त्रिकोण को 'हलायुध त्रिकोण' भी कहते हैं। <ref name="ZawairaHitchcock2008p237">{{cite book|author1=Alexander Zawaira|author2=Gavin Hitchcock|title=A Primer for Mathematics Competitions|url=https://books.google.com/books?id=A21T73sqZ3AC&pg=PA237|year=2008|publisher=Oxford University Press|isbn=978-0-19-156170-2|page=237}}</ref> ]] सर्वाधिक आनन्ददायी ध्वनि का पता लगाने के लिए प्राचीन भारतीय विद्वानों ने [[क्रमचय-संचय|क्रमचय और संचय]] का उपयोग किया।<ref>{{cite book|author=Kim Plofker| title=Mathematics in India| url=https://books.google.com/books?id=DHvThPNp9yMC|year=2009| publisher=Princeton University Press| isbn=0-691-12067-6| pages=53–57}}</ref> [[पिङ्गल|पिंगल]] के [[छन्दशास्त्र|छन्दःसूत्रम्]] में द्वयाधारी प्रणाली (बाइनरी सिस्टम) का वर्णन है जिसके प्रयोग द्वारा वैदिक छान्दों के [[क्रमचय|क्रमचयों]] की गणना की जा सकती है।<ref name="Nooten 1993 pp. 31–50"/><ref name=sgoonatlakep126>{{cite book |title = Toward a Global Science | author = Susantha Goonatilake |publisher = Indiana University Press |year = 1998 |page = 126 |isbn = 978-0-253-33388-9 |url = https://books.google.com/books?id=SI5ip95BbgEC}}</ref><ref>{{cite book| author=Alekseĭ Petrovich Stakhov| title=The Mathematics of Harmony: From Euclid to Contemporary Mathematics and Computer Science| url=https://books.google.com/books?id=K6fac9RxXREC| year=2009| publisher=World Scientific| isbn=978-981-277-583-2| pages=426–427| access-date=4 नवंबर 2018| archive-url=https://web.archive.org/web/20190408011910/https://books.google.com/books?id=K6fac9RxXREC| archive-date=8 अप्रैल 2019| url-status=live}}</ref> पिंगल तथा क्लासिकी युग के छन्दशास्त्रियों ने '''मात्रामेरु''' की विधि का विकास किया। मात्रामेरु, एक संख्या-अनुक्रम (सेक्वेंस) है जो 0, 1, 1, 2, 3, 5, 8 आदि के क्रम में चलता है। इसे प्रायः [[हेमचन्द्र श्रेणी|फिबोनाकी श्रेणी]] कहा जाता है।<ref name="Nooten 1993 pp. 31–50">{{cite journal | last=Nooten | first=B. Van | title=Binary numbers in Indian antiquity | journal=J Indian Philos | publisher=Springer Science $\mathplus$ Business Media | volume=21 | issue=1 | year=1993 | pages=31–50 | doi=10.1007/bf01092744 }}</ref><ref name=sgoonatlakep126/><ref>{{cite book|author=Keith Devlin|title=The Man of Numbers: Fibonacci's Arithmetic Revolution|url=https://books.google.com/books?id=RFMmPGa0cisC&pg=PA145|year=2012|publisher=Bloomsbury Academic|isbn=978-1-4088-2248-7|page=145}}</ref> १०वीं शताब्दी के छन्दशास्त्री [[हलायुध]] ने [[छन्दशास्त्र|छन्दःसूत्र]] के अपने भाष्य में तथाकथित [[मेरु प्रस्तार|पास्कल त्रिकोण]] के प्रथम पाँच पंक्तियों का वर्णन किया है। हलायुध ने [[मेरु प्रस्तार|मेरुप्रस्तार]] नामक विधि का विकास किया जो वस्तुतः 'पास्कल त्रिकोण' का ही दूसरा रूप है। इसलिए गणित की पुस्तकों में अब पास्कल त्रिकोण के स्थान पर 'हलायुध त्रिकोण' लिखा जाने लगा है।<ref name="Nooten 1993 pp. 31–50"/><ref name="ZawairaHitchcock2008p237"/> ११वीं शताब्दी के छन्दशास्त्री रत्नाकरशान्ति ने अपने छन्दोरत्नाकर नामक ग्रन्थ में एक कलनविधि दी है जिसके द्वारा ''प्रत्ययों'' से छन्दों के द्विपद गुणक की गणना की जाती है। जो '''छः प्रत्यय''' प्रयुक्त होते हैं, वे ये हैं-<ref>प्रस्तारो नष्टमुद्दिष्टं एकद्वयादिलगक्रिया।<br>सङ्ख्या चैवाध्वयोगश्च षडेते प्रत्ययाः स्मृताः॥ (वृत्तरत्नाकर ६.१)</ref><ref>[http://www.advancedjournal.com/download/604/2-5-215-999.pdf छन्द-समीक्षा में प्रतिपादित छन्दोगणित की प्रासंगिकता] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20181105012155/http://www.advancedjournal.com/download/604/2-5-215-999.pdf |date=5 नवंबर 2018 }} (International Journal of Advanced Research and Development ; ISSN: 2455-4030, Impact Factor: RJIF 5.24 ; www.advancedjournal.com Volume 2; Issue 3; May 2017; Page No. 275-278)</ref> *(१) '''प्रस्तार''' (table of arrangement) : किसी दिए हुए 'लम्बाई' के लिए सभी सम्भव छन्दों की गणना करने (सारणी के रूप में व्यवस्थित करने) की विधि, *(२) '''नष्ट''' : सारणी में किसी छन्द का स्थान दिया हुआ हो तो उस छन्द की गणना करना (पूरी सारणी को बिना बनाए ) *(३) '''उद्दिष्ट''' : पूरी सारणी को बिना बनाए ही सारणी में किसी दिए हुए छन्द का स्थान ज्ञात करना *(४) '''लघुक्रिया''' या '''लगक्रिया''' : सारणी में स्थित उन छन्दों की संख्या की गणना करना जिनमें दी हुई संख्या में ''लघु'' (या, ''गुरु'') मात्राएँ हों। *(५) '''सङ्ख्यान''' : सारणी में स्थित सभी छन्दों की संख्या की गणना करना *(६) '''अध्वन''' या '''अध्वयोग''' : किसी दिए हुए लम्बाई (वर्ग) के प्रस्तार सारणी को लिखने के लिए आवश्यक स्थान की गणना
सारांश:
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