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पादप वर्गीकरण
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== वर्गिकी के सिद्धान्त == अमेरिकन वर्गिकीविज्ञ (Taxonomist) एडवर्ड चार्ल्स बेसी (Edward Charles Bessey) ने आवृतबीजियों की जातिवृत्तीय (Phylogenetic) वर्गिकी (Taxonomy) में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। पौधों में कौन सी स्थिति प्रगत (Advanced) तथा कौन सी आद्य (Primitive) है, इसके निर्धारण के लिये विभिन्न वर्गिकीविज्ञों (बेसी हचिन्सन आदि) द्वारा कुछ महत्वपूर्ण सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है जिसके प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित है - 1. विकास का क्रम ऊपरी (upwards) तथा नीचे की ओर (downwards) दोनों दिशाओं में होता है। 2. एक ही समय में पौधे के सभी अंगों में विकास समान गति से नहीं होता है। 3. किसी एक कुल या वंश में वृक्ष एवं क्षुप (trees and shrubs) पौधे शाकीय (herbaceous) एवं आरोही (Climbers) पौधों से अधिक आदिम (Primitive) है। 4. बहुवर्षी (Perennials) पादप, वार्षिक (annuals) पादपों से आद्य (primitive) हैं। 5. स्थलीय पादपों (terrestrial plants) से जलीय पादप (aquatic plants) विकसित हुए हैं तथा अधिपादप (epiphytes), मृतोपजीवी (saprophytes) और परजीवी (parasitic) पादप सबसे प्रगत (Advance) हैं। 6. द्विबीजपत्री पादप (dicotyledons), एकबीजपत्री पादपों (monocotyledons) से आद्य (primitive) है। 7. सरल व आशाखित तना (की प्रवृति) आद्य (primitive) तथा शाखित तना प्रगत है। 8. पर्ण का पर्व-संधियों पर एकल एवं सर्पिलाकार व्यवस्थित होना (spiral arrangement), सम्मुख (opposite) व चक्रिक (cyclic) रूप से व्यवस्थित होने से अधिक आद्य (primitive) है। 9. सरल पर्ण (Simple leaves) आद्य (primitive) तथा संयुस्त पर्ण (compound leaves) प्रगत है। 10. चरलग्न पर्ण (persistent leaves) आद्य तथा पर्णपाती (decicuous) पर्ण प्रगत (advanced) है। 11. बहुतयी (Polymerous) पुष्प आद्य (primitive) है तथा अल्पतयी (oligomerous) पुष्प प्रगत (advanced) है। 12. द्विलिंगी पुष्प आद्य तथा एकलिंगी प्रगत है। 13. उभयलिंगाश्रयी (Monoecious) पादप आद्य तथा एकलिगाश्रयी (dioecious) पादप प्रगत है। 14. एकल पुष्प (solitary flowers) आद्य तथा पुष्पक्रम में (विन्यास) प्रगत है। 15. दलयुस्त पुष्प (flowers with petals) आद्य तथा दलविहीन (apetalous) या नक्ष्न पुष्प प्रगत है। 16. पृथकदलीय पुष्प (polypetalous flowers) आद्य तथा संयुस्त दलीय (gamopetalous) प्रगत है। 17. दल विन्यास के विकास का क्रम इस प्रकार है : :: व्यावर्तित (Twisted), कोरछादी (Imbricate), कोरस्पर्शी (Valvate) 18. त्रिज्यासममित (actinomorphic) पुष्प आद्य तथा एकव्यास सममित (zygomorphic) पुष्प प्रगत है। 19. जायांगधर (hypogynous) पुष्प आद्य तथा जायांगोपरिक (epigynous) पुष्प सबसे प्रगत दशा है। 20. बहु-अण्डपता (polycarpy) आद्य तथा अल्प-अण्डपता (oligocarpy) प्रगत दशा है। 21. वियुस्ताण्डपता (apocarpous) आद्य तथा संयुस्ताण्डपता (syncarpous) प्रगत दशा है। 22. भ्रूणपोषी (endospermic) बीज आद्य एवं अभ्रूणपोषी (nonendospermic) बीज प्रगत है। 23. अधिक पुंकेसरों युस्त पुष्प आद्य तथा कम पुंकेसरों वाले प्रगत है। 24. पृथक पुंकेसरी (polystaminous) पुष्प आद्य तथा संयुस्त पुंकेसरी (synstaminous) पुष्प प्रगत है। डेविस (Davis, 1967) ने इनमें कुछ और लक्षणों को सम्मिलित किया है, जो निम्नलिखित हैं : :25. अननुपर्णी (exstipulate) पत्तियों की अपेक्षा अनुपर्णी (Stipulate) अधिक आद्य है तथा स्वतंत्र अनुपर्ण (Free stipules) सलां ग अनुपर्ण की अपेक्षा आद्य है। :26. द्विबीजपत्री पौधों में फायलोडिक (phyllodic) पर्ण, पटलीय पर्ण की अपेक्षा प्रगत है। :27. तने, शाखाओं, पत्तियों एवं सहपत्रों का कंटीलापन या व्युत्पन्न (derived) अधिक आधु निक स्थिति है जो वातावरण के अनुकू लन के रूप में विकसित हुई है। :28. प्रकीर्णन एवं वितरण की आद्य इकाई बीज है, लेकिन आगे चलकर चरम स्थिति में पुष्पक्रम अथवा टम्बल वीɬस (लुढकने वाले पौधों) में पूरा पौधा ही प्रकीर्णन की इकाई बन जाता है। :29. पुष्प एवं पुष्पांगों की बहु रूपीयता, एकरूपीयता से विकसित है। कई एन्जियोस्पर्म्स कुलों में प्रगत एवं आद्य लक्षण दोनों ही पाये जाते है। लेबियेटी कुल में पुष्य का जायांगधर लक्षण आद्य है जबकि अन्य सभी लक्षण प्रगत माने जाते है। इसके पुष्पों में पृथक परिदल (perianth) एक आद्य लक्षण है। एक ही कुल में ऐसे आद्य एवं प्रगत लक्षणों की उपस्थिति उनकी स्थिति के बारे में कठिनाई प्रदर्शित करती है।
सारांश:
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