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== चिकित्सकीय ज्योतिष का चिकित्साशास्त्र की विभिन्न शाखाओं में उपयोग == === कायचिकित्सा में उपयोग === कायचिकित्सकों के लिये यह विषय अतीव उपयोगी है। रोग की अवधि निश्चित करने में इसका पूरा सहयोग रहता है। रोग भेषजसाध्य है अथवा शस्त्रकर्म द्वारा साध्य है ? इसका निर्णय करने में भी सहयोग मिलता है। रोगी किस मुहूर्त में वैद्य के पास जावे जिससे उसके रोग का निदान त्रुटि रहित हो? पुरानी बीमारियों हेतु मुहूर्त का विचार आवश्यक होता है परन्तु संकटकालीन स्थिति में मुहूर्त का विचार नहीं होता। === शल्य शास्त्र में उपयोग === रोग औषधि से ठीक होगा अथवा शल्यकर्म (ऑपरेशन) के द्वारा इसका निर्णय कर ग्रहों के आधार पर रोगी की सहन-शक्ति सत्व तथा सामर्थ्य को जानकर ठीक मुहूर्त में आपरेशन पूर्ण सफलता प्रदान करता है। === प्रसूति तंत्र में उपयोग === ज्योतिषीय गणनाओं द्वारा ग्रह स्थिति-वशात् यह निश्चय करने में सुविधा रहती है कि प्रसूता का प्रसव सरलतापूर्वक होगा या कष्टपूर्वक ? एतदर्थ प्रसवकालीन ग्रहस्थिति को ध्यान में रखकर निर्णय किया जाता है। === बाल रोग चिकित्सा में उपयोग === आयुर्वेद में आधुनिक पीड़िया-ट्रिक्स को कौमार भृत्य नाम दिया गया है। यदि प्रसूतागार का निर्माण वास्तुशास्त्र में बताये नियमों तथा पदार्थों (मैटेरियल्स) के अनुसार हो तो उसमें जन्मने वाले बालक हेतु शुभ होगा। घर के भीतर भी बालक का शयन कक्ष ज्योतिष शास्त्र के मानदंडों के अनुसार बनाना शुभ होता है। बालारिष्ट को योगों का ज्ञान करके बालक को निरोग रखने में मदद मिलती है। प्रसूता के स्तन्य (दूध) की मात्रा स्तनपायी शिशु हेतु पर्याप्त रहेगी अथवा अपर्याप्त रहेगी। इसे चिकित्सा ज्योतिष द्वारा ही जाना जा सकता है। === विष विज्ञान में उपयोग === विष विज्ञान को आयुर्वेद में अगदतंत्र कहा गया है। गद का अर्थ रोग तथा विष होता है अर्थात् कोई भी विजातीय पदार्थ जो शरीर के बाह्य या आभ्यांतरिक संपर्क में आने पर शरीर को हानि पहुँचाता है उसे गद या विष कहते हैं। अरबी में इसे जहर तथा आंग्ल भाषा में पॉइजन (Poison) तथा टॉक्सिन (Toxin) कहा जाता है। कभी-कभी कोई ऐसा अनिष्टकारी समय होता है जिसमें प्राणिज, खनिज अथवा जान्तव किसी भी प्रकार के विष प्रयुक्त होने पर वह रोगी के लिये मृत्युकारक अथवा मरणासन्न स्थिति उत्पन्न करने वाला होता है। इसी प्रकार किसी अश्विनी नक्षत्र में जन्मे हुए व्यक्ति पर कुचला का हानिकर प्रभाव न्यूनतम होगा क्योंकि कुचला अश्विनी नक्षत्र का वृक्ष है। === पशु चिकित्सा एवं पशुपालन में उपयोग === विशिष्ट ग्रह स्थिति में उत्पन्न दुधारू पशु तद्नुसार कम या अधिक दूध देने वाले होते हैं। वृष लग्न में उत्पन्न गाय या बैल ठीक रहते हैं परन्तु सिंह लग्न या धनु लग्न या मेष लग्न में प्रसूत होने वाले पशु अधिक मरखा (मरखना) होते हैं। कर्क या मकर या मीन लग्नोत्पन्न गाय, भैसें, यदि किसी पापग्रह से हष्ट न हों तो खूब दुधारू होते हैं, शुक्र एवं चन्द्र की दृष्टि लग्न एवं सप्तम भाव पर होने से पशु में दूध की मात्रा बढ़ाने वाली है। अल्प मात्रा में दूध देने वाले को यदि विहित मुहूर्त में शतावरी आदि वनस्पतियों का सेवन कराने पर उनके दूध में पर्याप्त वृद्धि उपलक्षित होती है। === भैषज्य निर्माण शास्त्र में उपयोग === भेषज्य निर्माण हेतु यदि किसी विज्ञ ज्योतिषी से मुहूर्त पूछकर निर्माण कार्य किया जावे तो चूर्ण, बटी, धृत, तैल, आसव, अरिष्ट, अर्क, अवलेह (इतरीफल, माजून लऊक आदि भी) रस, भस्म, रसायन, प्रतिविष एण्टीबायोटिक्स आदि के घान अत्यन्त गुणकारी निर्मित होते हैं। कृत्तिका नक्षत्र में भष्म श्रेष्ठ बनती है। अश्वनी नक्षत्र में वाजीकरण योगों का निर्माण उत्तम रहता है। [[श्रेणी:ज्योतिष]]
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