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दर्शन का इतिहास
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== दर्शन की भारतीय अवधारणा == ऊपर हमने तर्कनिष्ठ अनुभववाद का जिक्र किया। तत्त्व-दर्शन का निराकरण करते हुए उक्त वाद के समर्थकों ने दर्शन को पुनः परिभाषित किया। उनके अनुसार दर्शन का कार्य प्रत्ययात्मक विश्लेषण (conceptual analysis) है। दर्शन विभिन्न प्रत्ययों एवं वाक्यों या प्रकथनों का विश्लेषण इस दृष्टि से करता है कि उनका इन्द्रिय अनुभव अथवा गोचर जगत से सम्बन्ध स्पष्ट किया जाये। जिस कथन का सम्बन्ध गोचर जगत से नहीं दिखाया जा सकता, उसके बारे में यह शंका होनी चाहिए कि वह सार्थक भी है या नहीं। उसी प्रकार विभिन्न दूसरे सम्प्रत्ययों का भी विश्लेषण होना चाहिए। व्यवहार में तर्कनिष्ठ अनुभववादियों ने अपना ध्यान मुख्यतया विज्ञान के प्रत्ययों और कथनों पर केन्द्रित किया। उनके मत में नीतिशास्त्र, धर्म आदि के क्षेत्रों से सम्बन्धित कथन अनुभव-जगत से सम्बन्ध न रखने के कारण दार्शनिक विश्लेषण का विषय नहीं होते; दर्शन वैसे कथनों की निरर्थकता ही संकेतित कर सकता है। दूसरे महायुद्ध का अन्त होते-होते तर्कनिष्ठ अनुभववाद स्वयं ही निराकृत होने लगा। विचारकों ने यह पाया कि जहाँ एक ओर उक्त सिद्धान्त आन्तरिक विसंगतियों से पीड़ित है, वहीं दूसरी ओर वह हमारे नैतिक निर्णयों के बारे में कोई प्रामाणिक कथन करने में हिचकता है। मानव-जाति की नैतिक एवं अध्यात्मिक जरूरतों और अनुभवों की उपेक्षा करने वाला दर्शन कालान्तर में स्वयं को बदनाम कर लेता है। यह कहना काफ़ी नहीं कि हमारे नैतिकता-सम्बन्धी कथन ऐन्द्रियबोध द्वारा सत्यापनीय या परीक्षणीय नहीं हैं और इसलिए निरर्थक हैं। नैतिकता के बिना मनुष्य अर्थपूर्ण (विशेषतः सामाजिक) जीवन नहीं जी सकता। यही बात आध्यात्मिक तथा सौन्दर्यपरक मूल्यों पर लागू होती है। वास्तव में दर्शन जीवन-मूल्यों की उपेक्षा नहीं कर सकता। उसकी दृष्टि में वैज्ञानिक बोध भी एक प्रकार का मूल्य है, किन्तु वह बोध एकमात्र मूल्य नहीं है। सम्प्रत्ययों (concepts) का स्पष्टीकरण भी सरल व्यापार नहीं है। तर्कनिष्ठ अनुभववाद के विरुद्ध इग्लैंण्ड के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में एक अन्य दार्शनिक सम्प्रदाय का उदय हुआ जो प्रत्ययों आदि के विश्लेषणात्मक बोध के लिए बोलचाल की भाषा का आश्रय लेता है। यहाँ इन विभिन्न दार्शनिक सम्प्रदायों का विवरण देना अभीष्ट नहीं है। इस सन्दर्भ में हम दो एक अपेक्षित बातें कहकर आगे बढ़ेंगे। हम मानते हैं कि किसी भी प्रत्यय या अवधारणा का विश्लेषण खास प्रयोजन या दृष्टि का अपेक्षी होता है। हमारी मान्यता है कि दर्शन की विशेष दृष्टि मूल्य-परक होती और होनी चाहिए। उदाहरण के लिए हम कारणता के प्रत्यय का विश्लेषण इस दृष्टि से करते हैं कि ज्ञान-प्राप्ति के अनुष्ठान में हम उसकी उपयोगिता और महत्त्व को ठीक-ठाक आँक सकें। किसी कथन के ठीक अभिप्राय का निश्चय, जो विश्लेषण द्वारा सम्भव होता है, यह जानने के लिए किया जाता है कि वह कथन कहाँ तक यथार्थ या वास्तविकता को पकड़ता या पकड़ पाता है। वैज्ञानिक बोध का विश्लेषण भी इसी दृष्टि से किया जाता है-अर्थात यथार्थ की सम्बद्धता में उसकी सत्यता या सत्यांश का निर्धारण करने के लिए। जिसे हम विज्ञान-दर्शन कहते हैं उसका, दर्शन की निजी दृष्टि में यही उपयोग है कि वह वैज्ञानिक शोध के स्वरूप और सीमाओं की समुचित अवगति या जानकारी दे। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि दर्शन का मुख्य कार्य विभिन्न कोटियों के बोधों या अनुभवों की समीक्षात्मक अवगति है। यहाँ याद रखना चाहिए कि दर्शन उसी अनुभव का विचार कर सकता है जो भाषाबद्ध किया जा चुका है, अर्थात् प्रकथनों के रूप में प्रकट हो चुका है। किन्तु विज्ञान-दर्शन, जो वैज्ञानिक बोध की समीक्षा करता है, विज्ञान की सहायक विद्या मात्र नहीं है। दर्शन का उद्देश्य साक्षात् रूप में वैज्ञानिक अन्वेषणों को अग्रसर करना भी नहीं है। तात्पर्य यह है कि दर्शन नामक विद्या विज्ञान की परिचारिका भर नहीं है। माना जा सकता है कि वैज्ञानिक अन्वेषण महत्त्वपूर्ण वस्तु है, आज के युग में यह बात स्वयं सिद्ध जान पड़ती है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वर्तमान युग में जीवन के दूसरे मूल्यों और उनका अन्वेषण महत्वपूर्ण नहीं रहे। हम जानते हैं कि काव्य, कला, संगीत तथा नैतिकता मानव-जीवन के लिए सदा से महत्त्वपूर्ण रहे हैं और आगे भी रहेंगे। दर्शन हमारे सभी ऐसे मूल्यों के स्वरूप का विचार करता है जो मानव एवं जीवन को गुणात्मक उत्कर्ष देने वाले हैं। हम मानते हैं कि वैज्ञानिक शोध एवं चिन्तन भी केवल व्यावहारिक दृष्टि से उपयोगी नहीं हैं, वे मानव बुद्धि या मस्तिष्क को गुणात्मक वैशिष्ट्य भी प्रदान करते हैं। वास्तव में वह प्रत्येक क्रिया को, जो केवल उपयोगिता के लिए नहीं होती अपितु मानव-व्यक्तित्व को गुणात्मक उत्कर्ष देने वाली होती है, दर्शन का विषय है। उपयोगी क्रियाएँ धन-सम्पत्ति तथा शक्ति के लिए अनुष्ठित होती हैं। वे मुख्यतः मनुष्य के भौतिक तथा जैवी जीवन को प्रभावित करती हैं, वे खास तरह के मनोभावों की पुष्टि के लिए ही हितकर होती हैं। किन्तु वे व्यक्तित्व का गुणात्मक विकास करती हैं, इसमें सन्देह है। हमारे व्यक्तित्व का वैसा विकास निष्काम भाव से ज्ञान-सम्पादन, नैतिक कर्म (जिसका उद्देश्य न्याय- धर्म की रक्षा एवं परहित-साधन होता है) तथा काव्य- साहित्य एवं कलाओं के आस्वाद द्वारा घटित होता है। हम मानते हैं कि दर्शन का कार्य उन सब मानवीय क्रियाओं की समीक्षित चेतना है, जिनका लक्ष्य गुणात्मक उत्कर्ष की प्राप्ति है-अथवा ऐसे आनन्द की प्राप्ति जो व्यक्तित्व की गुणात्मक ऊर्ध्व गति से सहचरित रहता है। विशेषतः काव्य-साहित्य और विभिन्न विद्याओं का अनुशीलन उक्त कोटि की क्रियाएँ हैं। नैतिक कर्तव्य का पालन प्रायः सदैव सन्तोषकर होता है, भले ही उस कर्तव्य पालन के लिए धन, समय, शक्ति आदि का कष्टकर व्यय करना पड़े। कर्तव्य-पालन का सुख दूसरे सुखों से भिन्न कोटि का होता है। वह अन्तरात्मा का सुख होता है। जो महाप्राण व्यक्ति को अपने स्वार्थ का हनन करके परहित-साधना करता है, उसे ख़ास तरह का आनन्द होता है। गुणात्मक दृष्टि से यह आनन्द उच्चतर नैतिक धरातल पर संक्रमण या विचरण करने का आनन्द है। तात्पर्य यह है कि स्वभावतः अपनी चेतना-वृत्तियों के उत्थान की कामना करता है। जब कोई ग्रन्थ, कलाकृति या शास्त्रीय आलेख हमारी चेतनाओं को वैसे उन्नयन या उत्थान का अवसर देता है तो वह रुचिकर एवं आनन्दप्रद प्रतीत होता है। हमारी धारणा के अनुसार उक्त कोटि के गुणात्मक प्रभेदों को देखना, समझना-और समझाने के लिए व्याख्या-सूत्रों की उद्भावना करना-दर्शन का प्रमुख कार्य है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जहाँ विभिन्न भौतिक विज्ञान अपने क्षेत्र के तत्वों या शक्तियों का मात्राधर्मी अध्ययन करते हैं, वहाँ दर्शन की विभिन्न शाखाएँ विभिन्न कोटियों के गुणात्मक प्रभेदों का अनुशीलन करती हैं। विज्ञान का बोध हमें वस्तुओं एवं शक्तियों पर नियंत्रण की क्षमता देता है, दर्शन का कोई अंग वैसी क्षमता नहीं देता। वह केवल हमारी दृष्टि या चेतना का विस्तार एवं गुणात्मक परिष्कार करता है। इस परिप्रेक्ष्य में देखने पर हम पायेंगे कि जिन्हें हम मानवीय विद्याएँ कहते हैं। अर्थात नर विज्ञान, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि-उनकी स्थिति कहीं भौतिक विज्ञानों और दर्शन के बीच में है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जहाँ विज्ञान और यहाँ हमारा मतलब मुख्यतः भौतिक विज्ञानों से है, हमें भौतिक परिवेश पर अर्थात प्राकृतिक जगत पर नियन्त्रण की क्षमता देता है, वहीं दर्शन का कार्य हमारे गुणात्मक बोध और जीवन को आगे बढ़ाता है। कहना ना होगा कि यह बोध और क्रियाएँ हमारे आन्तरिक, प्रतीकबद्ध या भाषाश्रित जीवन का अंग हैं।
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