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बेनेदेत्तो क्रोचे का अभिव्यंजनावाद
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== सहज-ज्ञान और अभिव्यंजना == सहज-ज्ञान या अन्तःप्रज्ञा और अभिव्यंजना का अभिन्न सम्बन्ध है। जहाँ सहज ज्ञान होगा वहाँ अभिव्यंजना अवश्य होगी। सहज-ज्ञान अभिव्यंजना के बिना या अभिव्यंजना सहज-ज्ञान के बिना सम्भव नहीं है। क्रोचे ने ‘अभिव्यंजना’ शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया है, जो शाब्दिक अभिव्यंजना के बोध के साथ-साथ रेखा, स्वर, गीत आदि सभी माध्यमों का बोधक है। जिसे चित्र, संगीत, नृत्य आदि को किसी भी रूप में अभिव्यंजना होती है। जो सहज-ज्ञान अभिव्यंजना का रूप धारण नहीं कर सकता वह वास्तव में सच्चा प्रतिभ-ज्ञान नहीं है, वह केवल प्राकृतिक तथ्य और संवेदन बनकर रह जाता है। : "Every true intuition is also expression. That, which does not objectify itself in expression, is not intuition but sensation and more natural fact." उदाहरणार्थ, जब कोई चित्रकार किसी वस्तु की झलक मात्र देखता है तो हम यह नहीं कह सकते कि उसे सहज-ज्ञान हुआ है। हम सहज ज्ञान की उपलब्धि तब मानेंगे जब वह उसका प्रत्यक्षीकरण कर लेगा अर्थात् जब वह अपने अन्तर्मन में उसे पूरी तरह अभिव्यक्त कर लेगा। इस प्रकार क्रोचे सहजानुभूति को आन्तरिक अभिव्यंजना या आन्तरिक रूप-रचना मानता है, जो सौन्दर्य-तत्त्व को जन्म देती है। वह उसे आत्मा का अभिव्यंजनात्मक कर्म मानता है। इसी कर्म के द्वारा कलाकार भावनाओं तथा संवेगों के आवेग को नियंत्रण में रखता है और प्रभावों को बिम्बों में अभिव्यक्त कर स्वयं उनसे मुक्त हो जाता है। अतः क्रोचे सहजानुभूति को ही अभिव्यंजना मानता है। यह अभिव्यंजना आन्तरिक होती है, बाह्य नहीं। सौन्दर्य-ज्ञान की व्याख्या करते हुए क्रोचे ने कलात्मक निर्माण की चार श्रेणियां स्थिर की हैं- *(१) '''अन्तःसंस्कार''' (Impression) - जब द्रष्टा किसी वस्तु को देखता है तो उसके चित्त पर कुछ संस्कार पड़ते हैं। *(२) '''अभिव्यंजना''' (Expression) - इन संस्कारों के जाग्रत होने पर मन-ही-मन इनकी आन्तरिक अभिव्यक्ति होने लगती है, जो अभिव्यंजना कहलाती है। *(३) '''आनुषंगिक आनन्द''' (Pleasure) - द्रष्टा के मन में सौन्दर्य-बोध से एक प्रकार के आनन्द की उत्पत्ति होती है। *(४) '''अभिव्यक्ति''' (Translated Beauty) - जब अभिव्यंजना आन्तरिक न रहकर शब्दों आदि के माध्यम से स्थूल रूप में अभिव्यक्त होती है। किन्तु दूसरी श्रेणी में आने वाली आन्तरिक अभिव्यक्ति ही सच्ची अभिव्यंजना है, क्योंकि क्रोचे इसी को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करता है। क्रोचे का कवि कोई भाषा नहीं बोलता अपितु मन-ही-मन जो मूर्तिमान होता रहता है, वह उसका आनन्द उठाता है। लेकिन जब तक बाह्य अभिव्यक्ति नहीं होती तब तक संसार में कविता का जन्म नहीं होता। वैसे भी सामान्य भाषा में अभिव्यंजना से प्रयोजन शब्दों द्वारा अभिव्यक्ति से ही है। कला में शब्दों के अतिरिक्त अभिव्यंजना के अन्य माध्यम भी होते हैं; जैसे- रंग, पत्थर आदि। किन्तु अभिव्यंजना सिद्धान्त की मान्यता है कि बाह्य प्रकाशन अथवा सम्प्रेषण के बिना ही अभिव्यंजना की सम्पूर्ण क्रिया सम्पन्न हो जाती है।
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