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=== देवनागरी का प्रचार-प्रसार एवं सेवा === आपने [[मेरठ]] में [[नागरीप्रचारिणी सभा|नागरी प्रचारिणी सभा]] की स्थापना भी की और सन् 1894 में उसकी ओर से सरकार को एक ज्ञापन इस आशय का दिया कि अदालतों में नागरी-लिपि को स्थान मिलना चाहिए। आपने ज्ञापन में देवनागरी लिपि की उपादेयता और ग्राह्यता पर इस प्रकार प्रकाश डाला था- :''देवनागरी इतनी सरल एवं वैज्ञानिक लिपि है कि उसके 36 अक्षर और 12 मात्राएं केवल 3 दिन में आसानी से सीखे जा सकते हैं तथा 6 महीने में तो उसका पूरा अभ्यास किया जा सकता है। अन्य किसी भी लिपि में जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा जाता है। पढ़ने और लिखने में कुछ भी अंतर नहीं रहता।'' अपने इसी ज्ञापन में आपने अन्त में यह भी लिखा था- "उर्दू और फारसी के शब्दों को यदि नागरी लिपि में लिखना शुरू कर दिया जाए तो वे बहुत सरल हो जायेंगे।" पंडित जी इसके लिए दबाव डालते रहे। आपके इस अनवरत प्रयास के फलस्वरूप ही 18 अप्रैल सन् 1900 को सर एण्टोनी मैकडानल ने एक अध्यादेश जारी करके उत्तर प्रदेश के स्कूलों और पाठशालाओं में हिंदी के पठन-पाठन को स्वीकृति प्रदान करके हिन्दी के प्रचार तथा प्रसार का मार्ग प्रशस्त किया था। पंडित जी नागरी और हिन्दी के इतने दीवाने बन गए थे कि आपने अपने अंगरखे पर '''जय नागरी''' शब्द भी अंकित करा लिया था और पारम्परिक अभिवादन के समय ‘जय नागरी‘ ही कहा करते थे। उनकी समाधि पर इसलिए लोगों ने '''देवनागरी प्रचारानन्द''' शब्द अंकित किए थे। देवनागरी के प्रचार के लिए आपने जो एक गीत बनाया था उससे आपकी लगन और निष्ठा का परिचय मिलता है। गीत का प्रारम्भ कुछ इस प्रकार थाः : भजु गोविन्द हरे हरे : भाई भजु गोविन्द हरे हरे। : देवनागरी हित कुछ धन दो, : दूध न देगा धरे-धरे॥ आपके देवनागरी-प्रेम का सबसे अधिक सुपुष्ट प्रमाण इससे अधिक और क्या हो सकता है कि अपनी मृत्यु से पूर्व अपने 1 जून सन् 1903 को जो अपना वसीयतनामा लिखा था उसमें अपनी पूरी सम्पत्ति (मकान और सामान तक) नागरी के प्रचार के लिए अर्पित कर दी थी। आपकी यह हार्दिक आकांक्षा थी कि आपकी इस निधि से स्थान-स्थान पर 'देवनागरी पाठशालाएं' खोली जाएं। एक अत्यन्त साधारण स्थिति वाले इस व्यक्ति ने इसके अलावा अपनी खून-पसीने की कमाई से अर्जित 32 हजार रुपये की राशि देवनागरी-प्रसार के कार्य में स्वाहा कर दी थी। आपका निधन 8 फ़रवरी सन् 1906 को हुआ था।
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