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== निकाय विभाजन == इस ग्रंथ में ३ प्रमुख वर्ग है, जो इस प्रकार है<ref name="ReferenceA"/><ref>{{Cite web |url=http://pustak.org/bs/home.php?bookid=1239 |title=प्राचीन भारत की श्रेष्ठ कहानियाँ, लेखकः जगदीश चन्द्र जैन, प्रकाशक:भारतीय ज्ञानपीठ, प्रकाशित : मई ०९, २००३ |access-date=7 सितंबर 2008 |archive-url=https://web.archive.org/web/20071023080248/http://pustak.org/bs/home.php?bookid=1239 |archive-date=23 अक्तूबर 2007 |url-status=dead }}</ref>- * [[शीलस्कन्ध-वर्ग]] * [[खंधक|महा-वर्ग]] * [[पाथिक-वर्ग]] === शीलस्कन्ध-वर्ग === यह वर्ग दीघनिकाय का प्रथम वर्ग है। यह वर्ग में १३ सुत्र है। यह प्रायः गद्य मे लिखित है और शी, समाधि और प्रज्ञा से संबन्धित है<ref name="ReferenceA"/>। इस वर्ग मे समहित सुत्र इस प्रकार है<ref name="ReferenceA"/>- * ब्रह्मजाल-सुत्त * [[सामंञफल-सुत्त]] * अम्बट्ठ-सुत्त * सोणदण्ड-सुत्त * कूटदन्त-सुत्त * महालि-सुत्त * जालिय-सुत्त * महासीहनाद-सुत्त * पोट्ठपाद-सुत्त * सुभ-सुत्त * केवट्ट-सुत्त * लोहिच्च-सुत्त * तेविज्ज-सुत्त === महा-वर्ग === महावर्ग में १० सुत्र है। यह सभी सुत्र "महा" शब्द से शुरु होते है। अतः, इन्हे महावर्ग कहा गया है<ref name="ReferenceA"/>। इस वर्ग में गद्य और पद्य मिश्रित है<ref name="ReferenceA"/>। इस वर्ग मे समहित सुत्र इस प्रकार है<ref name="ReferenceA"/>- * महापदान-सुत्त * महानिदान-सुत्त * महापरिनिब्बान-सुत्त (त्रिपिटकका सबसे लम्बा सुत्र जो भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण को वर्णन करता है) * महासुदस्सन-सुत्त * जनवसभ-सुत्त * महागोविन्द-सुत्त * महासमय-सुत्त * सक्कपंह-सुत्त * महासतिपट्ठान-सुत्त * पायासिराजंञ-सुत्त === पाथिक वर्ग === यह वर्गका प्रथम सुत्र पाथिक से शुरु होता है, अतः, इन्हे पाथिक वर्ग कहा जाता है<ref name="ReferenceA"/>। यह वर्ग में गद्य और पद्य मिश्रित है। इस वर्ग मे समहित सुत्र इस प्रकार है<ref name="ReferenceA"/>- * पाथिक-सुत्त * उदुम्बरिक-सुत्त * चक्कवत्ति-सुत्त * अग्गंञ-सुत्त * सम्पसादनीय-सुत्त * पासादिक-सुत्त * लक्खण-सुत्त * सिंगाल-सुत्त * आटानाटिय-सुत्त * संगीति-सुत्त * दसुत्तर-सुत्त
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