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== मूल गुण == सभी दिगम्बर साधुओं के लिए २८ मूल गुणों का पालन अनिवार्य है। इन्हें मूल-गुण कहा जाता है क्योंकि इनकी अनुपस्थिति में अन्य गुण हासिल नहीं किए जा सकते।<span class="mw-ref" id="cite_ref-FOOTNOTEC.R._Jain192626_6-0" rel="dc:references">[[#cite_note-FOOTNOTEC.R._Jain192626-6|<span class="mw-reflink-text"><nowiki>[6]</nowiki></span>]]</span> यह २८ मूल गुण हैं: पांच '[[महाव्रत]]'; पांच समिति; पांच इंद्रियों पर नियंत्रण ('पंचइन्द्रिय निरोध'); छह आवश्यक कर्तव्यों; सात नियम या प्रतिबंध।[[File:Tijara Jain temple painting 35.jpg|thumb|मुनि के ६ कर्म]] {| class="wikitable" !व्रत !नाम !अर्थ |- style="background:#ffd70;" | rowspan="5" |'''महाव्रत'''- तीर्थंकर आदि महापुरुष जिनका पालन करते है |१. [[अहिंसा]] |किसी भी जीव को मन, वचन, काय से पीड़ा नहीं पहुँचाना। एक दिगम्बर साधु अहिंसा महाव्रत धारण करता है और हिंसा के तीन रूपों का त्याग करता है:<span class="mw-ref" id="cite_ref-FOOTNOTEC.R._Jain192628_7-0" rel="dc:references"></span>''कृत''- वह ख़ुद किसी भी हिंसा के कार्य को करने के लिए प्रतिबद्ध नहीं होना चाहिए। ''करित''- वह किसी और से ऐसा कोई कार्य करने के लिए नहीं कहते या पूछते। ''अनुमोदना''- वह किसी भी तरह (वचन और किर्या) से ऐसे किसी कार्य के लिए प्रोत्साहित नहीं करते जिसमें हिंसा हो। |- style="background:#ffd70;" |२. [[सत्य]] |हित, मित, प्रिय वचन बोलना। |- style="background:#ffd70;" |३. [[अस्तेय]] |जो वस्तु नहीं दी जाई उसे ग्रहण नहीं करना। |- style="background:#ffd70;" |४. [[ब्रह्मचर्य]] |मन, वचन, काय से मैथुन कर्म का पूर्ण त्याग करना। |- style="background:#ffd70;" |५. [[अपरिग्रह]] |पदार्थों के प्रति ममत्वरूप परिणमन का पूर्ण त्याग |- style="background:#FFFF00;" | rowspan="5" |'''समिति'''- प्रवृत्तिगत सावधानी {{sfn|प्रमाणसागर|२००८|p=१८९}} |६.ईर्यासमिति |सावधानी पूर्वक चार हाथ (2 गज) जमीन देखकर चलना |- style="background:#FFFF00;" |७.भाषा समिति |निन्दा व दूषित भाषाओं का त्याग |- style="background:#FFFF00;" |८.एषणा समिति |श्रावक के यहाँ छियालीस दोषों से रहित आहार लेना |- style="background:#FFFF00;" |९.आदान निक्षेप |धार्मिक उपकरण उठाने रखने में सावधानी |- style="background:#FFFF00;" |१०.प्रतिष्ठापन |निर्जन्तुक स्थान पर मल-मूत्र का त्याग |- style="background:#00ff00;" | rowspan="1" |'''पाँचेंद्रियनिरोध''' |११.१५ |पाँचों इंद्रियों पर नियंत्रण |- style="background:#fff" | rowspan="6" |'''छः आवश्यक'''आवश्यक करने योग्य क्रियाएँ |१६. सामायिक (समता) |समता धारण कर आत्मकेन्द्रित होना-दिन में तीन बार — सुबह, दोपहर, और शाम छह घड़ी (एक घड़ी = 24 मिनट) के लिए सामयिक। |- style="background:#fff;" |१७. स्तुति |२४ [[तीर्थंकर|तीर्थंकरों]] का स्तवन |- style="background:#fff;" |१८. वंदन |[[अरिहन्त]], [[सिद्ध (जैन धर्म)|सिद्ध]] और आचार्य भगवान का वंदन |- style="background:#fff;" |१९.प्रतिक्रमण |आत्म-निंदा, पश्चाताप; ड्राइव करने के लिए अपने आप से दूर भीड़ के ''कर्म'', पुण्य या दुष्ट, अतीत में किया है। |- style="background:#fff;" |२०.प्रत्याख्यान |त्याग |- style="background:#fff;" |२१.[[कायोत्सर्ग]] |देह के ममत्व को त्यागकर आत्म स्वरूप में लीन होना |- style="background:#gold;" | rowspan="7" |'''सात नियम या प्रतिबंध''' |२२. अस्नान |स्नान नहीं करना |- style="background:#gold;" |२३. अदंतधावन |दातौन नहीं करना |- style="background:#gold;" |२४. भूशयन |चटाई, जमीन पर विश्राम करना |- style="background:#gold;" |२५. एकभुक्ति |दिन में एक बार भोजन |- style="background:#gold;" |२६. स्थितिभोजन |खड़े रहकर दोनो हाथो से आहार लेना |- style="background:#gold;" |२७. [[केश लोंच]] |सिर और दाड़ी के बाल हाथों से उखाड़ना |- style="background:#gold;" |२८. नग्नता |जन्म समय की अवस्था में अर्थात नग्न दिगम्बर रहना। |}
सारांश:
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