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== ग्रन्थकारिता == कविराज श्यामलदास ने अपने पिता कमजी दधिवाड़िया सहित मेवाड़ के [[डौडिया राजपूत|डौडिया राजपूतों]] के विषय में '''दीपंग कुल प्रकाश''' नामक विस्तृत कविता की रचना की थी<ref>[http://lccn.loc.gov/96903370 लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस संग्रह सूची]</ref>। उदयपुर राज्य के शासक महाराणा सज्जन सिंह ने मेवाड़ के प्रामाणिक इतिहास लेखन का उत्तरदायित्व कविराज श्यामलदास को सौंपा था<ref>[http://books.google.com/books?id=nKJiBUFrmfoC&pg=PA37&dq='a+charana+of+repute'&lr=&as_drrb_is=q&as_minm_is=0&as_miny_is=&as_maxm_is=0&as_maxy_is=&as_brr=0&cd=1#v=onepage&q='a%20charana%20of%20repute'&f=false श्रीवास्तव, विजय शंकर (१९८१) ''कल्चरल कोंटूर्स ऑफ़ इंडिया'' पृष्ठ ३७, प्रकाशक: अभिनव प्रकाशन दिल्ली] ISBN 978-0-391-02358-1</ref>। '''वीर विनोद''' नामक यह पुस्तक मेवाड़ में लिखित प्रथम विस्तृत इतिहास है<ref>[http://books.google.com/books?id=S7dCkiyLJ6EC&pg=PA247&dq=%22'first+comprehensive+history+written+in+Mewar'%22&lr=&as_drrb_is=q&as_minm_is=0&as_miny_is=&as_maxm_is=0&as_maxy_is=&as_brr=0&cd=2#v=onepage&q=%22'first%20comprehensive%20history%20written%20in%20Mewar'%22&f=false गुप्ता आर. के., बख्शी एस. आर. (२००८) ''स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री: हेरिटेज ऑफ़ राजपूत'' पृष्ठ २४७, प्रकाशक: सरूप एंड संस, नई दिल्ली] ISBN 978-81-7625-841-8</ref>। महाराणा सज्जन सिंह के उत्तराधिकारी महाराणा फ़तेह सिंह इस इतिहास के प्रकाशन के प्रति उदासीन थे। इस कारण यह पुस्तक १९३० ई. तक प्रकाशित नहीं हुई<ref>[http://books.google.com/books?id=S7dCkiyLJ6EC&pg=PA255&dq=%22'Vir+vinod+came+to+the+public+eye+only+in+1930'%22&lr=&as_drrb_is=q&as_minm_is=0&as_miny_is=&as_maxm_is=0&as_maxy_is=&as_brr=0&cd=1#v=onepage&q=&f=false गुप्ता आर. के., बख्शी एस. आर. पृष्ठ २५५]</ref>। '''वीरविनोद''' के अलावा श्यामलदास ने दो और पुस्तकों की रचना की थी - '''पृथ्वीराज रासो की नवीनता''' तथा '''अकबर के जन्मदिन में सन्देह'''। ये दोनों पुस्तिकाएँ बंगाल की एशियाटिक सोसायटी तथा बम्बई की प्रसिद्ध संस्थाओं से समादृत हुईं थीं। 'पृथ्वीराज रासो की नवीनता' पर भी बहुत बवाल मचा था। ===वीरविनोद=== "वीर विनोद – मेवाड़ का इतिहास", राजस्थान के इतिहास से सम्बन्धित एक विशालकाय काव्य ग्रन्थ है। यह पाँच भागों में है। यह ग्रन्थ सन् 1886 ई. में रचकर तैयार हुआ था। कर्नल [[जेम्स टॉड]] ने जनश्रुतियों के आधार पर मेवाड़ का जो इतिहास विश्व के सामने रखा तो दुनियाभर के विद्वानों का ध्यान इस प्रदेश के प्रामाणिक इतिहास को जानने के लिए लग गया। इस पर तत्कालीन रेजीडेंट ने महाराणा [[शम्भू सिंह|शंभुसिंह]] को सुझाव दिया कि मेवाड़ का इतिहास लिखवाया जाए और इस कार्य के लिए ढोकलिया के श्यामलदास उपयुक्त व्यक्ति हैं। लिखने से पहले ऐतिहासिक तथ्यों के संकलन-संग्रहण के लिए तत्कालीन मेवाड़ रियासत में महाराणा सज्जनसिंह ने इतिहास विभाग बनाया। श्यामलदास को इस विभाग का अध्यक्ष बनाया गया। विभाग में फारसी, उर्दू, संस्कृत, इतिहास और अंग्रेजी के जानकार रखे गए। सन १८७५ ई में उदयपुर में 'वाणीविलास' नामक पुस्तकालय स्थापित किया गया। तथ्य संकलन में यह हिदायत थी कि महज लोकगाथाएं या किवदंतियां आधार नहीं बने वरन, वैज्ञानिकता और तथ्य आधारित शोध हाे। यही कारण था कि 20 साल में जब तथ्य संग्रहित हुए तो लेखन में चार-पांच साल लग गए। 1886 में यह ग्रंथ अस्तित्व में आया। तब [[फतहसिंह]] मेवाड़ के महाराणा बन चुके थे। बताते हैं कुछ तथ्य ऐसे भी हैं जो तत्कालीन राजाओें ठिकानेदारों को अप्रिय थे, इस कारण महाराणा ने ग्रंथ के वितरण पर रोक लगा दी थी। उर्दू-मिश्रित हिन्दी में रचित इस ग्रन्थ ने हिन्दी के शुरू के भारतीय-इतिहास-साहित्य में बहुत उच्च स्थान प्राप्त कर लिया था। यह एक निराली स्पष्टोक्तिपूर्ण शैली में रचित ग्रन्थ है। पाँच जिल्दों और 2716 पृष्ठों में मुद्रित यह ऐतिहासिक वृत्तान्त मेवाड़ को राजपूत वैभव, शौर्य एवं पराक्रम के केन्द्र के रूप में प्रदर्शित करता है। इसमें प्रमुख घटनाओं से उत्पन्न हलचलों का, उनकी चुनौतियों का तथा विभिन्न महाराणाओं के नेतृत्व में मेवाड़वासियों ने उनका जिस साहस और वीरता के साथ सामना किया, उसका सजीव वर्णन किया गया है। इसके प्रत्येक पृष्ठ पर अस्त्रों की घनघनाहट एवं राजपूत शौर्य के अभूतपूर्व कारनामे अंकित हैं। इस ग्रंथ में मेवाड़ के विस्तृत इतिहास सहित अन्य संबंधित रियासतों का भी वर्णन है। इसमें [[राणा साँगा]] और [[बाबर]] के मध्य हुए [[खानवा का युद्ध|खानवा के युद्ध]] का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इसमें बतलाया गया है कि बाबर 20,0000 सैनिकों को लेकर राणा साँगा से युद्ध करने आया था। उसने साँगा की सेना के लोदी सेनापति को प्रलोभन दिया, जिससे वह साँगा को धोखा देकर सेना सहित बाबर से जा मिला था। ग्रंथकार ने राजस्थानी इतिहास का वर्णन सम्पूर्ण विश्व के परिप्रेक्ष्य में किया है। इसमें यूरोप, अफ्रीका, उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका, आस्ट्रेलिया तथा एशिया महाद्वीपों का सामान्य सर्वेक्षण किया गया है; भारत पर [[सिकन्दर]] के आक्रमण एवं मुसलमानों के आगमन को चित्रित किया गया है; भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर घटनेवाली उन घटनाओं का गम्भीर विवेचन-विश्लेषण किया गया है जिन्होंने मेवाड़ के जन-जीवन को प्रभावित किया। इसमें [[नेपाल]] के इतिहास की भी सूक्ष्म छानबीन की गई है। राजस्थान के राजनीतिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक पहलुओं पर प्रकाश डालने वाली प्रचुर सामग्री बहुमूल्य अभिलेखों, राजकीय दस्तावेजों, अनेक फरमानों तथा आंकड़ों के रूप में इस ग्रंथ में संगृहीत है। श्यामलदास के अंतिम वर्ष दुखदायी रहे, अतः वीरविनोद को उन्होने 1884 ई में महाराणा सज्जनसिंह की मृत्यु तक ही समाप्त कर दिया। वीरविनोद के प्रथम जिल्द में यूरोप, एशिया, अमेरिका, एशिया के कुछ देशों तथा भारत का भौगोलिक वर्णन है। इसके पश्चात प्रारम्भिक काल से लार्ड लैंसडाउन के शासनकाल तक का संक्षिप्त इतिहास है। दूसरी जिल्द में [[राणा रतनसिंह]] से लेकर [[अमरसिंह प्रथम]] तक मेवाड़ का इतिहास वर्णित हैं। तृतीय जिल्द में महाराणा कर्णसिंह से लेकर अमरसिंह द्वितीय के शासनकाल तक मेवाड़ का इतिहास है। चतुर्थ जिल्द में अमरसिंह द्वितीय से लेकर जगतसिंह द्वितीय तक मेवाड़ का इतिहास वर्णित है। पांचवीं जिल्द का मुख्य विषय जवानसिंह से सज्जनसिंह के शासनकाल तक मेवाड़ का इतिहास है। वीरविनोद के लिखने में श्यामलदास ने फारसी इतिहासकारों, ख्यातों के लेखकों और कर्नल टॉड की घटनाओं का वर्णन लिखने की पद्धति का अनुसरण किया। श्यामलदास ने अपने ग्रंथ में अपने संरक्षकों के शासनकाल का इतिहास लिखने में पक्षपात से काम नहीं किया। यद्यपि उन्होंने महाराणा शम्भूसिंह और महाराणा सज्जनसिंह की अनेक कार्यों की प्रशंसा की, किन्तु उनकी विलासिता की निन्दा भी की है।
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