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== इतिहास == अंग्रेजी सामान्य विधि में अपील के लिए कोई उपबंध नहीं था। परंतु सामान्य विधि न्यायालयों की गलतियाँ त्रुटिलेख के माध्यम से किंग्स बेंच न्यायालय द्वारा सुधारी जा सकती थीं। त्रुटिलेख केवल विधि के प्रश्न पर होता था, तथ्य के प्रश्न पर नहीं। परंतु रोमन विधि में अपील के लिए उपबंध था। इंग्लैड में अपील की कार्रवाई रोमन विधि से ली गई और अंग्रेजी विधि में उसका समावेश उन वादों में हुआ जिनका निर्णय सुनीति क्षेत्राधिकार के अंतर्गत लार्ड चांसलर द्वारा अथवा धर्म या नौकाधिकरण न्यायालयों द्वारा होता था। बाद में, समविधि ने अपील के अधिकार को, सामान्य विधि तथा अन्य क्षेत्राधिकार के अंतर्गत होनेवाले दोनों प्रकार के वादों में, नियमित रूप दिया। प्राचीन भारत में, जब विवाद कम होते थे, राजा स्वयं प्रजाए के विवादों का निपटारा करता था। उस समय अपील का प्रश्न नहीं था क्योंकि राजा न्याय का स्रोत था। परंतु राजा के न्यायालय के साथ साथ लोकप्रिय न्यायालय हुआ करते थे, बाद में राजा ने स्वयं नीचे के न्यायालयों की स्थापना की। लोकप्रिय न्यायालय या नीचे के निर्णय के विरुद्ध अपील राजा के समक्ष हो सकती थी। मुगल काल में व्यवहारवादों की अपील सदर दीवानी अदालत में तथा दंडवादी की अपील निज़ाम--ए--अदालत में होती थी। परंतु सन् 1857 ई. के असफल स्वातंत्रय युद्ध के पश्चात् जब ब्रिटिश राज्य ने भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से अपने हाथ में लिया, सदर दीवानी अदालत तथा निज़ाम-ए-अदालत का उन्मूलन हो गया और उनका क्षेत्राधिकार कलकत्ता, बंबई तथा मद्रास स्थित महानगर-उच्च-न्यायालयों को दे दिया गया। बाद में भारत के विभिन्न प्रांतों में उच्च न्यायालयों की स्थापना हुई।
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