सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
चेचक
" (अनुभाग) सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
== लक्षण == रोग का उद्भवकाल दो सप्ताह का कहा जाता है, किंतु इससे कम का भी हो सकता है। प्रारंभिक लक्षण जी मिचलाना, सिर दर्द, पीठ में तथा विशेषकर त्रिक प्रांत में पीड़ा, शरीर में ऐंठन, ज्वर, गलशोथ, खाँसी, गला बैठ जाना तथा नाक बहना होते हैं, जो दो तीन दिन तक रहते हैं। तदनंतर चर्म पर पित्ती के समान चकत्ते निकल आते हैं। मुँह में, गले में तथा स्वरयंत्र तक छोटी-छोटी स्फोटिकाएँ (vesicles) बन जाती है, जो आगे चलकर व्रणों में परिणत हो जाती हैं। तीसरे या चौथे और कभी-कभी दूसरे ही दिन चेचक का विशेष झलका (rash) दिखाई देता है। इसकी स्थिति और प्रकट होने का क्रम रोग की विशेषता है। छोटे-छोटे लाल रंग के धब्बे (macules) पहले ललाट और कलाई पर प्रगट होते हैं, फिर क्रमशः बाहु, धड़, पीठ और अंत में टाँगों पर निकलते हैं। इनकी संख्या ललाट और चेहरे पर तथा अग्रबाहु और हाथों पर, तथा इनमें भी प्रसारक पेशियों की त्वचा पर, अधिक होती है। बाहु, छाती का ऊपरी भाग तथा कुहनी के मोड़ के सामने के भाग इनसे बहुत कुछ बच जाते हैं। कक्ष (axilla) में तो निकलते ही नहीं। इन विवर्ण धब्बों में भी निश्चित्त क्रम में परिवर्तन होते हैं। कुछ घंटों में इन धब्बों से पिटिकाएँ (papules) बन जाती हैं, जो सूक्ष्म अंकुरों के समान होती हैं। दो तीन दिन तक ये पिटिकाएँ निकलती रहती हैं, तब ये स्फोटिका (vesicles) में परिवर्तित होने लगती हैं। जो पिटिका पहिले निकलती है, वह पहले स्फोटिका बनती है। लगभग २४ घंटे में सब स्फोटिकाएँ बन जाती हैं। प्रत्येक स्फोटिका उभरे हुए दाने के समान होती हैं, जिसमें स्वच्छ द्रव भरा होता है। दो-तीन दिन में यह द्रव पूययुक्त हो जाता है और पूयस्फोटिका (pustule) बन जाती है, जिसके चारों ओर त्वचा में शोथ का लाल घेरा बन जाता है। इस समय वह ज्वर, जो कम हो जाता अथवा उतर जाता है, फिर से बढ़ जाता है। अगले आठ या नौ दिनों में पूयस्फीटिकाएँ सूखने लगती हैं और गहरे भूरे अथव काले रंग के खुरंड बन जाते हैं, जो त्वचा से पूर्णतया पृथक होने में १०-१२ या इससे भी अधिक दिन ले लेते हैं। पिटिका और स्फोटिका अवस्था में रोगी की दशा कष्टदायी नहीं होती, किंतु पूयस्फोटिकाओं के बनने पर ज्वर के बढ़ने के साथ ही उसकी दशा भी उग्र और कष्टदायी हो जाती है। चर्म में स्टेफिलो या स्ट्रिप्टो कोकाई के प्रवेश से स्फीटिकाओं में पूय बनने के साथ त्वचा में शोथ हो जाता है और मुँह, गले, स्वरंयंत्र आदि में व्रण बन जाते हैं। निमोनिया भी हो सकता है।
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)