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== शाखाएँ== अर्थशास्त्र की विभिन्न शाखाएँ हैं, जो अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर विस्तृत प्रकाश डालती है। कृषि अर्थशास्त्र उनमें से एक है। यह कृषि से सम्बन्धिात मुख्य आर्थिक समस्याओं का अधययन करती है। कृषि अर्थशास्त्र में हम फार्म प्रबन्ध, उत्पादन फलन, कृषि विपणन, कृषि वित्त, कृषि कीमत आदि से सम्बन्धिात नीतियों का अधययन करते हैं। फार्म प्रबंध में उत्पादन एवं प्रबंध से संबंधिात निर्णयात्मक समस्याओं का विवेचन किया जाता है। एक निश्चित भौतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों में कौन-सी फसलें उगानी चाहिए और प्रत्येक फसल के लिए कितना क्षेत्रफल निर्धारित करना चाहिए? उदाहरण के तौर पर मान लो 10 एकड़ भूमि में फसल उगाने की मेरी योजना है, तो उसमें से क्या मुझे 6 एकड़ में गेहूं, 3 एकड़ में गन्ना और एक एकड़ में चना उगाना चाहिए? या फिर अन्य फसलें इसकी अपेक्षा अधिाक लाभप्रद हो सकती है? गेहूँ, गन्ना और चने की कौन-सी किस्में होनी चाहिए? किन कृषि- विधिायों को मुझे अनुसरण करना चाहिए? कब और कितनी मात्र मे उर्वरक डालना चाहिए और सिंचाई करनी चाहिए? कीमतों का ढाँचा क्या है और उनका झुकाव किस ओर है? विभिन्न बाजारों में विभिन्न कृषि उत्पादों के विपणन से संबंधिात कौन-कौन-सी भिन्न कीमतें हैं? व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र के हितों की दृष्टि से बाजारों के ढाँचे में किस प्रकार सुधार किया जाता है? क्या फार्म को नकद भुगतान करके, उधार या यथोचित पट्टे पर खरीदना चाहिए? किसान को किस उद्देश्य के लिए, किन शर्तों पर और कितनी अवधिा के लिए उधार लेना चाहिए? कृषि नीति कृषि अर्थशास्त्र का एक अधिाक महत्त्वपूर्ण अंग है। ये नीतियाँ प्राप्त उद्देश्यों पर और कृषि के साधनों के उपयोग पर आधारित होती है। इस क्षेत्र में कृषि उत्पादों की कीमतों को नियंत्रित करने के प्रश्नों का अधययन किया जाता है। जैसे क्या कपास के वायदा व्यापार (सट्टा) पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए यदि ऐसा है, तो कपास और सूती कपड़ों की कीमतों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या उर्वरकों पर कर लगाना चाहिए? क्या कृषि आय पर कर होना चाहिए? ये सभी प्रश्न कृषि अर्थशास्त्र के कृषि नीति के क्षेत्र में आते हैं। कृषि अर्थशास्त्र में कृषि की निम्नलिखित क्रियाओं का अधययन किया जाता है। * विभिन्न उद्यमों के समूह-फसल उत्पादन, पशुपालन, फल उत्पादन तथा विभिन्न उद्यमों में आपसी सम्बन्ध का अधययन जिससे उद्यमों के सही चुनाव द्वारा अधिाकतम लाभ प्राप्त किया जा सके। * उत्पादन के सीमित साधनों का विभिन्न उद्यमों में अधिाकतम लाभ की प्राप्ति के लिए अनुकूलतम उपयोग, उत्पादन साधनों का प्रतिस्थापन एवं विभिन्न साधनों का उचित मात्र में संयोजन। * उत्पादक एवं उपभोक्ताओं के बीच क्रय-विक्रय के लिए उचित सम्बन्ध बनाए रखना। * विभिन्न उत्पादनों साधनों एवं उत्पादित वस्तुओं की लागत एवं आय के सम्बन्धं पर विचार करना। भारतीय कृषि अब व्यावसायिक रूप धारण करती जा रही है। कृषि साख, बचत, विनियोग, कृषि-विपणन, कृषि वस्तुओं के मूल्य, कृषि वस्तुओं का अंतर्देशीय तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, ग्रामीण क्षेत्र में नवीन संगठन आदि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषय हो गए हैं, अतः कृषि अर्थशास्त्र में इन सब समस्याओं का अधययन किया जाता है। अधययन की दृष्टि से कृषि अर्थशास्त्र के विभिन्न क्षेत्रों को निम्न विभागों में विभक्त किया जा सकता है- * '''उत्पादन-अर्थशास्त्र''' - इसमें उत्पादन के विभिन्न साधनों द्वारा अधिाकतम उत्पादन मात्र की प्राप्ति का अधययन किया जाता है। * '''फार्म-प्रबन्ध''' - इसके अन्तर्गत प्रत्येक कृषक की उत्पादन, संचालन एवं प्रबन्ध सम्बन्ध क्रियाओं से अधिाकतर लाभ की प्राप्ति के लिए अधययन अपेक्षित है। * '''भूमि-अर्थशास्त्र''' - भू-धृति, भूमि सुधार एवं जोत सम्बन्ध समस्याओं का अधययन इसके अन्तर्गत आता है। * '''श्रम-अर्थशास्त्र''' - इसमें श्रमिकों की समस्याएँ, मजदूरी, श्रमिकों में व्याप्त बेरोजगारी, श्रम-सम्बन्ध कानूनी के अधययन का समावेश होता है। === '''[[कृषि यंत्रों की सूची|कृषि]]<nowiki/>-वित्त''' - कृषकों की ऋण के स्रोत, ऋण प्रबन्ध एवं ऋण सम्बन्ध समस्याओं का अधययन इसमें होता हे। === *'''कृषि-विपणन''' - इसके अन्तर्गत कृषि से प्राप्त उत्पादों का विपणन, विपणन-कार्य, विपणन-संस्थाएँ एवं उत्पादक कृषकों की क्रय-विक्रय सम्बन्ध समस्याओं का अधययन सम्मिलित होता है। * '''कृषि-संवृद्धि, विकास एवं योजना''' - इसके अन्तर्गत कृषि की सामान्य समस्याओं जैसे - कृषि में संवृद्धि, कृषि-विकास नीति, कृषि योजनाओं आदि का समावेश होता है।
सारांश:
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