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== जीवन परिचय == संत गरीब दास जी के जीवन परिचय का अधिकांस विवरण लेखक भलेराम बेनीवाल (2008) की पुस्तक - '''जाट योद्धाओं का इतिहास''' से लिया गया है। इतिहासकार भलेराम बेनीवाल<ref>भलेराम बेनीवाल (2008): जाट योद्धाओं का इतिहास (Jāt Yodhāon kā Itihāsa), p.646-647 </ref>के अनुसार गरीब दास महाराज का जन्म बैशाख पूर्णिमा के दिन संवत 1774 (1717) को चौधरी बलराम [[धनकड़|धनखड़]] के यहाँ हुआ था। इनकी '''माता का नाम रानी''' था। इनके पिता बलराम धनखड़ अपनी ससुराल '''छुडानी (रोहतक)''' में अपना गाँव '''करौथा''' छोड़कर आ बसे थे। आपके नानाजी का नाम चौधरी शिवलाल था वे अथाह सम्पति के मालिक थे। उनके घर कोई लड़का नहीं हुआ था। केवल एक लड़की रानी थी जिसका विवाह [[करौथा]] निवासी चौधरी हरदेव सिंह धनखड़ के पुत्र बलराम से कर दिया. श्री बलराम अपने ससुर शिवलाल के कहने पर अपना गाँव करौथा छोड़कर गाँव छुडानी में घर जमाई बन कर रहने लगे. तब वर्ष के बाद रानी से एक रत्न पैदा हुए. जिसका नाम '''गरीबदास''' रखा गया। कबीर परमेश्वर जी के मिलने के बाद में, संत गरीबदास को बचपन से ही वैराग्य हो गया था। परमेश्वर भक्ति, स्पष्टवादिता तथा निर्भीकता के लिए वे बाल्यकाल से ही प्रसिद्द थे। इन्होने [[हिन्दुत्व|हिंदुत्व]] और आध्यात्मिकता का बड़ा प्रचार किया। संत गरीबदास का विवाह '''नादर सिंह [[दहिया]]''', गाँव '''[[बरौना]]''' जिला [[सोनीपत]] की पुत्री देवी से हुआ था। इससे इनको चार पुत्र जेतराम, तुरतीराम, अन्गदेराम और आसाराम तथा दो पुत्रियाँ दिलकौर और ज्ञानकौर पैदा हुई. इनमें जब जेतरामजी के जगन्नाथ पुत्र हुआ तो वह गृहस्थ छोड़कर नांगा साधू हो गया। वह साधू करौथा गाँव में आकर रहने लगा तथा 1780 में महंतपुर (जलन्धर) में इनका निधन हो गया। जहाँ पर उनकी छतरी बनी हुई हैं। इनकी एक छतरी करौथा में भी बनाई गयी है। संत गरीबदास के दूसरे पुत्र तुरतीराम छुडानी की गद्दी पर बैठे जो 40 वर्ष तक आसीन रहे. सन 1817 में इनका स्वर्गवास हो गया। इनकी दोनों पुत्रियाँ पूरी आयु कंवारी रहकर ईश्वर भक्ति करती रही. एक बार आपको मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह रंगीला (1719 -1748) ने आशीर्वाद लेने के लिए [[दिल्ली]] बुलाया। आपने बादशाह के सामने तीन बातें रखी. * 1. सम्पूर्ण राज्य में गोवध बंद करो. * 2. दूसरे धर्मियों पर अत्याचार बंद करो. * 3. किसानों के अन्न पर टैक्ष बंद करो व अकाल ग्रस्तों को लगान में छूट दो. आपकी तीनों बातें बादशाह ने मानली तो आपने आशीर्वाद दिया "जो कोई माने शब्द हमारा, राज करें [[काबुल]] [[कंधारा]]" परन्तु मुल्लाओं ने कह कर "काफिर का कहा मानना नापाक हो जाता है," शाह को तीनों बातें मानने से रोक दिया. बंदी बनाने तक का षडयंत्र रचा गया। परन्तु जब महाराज गरीबदास को इसका पता चला तो वह सेवकों सहित दिल्ली छोड़ गए तथा यह अभिशाप दे गए कि "दिल्ली मंडल पाप की भूमाधरती नाल जगाऊ सूभा" अर्थात दिल्ली पाप की भूमि बन गई है और यहाँ पर शत्रुओं के घोडों के खुरों की धूल उड़कर रहेगी. आपके अभिशाप के अनुसार अगले वर्ष ऐसा ही हुआ। [[नादिर शाह|नादिरशाह]] ने दिल्ली पर धावा बोल कर इसे खूब लूटा तथा कत्ले आम किया। संत गरीबदास जी कबीर साहेब जी के अनुयायी थे। वे ग्रामीणों को उपदेश करते थे :"गरीब गाड़ी बाहो धर रहो. खेती करो, खुशहाल साईं सर पर रखिये तो सही भक्ति हरलाल" उन्होंने आगे कहा :"दास गरीब कहे दर्वेशा रोटी बाटों सदा हमेशा." आपकी 12 बोरियों का विशाल संग्रह '''गरीबग्रंथ''' के नाम से प्रसिद्द है। जिसे '''रत्न सागर''' भी कहते हैं। इन्होने दिल्ली, हरिद्वार, ऋषिकेश, काशी आदि के मठ तथा कुटियाँ बनवाई थी। इन्ही के नाम हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान और गुजरात में लगभग 110 गरीबदास के नाम से आश्रम हैं। आपने '''1788''' में शरीर त्याग दिया और स्वर्ग की राह ली.
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