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== मस्जिदों का उपयोग करने के आदाब == मुसलमानों के लिए मस्जिद में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक माना जाता है। अगर कोई गैर मुसलमीन मस्जिद में प्रवेश करना चाहते हैं, उन पर भी यही बातें लागू होती हैं। === तहारत === इस्लाम में तहारत (पाकी - सफाई) बहुत महत्व है। एक हदीस के अनुसार तहारत ही आधा विश्वास है। इसलिए मस्जिद में आने के लिए पाक और साफ होना शर्त है, लेकिन वुज़ू आप मस्जिद में आकर कर सकते हैं। मुसलमान अक्सर मकातब चिंता में मस्जिदों में स्थिति परिवार में ठहरना वैध नहीं मस्जिद हराम और मस्जिदे नबवी में ऐसी स्थिति में प्रवेश भी जायज़ नहीं। लिबास के साथ शरीर भी शुद्ध होना चाहिए। मन की तहारत भी बस के अनुसार आवश्यक है यानी बुरे विचारों से बचना चाहिए।<ref>{{Cite web |url=http://www.islamdoor.com/K3/masjed.htm |title=संग्रहीत प्रति |access-date=28 जुलाई 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20120716025234/http://www.islamdoor.com/K3/masjed.htm |archive-date=16 जुलाई 2012 |url-status=dead }}</ref> === संस्कृति व शायस्तगी === मुसलमान मस्जिद को अल्लाह का घर समझते हैं चाहे उसका संबंध मुसलमानों के किसी भी समुदाय से हो। मस्जिद में चुप्पी और संस्कृति और शायस्तगी की ताकीद की है कि नमाज़ और क़ुरआन पढ़ने वाले तंग न हों। मस्जिदों में लड़ाई झगड़ा या बिना जरूरत दनियावी बातों से बचना चाहिए हालांकि सामूहिक मामलों पर चर्चा की जा सकती है। मस्जिद में दौड़ना या ज़ोर से कदम रखना और ऊँची आवाज़ में बात करना संस्कृति और शायस्तगी के खिलाफ है। इसी तरह कोई भी ऐसा काम करना जिससे प्रार्थना तंग हूँ, अच्छा नहीं समझा जाता, जैसे प्याज, लहसुन, मूली या कोई बू दार चीज खाकर जाने से मना किया जाता है और इस सिलसिले में हदीसों पवित्र जीवनी का हवाला भी दिया जाता है। === कपड़े/वस्त्र === मस्जिद में साफ़ वस्त्र पहन कर आना चाहिए। महिलाओं ऐसा वस्त्र पहनकर आईं जिससे वह बा पर्दा हूँ। इसी तरह पुरुष उचित वस्त्र पहन कर आए। आमतौर मुसलमान क्षेत्रीय वस्त्र के अलावा अरबी वस्त्र भी पहनना अच्छा और सवाब समझते हैं मगर इस्लाम में वस्त्र पर ऐसी कोई कदगन नहीं है लेकिन वस्त्र इस्लाम के सिद्धांतों के अनुसार हो।<ref>مقصود, رقیہ وارث (2003-04-22). خود کو اسلام سکھائیے (Teach Yourself Islam), دوسری طباعت, شکاگو: McGraw-Hill, ISBN 0-07-141963-2. </ref> === मर्द व औरत मस्जिद में === प्रारंभिक इस्लाम से पुरुषों और महिलाओं दोनों मस्जिदों में आने की अनुमति है लेकिन उन्हें अलग जगह दी जाती है। शरि इस्लाम के अनुसार प्रार्थना के दौरान महिलाओं की सफें पुरुषों से पीछे हैं ताकि पुरुषों की नज़र महिलाओं पर न पड़े। पैगम्बर स अलैहि व के दौर में पुरुष और औरत दोनों मस्जिद में नमाज़ अदा करते थे हालांकि महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के लिए बेहतर माना जाता है कि वह घर में नमाज़ अदा करें। आजकल अक्सर मस्जिदों में महिलाओं के लिए अलग जगह बनी होती है। उपमहाद्वीप, पाक और भारतीय महिलाओं के मस्जिद में आने का रिवाज न के बराबर है लेकिन यह इस्लाम से नहीं बल्कि भारतीय समाज से है। अरब देशों और आधुनिक पश्चिमी देशों की महिलाएं मस्जिदों में आती हैं, नमाज़ पढ़ती हैं और विभिन्न शैक्षणिक गतिविधियों में भाग लेती हैं।
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