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== मुद्राओं का निर्माण == [[चित्र:1831 coining press (M.A.N. 1873-22-19) 01.jpg|right|thumb|300px|फ्रांस में सन् १८३१ में बनी सिक्का बनाने की दाबक मशीन (प्रेस)]] प्राचीन काल में मुद्राएँ उत्कीर्णित [[ठप्पा|ठप्पों]] के बीच रखकर और [[हथौड़ा|हथौड़े]] की चोट देकर बनाई जाती थीं। भारत के देशी राज्यों में यह रीति 19वीं शती तक प्रचलित थी। कहीं-कहीं सिक्के ढाले भी जाते थे। आधुनिक टकसालों में निर्माणकार्य मुख्यत: मशीनों द्वारा संपादित होता है। यह आठ पदों में पूरा किया जात है- (1) '''मुद्रानिर्माण के लिए धातु का शोधन''' - इस कार्य के लिये [[विद्युत अपघटन]] (electrolysis) विधि अपनाई जाती है; (2) '''शुद्ध धातुओं के मिश्रण को गलाकर सिलों में ढालना''', (3) '''सिलों को बेलकर पट्टियाँ (fillets or strips) बनाना''' - यह कार्य ढाली हुई सिलों, या पासों, को बारबार कई बेलनों के बीच से निकालकर पूरा किया जाता है। अंतिम बेलन सबसे कम व्यास के होते हैं। जब वांछित मोटाई की पट्टियाँ प्राप्त हो जाती हैं तब इनमें से एक या दो चकतियाँ काटकर तौली जाती हैं। यदि ये अधिक भारी हुई तो पट्टी को फिर बेलकर पतला करते हैं; (4) '''निरंक चकतियों को मशीनों द्वारा काटना''' ; (5) '''चकतियों का तापानुशीतन तथा सफाई''' - चकतिया को भट्ठियों में गरमकर ठंढा करते हैं, जिससे वे कुछ कोमल हो जाती हैं। इस क्रिया के पश्चात् उनका रंग काला सा हो जाता है। तब ये गरम तनु सल्फ्यूरिक अम्ल तथा बाइक्रोमेट के मिश्रण में डाल दी जाती हैं। इसमें से ये स्वच्छ होकर निकलती हैं। धोने से अम्ल दूर हो जाता है और तब ये सुखा ली जाती हैं। (6) '''चकतियों का स्थूलन (upsetting)''' - बेलन द्वारा उनके किनारों को उठा हुआ बनाया जाता है। यह इसलिए कि व्यवहार में आने पर तैयार मुद्रा के अंकादि घिसे नहीं। इसी समय किनारों पर अक्षर, या कोई डिजाइन, डाल दी जाती है। ऐसे कुछ भारतीय सिक्कों पर खड़ी धारियाँ या दाँत रहते हैं। (7) '''भार की परीक्षा''' - चकतियों को तौलकर अधिक या कम भारवालों को अलग करते हैं। सदोष चकतियों को निकालकर फिर से गला डालते हैं। (8) '''चकतियों को ठप्पों के बीच में दबाकर मुद्रा बनाना''' - प्रत्येक चकती नीचेवाले ठप्पे पर रखी जाती है और ऊपरवाला ठप्पा उसपर जोर से आकर गिरता है। दवाब से कोमल धातु, श्यान ठोस की भाँति, ठप्पों के स्थानों को भर देती है, किंतु चोट पड़ने के समय चकती को एक कंठा घेरे रहता है, जिसके कारण चकती चौड़ाई की ओर नहीं बढ़ पाती। यह सब काम अब यंत्र से होता है। ठप्पे कठोर कार्बन इस्पात के बने होते हैं। इनमें से प्रत्येक लगभग 50,000 मुद्राएँ बनाने के पश्चात् काम का नहीं रहता। अंत में प्रत्येक मुद्रा को देखकर तथा तौलकर उसकी परीक्षा की जाती है। देखने वाले के सम्मुख ये मुद्राएँ चलपट्टों पर रखी इस प्रकार आती हैं कि पारी पारी से उनका चित और पट्ट भाग ऊपर आ जाता है। कम मूल्य की मुद्राओं को छोड़कर, अन्य की तौल भी जाँची जाती है। यह कार्य स्वयंचालित तराजुओं से लिया जाता है। पूर्वोक्त परीक्षाओं में सच्ची उतरने पर ही मुद्राएँ टकसाल से बाहर चलन में आती हैं।
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