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== वर्गीकरण == [[भारत]] में पाए जानेवाले विभिन्न प्रकार के बाँसों का वर्गीकरण डॉ॰ ब्रैंडिस ने प्रकंद के अनुसार इस प्रकार किया है : '''(क)''' कुछ में भूमिगत प्रकंद (rhizome) छोटा और मोटा होता है। शाखाएँ सामूहिक रूप से निकलती हैं। उपर्युक्त प्रकंदवाले बाँस निम्नलिखित हैं : :1. '''बैब्यूसा अरंडिनेसी''' (Bambusa arundinacea) - हिंदी में इसे वेदुर बाँस कहते हैं। यह मध्य तथा दक्षिण-पश्चिम भारत एवं बर्मा में बहुतायत से पाया जानेवाला काँटेदार बाँस है। 30 से 50 फुट तक ऊँची शाखाएँ 30 से 100 के समूह में पाई जाती हैं। बौद्ध लेखों तथा भारतीय औषधि ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। :2. '''बैंब्यूसा स्पायनोसा''' - बंगाल, असम तथा बर्मा का काँटेदार बाँस है, जिसकी खेती उत्तरी-पश्चिमी भारत में की जाती है। हिंदी में इसे बिहार बाँस कहते हैं। :3. '''बैंब्यूसा टूल्ला''' - बंगाल का मुख्य बाँस है, जिसे हिंदी में पेका बाँस कहते हैं। :4. '''बैंब्यूसा वलगैरिस''' (Bambusa vulgaris) - पीली एवं हरी धारीवाला बाँस है, जो पूरे भारत में पाया जाता है। :5. '''डेंड्रोकैलैमस''' के अनेक वंश, जो शिवालिक पहाड़ियों तथा हिमालय के उत्तर-पश्चिमी भागों और पश्चिमी घाट पर बहुतायत से पाए जाते हैं। '''(ख)''' कुछ बाँसों में प्रकंद भूमि के नीच ही फैलता है। यह लंबा और पतला होता है तथा इसमें एक एक करके शाखाएँ निकलती हैं। ऐसे प्रकंदवाले बाँस निम्नलिखित हैं : :(1) '''बैंब्यूसा नूटैंस''' (Babusa nutans) - यह बाँस 5,000 से 7,000 फुट की ऊँचाई पर, नेपाल, सिक्किम, असम तथा भूटान में होता है। इसकी लकड़ी बहुत उपयोगी होती है। :(2) '''मैलोकेना''' (Melocanna) - यह बाँस पूर्वी बंगाल एवं वर्मा में बहुतायत से पाया जाता है।
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