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== व्रत धारण == ;शिक्षण एवं प्रेरणा महानता की मंजिल पर मनुष्य एकाएक नहीं पहुँच जाता, उसके लिए एक-एक करके सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। श्रेष्ठ प्रवृत्तियाँ, आचरण एवं स्वभाव बनाने के लिए व्रतशील होकर चलना पड़ता है। छोटे ही सही, व्रत लेने, उन्हें पूरा करने, फिर नये व्रत लेने का क्रम विकास के लिए अनिवार्य है। व्रतशीलता के लिए कुछ देवशक्तियों को साक्षी करके व्रतशील बनने की घोषणा की जाती है। इन्हें अपना प्रेरक, निरीक्षक और नियंत्रक बनाना पड़ता है। सम्बन्धित देवशक्तियों की प्रेरणाएँ इस प्रकार हैं- अग्निदेव- ऊर्जा के प्रतीक। ऊर्जा, स्फुरणा, गर्मी, प्रकाश से भरे-पूरे रहने, अन्यों तक उसे फैलाने, दूसरों को अपना जैसा बनाने, ऊध्वर्गामी-आदशर्निष्ठ रहने, यज्ञीय चेतना के वाहन बनने की प्रेरणा के स्रोत। वायुदेव- स्वयं प्राणरूप, किन्तु बिना अहंकार सबके पास स्वयं पहुँचते हैं। कोई स्थान खाली नहीं छोड़ते, निरन्तर गतिशील। सुगन्धित और मेघों जैसे परोपकारी तत्त्वों के विस्तारक सहायक। सूयर्देव- जीवनी शक्ति के निझर्र, तमोनिवारक, जागृति के प्रतीक, पृथ्वी को सन्तुलन और प्राण-अनुदान देने वाले, स्वयं प्रकाशित, सविता देवता। चन्द्रदेव- स्वप्रकाशित नहीं, पर सूर्य का ताप स्वयं सहन करके निमर्ल प्रकाश जगती पर फैलाने वाले, तप अपने हिस्से में-उपलब्धियाँ सबके लिए। इन्द्रदेव- व्रतपति देवों में प्रमुख, देव प्रवृत्तियों-शक्तियों को संगठित-सशक्त बनाये रखने के लिए सतत जागरूक, हजार आँखों से सतर्क रहने की प्रेरणा देने वाले। '''क्रिया और भावना'''- साधक मन्त्रोच्चार के समय दोनों हाथ ऊपर उठाकर रखें। भावना करें कि हाथ उठाकर व्रतशीलता की साहसिक घोषणा कर रहे हैं, साथ ही सत्प्रवृत्तियों को अपना हाथ थमा रहे हैं। वे हमें मागर्दशर्क की तरह प्रेरणा एवं सहारा देती रहेंगी। एक देवता का मन्त्र पूरा होने पर हाथ जोड़कर नमस्कार करें, फिर पहले जैसी मुद्रा बना लें। ॐ अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ अग्नये नमः॥१॥ ॐ वायो व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ वायवे नमः॥२॥ ॐ सूयर् व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ सूयार्य नमः॥३॥ ॐ चन्द्र व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ चन्द्राय नमः॥४॥ ॐ व्रतानां व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ इन्द्राय नमः॥५॥ -मं०ब्रा०१.६.९.१३
सारांश:
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