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==अकादमिक विधा की माँग== सन १९५८ में [[मास्को]] में हुइ, 'सेकण्ड काँग्रेस ऑफ स्लएविस्ट्स' की बैठक में चर्चा का एक मुद्दा था की अनुवाद किस विधा के ज्यादा करीब है - [[भाषाविज्ञान]] के या साहित्यिक पहलू के? इस प्रश्न के उत्तर के रूप में यह सुझाव दिया गया की अनुवाद अध्ययन को एक भिन्न विज्ञान की जरूरत है, जो अनुवाद के हर पहलू को समझने में सक्षम हो, न कि सिर्फ उसके भाषा विज्ञान या साहित्यिक पहलू को। तुलनात्मक साहित्य के अन्तरगत १९६० के दशक में अमरीकी विश्वविद्यालयों, जैसे आइओवा विश्वविद्यालय एवं प्रिंसटन विश्वविद्यालय में भाष्यान्तर कार्यशालाओं को प्रोत्साहित करा गया। १९५० और १९६० के दशकों में अनुवाद के विषय पर पद्धति-बद्ध, भाषा-विज्ञान केंद्रित शोध हुए। सन १९५८ में फ्रेंच भाषावैज्ञानिक विनय व डॉबर्ल्नेट ने फ्रेंच एवं अंग्रेज़ी के मध्यस्थ द्वि-भाषाई विप्रीतार्थी शोध किया। सन १९६४ में यूजीन नाईडा ने 'टुवर्ड अ साइंस ऑफ ट्रांस्लेटिंग' नामक पुस्तक लिखी जो की [[बाइबल अनुवादन]] का एक नियम-संग्रह था। यह नियम-संग्रह काफी हद तक हैरिस के 'रचनांतरण व्याकरण' से प्रभावित था। सन १९५६ में जे सी कैटफर्ड ने भाषा-विज्ञान के संदर्भ में अपना अनुवाद का सद्धान्त दिया। १९६० व १९७० के शुरुवात में चेक पण्डित जिरि लेवि, स्लोवाक के पण्डित एन्टोन पोपोविक एवं फ्रांटिसेक मिको ने साहित्यिक अनुवाद की शैलीगत पहलू पर शोध-कार्य किया। शोध के यह पहले कदम एक तटस्थ रूप से जेम्स एस होलम्स के शोध-पत्र में स्प्ष्ट रूप से शामिल करे गए। यह शोध-पत्र कोपनहागन में हुई, 'थर्ड इन्टर्नेशनल काँग्रेस ऑफ अप्लाइड लिंग्विस्टिक्स' में पढ़ा गया। इस शोध-पत्र के माध्यम से एक विभिन्न विधा की माँग की। इसी माँग के आधार पर गिडेन-टूरी ने सन १९९५ में एक 'नक्शा' अपने लेख, 'डिस्क्रिप्टिव ट्रांस्लेशन स्टडीज़' में रेखांकित किया। सन १९९० से पूर्व अनुवाद के विद्वान एक विशेष विषय के मत से आते थे - खास तौर पर तब जब अनुवाद की प्रक्रिया निहायती वर्णनात्मक व निर्धारित थी, तथा 'स्कोपोज़' तक सीमित थी। परन्तु १९९० के सांस्कृतिक मोड़ के उपरान्त, यह विधा शोध के विभिन्न आयामों में बंट चुकी है।
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