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== उपयोग == खनिज विज्ञान के अध्ययन में क्रिस्टलकी का महत्वपूर्ण योग है। भूपटल में पाए जानेवाले खनिज प्राय: समांग क्रिस्टलीय ठोस होते हैं। इनमें अधिकतर सुविकसित क्रिस्टल की आकृतियाँ, जो आंतरिक आण्विक संरचना से संबद्ध हैं, मिलती हैं। इनमें हीरा, लाल, नीलम, पन्न, पुखराज, ऐमिथिस्ट आदि रत्न खनिज विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन क्रिस्टलीय खनिजों को, जिनमें क्रिस्टल की आकृतियाँ नहीं दिखाई देती हैं, घिसकर पतले टुकड़े निकाले जाते हैं और उनका ध्रुवण सूक्ष्मदर्शी के द्वारा परीक्षण किया जाता है। इस परीक्षण द्वारा उन खनिजों में विद्यमान क्रिस्टलीय सममिति के कुछ तत्त्वों का ज्ञान हो जाता है, जिसके आधार पर उन खनिजों की आंतरिक आणविक अव्यवस्था, जिसपर खनिज के क्रिस्टल की आकृति निर्भर करती है, खनिज के भौतिक और प्रकाशीय (optical) गुणों का आधार भी है। यह विज्ञान ठोस कार्बनिक तथा अकार्बनिक यौगिकों के अध्ययन में समान रूप से उपयोगी है। इनमें से बहुत से यौगिकों में क्रिस्टलकी आकृतियाँ बनती हैं, जो उनके पहचानने में सहायता देती है। उन क्रिस्टलीय पदार्थों का जिनमें आसानी से पहचान में आनेवाली क्रिस्टल आकृतियाँ नहीं दिखाई देतीं, या जो क्रिस्टलकोणमापी (goniometer) द्वारा अध्ययन के लिये बहुत छोटे हैं, एक्सरे (X-ray) द्वारा विश्लेषण किया जाता है। इस प्रकार कुछ विधियों से प्राप्त फोटोग्राफ के प्रतिरूपों (patterns) की, आतंरिक क्रिस्टलीय सममिति के आधार पर, व्याख्या की जाती है, जिससे उन्हें पहचानने में लाभ उठाया जाता है। क्रिस्टल किसी विशेष लाभ प्रतिरूप की इकाई की पुनरावृत्ति से बना एक नियमित समुदाय है। अत: इस इकाई की सममिति संबंधित पदार्थ के क्रिस्टल की बाहरी सममिति की द्योतक है। क्रिस्टलन का अध्ययन धातुकर्म (metallurgy) के लिये अपरिहार्य है। कुछ धातुएँ, जैसे सोना, चाँदी और ताँबा, जो भूपटल में शुद्ध तत्वों के रूप में प्राप्त होती हैं, क्रिस्टलीय स्वरूप दिखलाती हैं, लेकिन उन कुछ धातुओं की, जो खनिजों से निकाली जाती हैं, बाह्य आकृतियाँ क्रिस्टलन विधि को नहीं बतलाती। इन धातुओं की आंतरिक संरचना और सममिति अध्ययन के लिये सरंचना क्रिस्अलकी (structural crystallography) की विधियों को उपयोग में लाया जाता है। इन विधियों का उपयोग आजकल मृत्तिका खनिजों (clay minerals) के अध्ययन में भी किया जा रहा है, जिनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति से मिट्टी के वे गुण ज्ञात होते हैं जिनसे निश्चित होता है कि वह मिट्टी पोर्सलीन और चीनी मिट्टी के बरतन बनाने के लिये उपयोगी है या नहीं। ये खनिज बहुत छोटे छोटे कणों से लेकर कोलाइडी (colloidal) माप के आकार में प्राप्त होते हैं तथा तीन वर्गों में विभाजित किए गए हैं। एक्स-रे विश्लेषण से ज्ञात हुआ है कि ये खनिज क्रिस्टलीय हैं। इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी के द्वारा, जिसमें एक लाख गुना आवर्धन होता है, इनमें से बहुत से क्रिस्टलों की बाह्य आकृतियाँ देखी गई हैं। संरचना क्रिस्टलकी की बहुत सी विधियाँ तथाकथित द्रव क्रिस्टलों, जैसे कोलेस्टेराइल ऐसीटेट (cholestery1 acetate), ऐमोनियम ओलिएट (ammonium oleate) आदि, के अध्ययन में सफलता से उपयोग की गई हैं। इन क्रिस्टलों को प्राचीन काल में निश्चित रूप से द्रव माना गया था। पर ये मध्यरूपीय (mesomorphic) अवस्था में ठोस ही है। इनमें दिखाई देनेवाली द्रव प्रकृति, या दृढ़ता की कमी, क्रिस्टल के बलों की कमजोरी के कारण हैं, जो इतने शक्तिशाली नहीं हैं कि किसी एक निश्चित ज्यामितीय आकृति को बनाए रख सकें।
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