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=== कारणात्मक जीव की पहचान === [[चित्र:Gerhard Armauer Hansen.jpg|thumb|जी.एच.ए. हंसेन, एम्. लेप्राए का आविष्कारक]] 17वीं सदी की समाप्ति के बाद, पश्चिमी यूरोप में केवल [[नॉर्वे]] और [[आइसलैंड]] ही ऐसे देश थे, जिनमें कुष्ठरोग के गंभीर समस्या थी। 1830 के दशक के दौरान, नॉर्वे में कुष्ठरोगियों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई, जिससे इस स्थिति के संबंध में चिकित्सीय शोध भी बढ़ा और यह बीमारी एक राजनैतिक मुद्दा बन गई। 1854 में नॉर्वे ने कुष्ठरोग के लिये एक चिकित्सीय अधीक्षक की नियुक्ति की और 1856 में कुष्ठरोगियों के लिये एक राष्ट्रीय रजिस्टर की स्थापना की, जो कि पूरे विश्व में मरीजों का पहला राष्ट्रीय रजिस्टर था।<ref>{{Cite web|title=The Leprosy Archives in Bergen, Norway|url=http://digitalarkivet.uib.no/lepra-eng/intro.htm|accessdate=2009-05-30|archive-url=https://web.archive.org/web/20090823061111/http://digitalarkivet.uib.no/lepra-eng/intro.htm|archive-date=23 अगस्त 2009|url-status=live}}</ref> 1873 में, जी. एच. आर्मर हैन्सेन (G. H. Armauer Hansen) द्वारा नॉर्वे में कुष्ठरोग के कारणात्मक एजेंट, ''माइकोबैक्टेरियम लेप्री (Mycobacterium leprae)'', की खोज की गई, जिससे यह मनुष्यों में इस बीमारी का कारण बनने वाला पहला ज्ञात जीवाणु बन गया।<ref name="Hansen_1874">{{cite journal | author = Hansen GHA | title = Undersøgelser Angående Spedalskhedens Årsager (Investigations concerning the etiology of leprosy) | journal = Norsk Mag. Laegervidenskaben | year = 1874 | volume = 4| pages = 1–88 | language = no }}</ref><ref name="Irgens_2002">{{cite journal |author=Irgens L |title=The discovery of the leprosy bacillus |journal=Tidsskr nor Laegeforen |volume=122 |issue=7 |pages=708–9 |year=2002 |pmid=11998735}}</ref> हैन्सेन ने दाग़रहित ऊतकों वाले अनेक क्षेत्रों से अनेक छोटे गैर-अपवर्तक दण्डाणुओं का अवलोकन किया। ये दण्डाणु पोटेशियम के जल में घुलनशील नहीं थे और वे अम्ल तथा अल्कोहल के प्रति तीव्र थे। 1879 में वे ज़िएल की विधि के द्वारा इन जीवों को चिह्नित करने में सक्षम हुए और कोच के दण्डाणु (''[[माइकोबैक्टीरियम ट्यूबर्क्युलोसिस|माइटोबैक्टेरियम ट्युबरक्युलॉसिस]]'') (Mycobacterium tuberculosis) के साथ इसकी समानता का उल्लेख भी किया गया। इन जीवों में तीन उल्लेखनीय अंतर थे: (1) कुष्ठरोग के घावों में उपस्थित दण्डाणुओं की संख्या अत्यधिक थी (2) उन्होंने अंतर्कोशिकीय संग्रहणों (''ग्लॉबी'') की रचना की, जो कि उनकी एक विशेषता है और (3) इन दण्डाणुओं में शाखाओं और सूजन के साथ अनेक प्रकार के आकार थे। इन अंतरों ने यह सुझाव दिया कि कुष्ठरोग किसी ऐसे जीव के कारण उत्पन्न होता था, जो ''माइकोबैक्टेरियम ट्युबरक्युलॉसिस (Mycobacterium tuberculosis)'' से संबंधित तो था, लेकिन उससे भिन्न था। उन्होंने बर्गेन (Bergen) में सेंट जॉर्जेन्स अस्पताल (St. Jørgens Hospital) मे कार्य किया, जिसके स्थापना पंद्रहवीं सदी के प्रारंभ में हुई थी। आज सेंट जॉर्जेन एक संग्रहालय, ''लेप्राम्युसीट (Lepramuseet)'' है, जो संभवतः उत्तरी यूरोप में सर्वश्रेष्ठ रूप से संरक्षित कुष्ठरोग चिकित्सालय है।<ref>{{Cite web |url=http://www.bymuseet.no/?vis=80 |title=बाइमुसेट आई बर्गन |access-date=30 अगस्त 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20110210134430/http://www.bymuseet.no/?vis=80 |archive-date=10 फ़रवरी 2011 |url-status=live }}</ref>
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