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=== सबसे पहली पुस्तकें === मुद्रण के आविष्कार से पहले प्रकाशन का कार्य कातिब या प्रशिक्षित गुलाम किया करते थे। वे चर्मपत्र पर किसी पांडुलिपि की अनेक प्रतिलिपियाँ लिखते रहते थे। टालेमी वंश के शासनकाल में मिस्र में, तथा यूनान और गणतांत्रिक रोम के प्रमुख नगरों में चर्मपत्र तैयार करनेवाली अनेक उद्योगशालाएँ खुल गई थीं और चर्मपत्र पर प्राचीन साहित्य, धर्म और कानून संबंधी श्रेष्ठ कृतियों की प्रतिलिपियाँ तैयार की जाती थीं। रोमी साम्राज्य में तथा पश्चिमी देशों के राजा, राजकुमार, पार्लिमेंट, पादरी आदि अक्सर प्रकाशन पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते थे या करने की कोशिश करते थे और लंबे समय के लिये प्रकाशनकार्य बंद हो जाता था। फिर भी ये पुराने प्रयास आज की प्रकाशन संस्थाओं के ही आदि रूप थे। उनका काम था बड़े पैमाने पर छापने के लिये पांडुलिपियों का चुनाव करना, उनके लिये लेखकों को पुस्तकों की बिक्री से पहले अग्रिम पारिश्रमिक देना, अलग अलग पांडुलिपियों के संस्करण का आकार प्रकार तथा मूल्य निर्धारित करना और बाजार तैयार करना जहाँ, अनेक प्रयत्न करके पुस्तकों को लाभ सहित बेचा जा सके। वे अत्याधुनिक अर्थो में भी प्रकाशक ही थे, यद्यपि उनके उत्पादन "पुस्तकें" नहीं थीं। आज पुस्तकों का परिचित रूप है कुछ छपे हुए पृष्ठ जो एक ओर सिले होते हैं। यह रूप कैसे प्रचलित हुआ, इसका भी एक पुराना और लंबा इतिहास है। चौथी शताब्दी तक कम से कम उत्तर रोमी साम्राज्य के जूरियों को जिल्द से बँधी पुस्तकों का पूरा ज्ञान था। फिर भी पुस्तकों का सार्वजनिक प्रचलन तो इसके दो तीन शताब्दियों बाद आयरलैंड में हुआ। यहाँ बौद्धिक एवं धार्मिक विचारधारा बढ़ी और इसका उत्कर्ष हुआ "बुक आफ़ केल्स" के रूप में, जो एक विद्वान् के अनुसार "संसार की सुंदरतम पुस्तक" है। सबसे पहले जिल्दबँधी किताबों को "कोडेक्स" कहा जाता था। मध्य युग में कोडेक्स ही पुस्तकें मानी जाने लगीं और विभिन्न ईसाई मतों के मठों द्वारा, जो प्रकाशन का कार्य करते थे, धर्मशास्त्र पर पुस्तकें प्रकाशित की जाने लगीं। कानून, ओषधिविज्ञान, काव्यशास्त्र तथा अन्य विषयों की पुस्तकों का प्रकाशन उदीयमान विश्वविद्यालयों द्वारा अन्य विषयों की पुस्तकों का प्रकाशन उदीयमान विश्वविद्यालयों द्वारा किया जाने लगा, जिन्होंने जल्दी ही गिरजों और प्रशासन से प्रकाशनकार्य छीन लिया। जिन जिन नगरों में विश्वविद्यालय थे, वहाँ पुरानी किताबों की दूकानें खूब फैल गईं, जैसी आज के युग में भी हैं। अंतर केवल इतना था कि विश्वविद्यालयों ने प्रकाशन का काम तो अपने हाथ में लिया, किंतु फायदा उठाना उनका उद्देश्य न था और उनका प्रयत्न सदा यही रहता था कि पुस्तकों की कीमत कम से कम रखी जाय जिससे विद्यार्थियों को सुविधा रहे। यही कारण था कि वे पुरानी किताबों की बिक्री पर जोर देते थे। इससे विश्वविद्यालयों को हर साल नए संस्करण भी नहीं प्रकाशित करने पड़ते थे। चर्मपत्र के समान "कोडेक्स" भी हाथ से लिखे जाते थे। मठों के "लेखन कक्षों" में अपने काम के प्रति उत्सर्ग की भावना रखनेवाले कातिब दिन भर प्राचीन ग्रंथों के पृष्ठ के पृष्ठ नकल किया करते थे। उन्हीं के कारण प्राचीन ग्रंथों तथा बाइबिल की रक्षा हो सकी। (आग लगन के भय से मठों में रात को काम नहीं होता था।) "कातिब अपना काम खत्म कर चुकता था तो एक दूसरा आदमी उसे मूल से मिलाकर संशोधित करता था", डगलस सी. मेकमर्टी ने लिखा है, "फिर उन पन्नो को लाल स्याही से लिखनेवो कातिब के पास भेज दिया जाता था जो मुखपृष्ठ, शीर्षक, अध्याय संख्या तथा दूसरे नाम, टिप्पणियाँ आदि जोड़ देता था। यदि पुस्तक में चित्र जाने को होते थे तो उसे चित्रकार के पास भेज दिया जाता था। उसके काम की समाप्ति के बाद पुस्तक जिल्द बँधने के लिये तैयार हो जाती थी।"
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